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आयुर्वेद को समझने के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा को समझना जरूरी : कुलपति

Tue, 18 Aug 2026 02:56 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र Updated Tue, 18 Aug 2026 02:56 AM IST
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Understanding the Indian knowledge tradition is essential to understanding Ayurveda: Vice-Chancellor
कुरुक्षेत्र। आयुष विवि में दीप प्रज्ज्वलित कर मह​र्षि चरक जयंती का शुभारंभ करते कुलपति वैद्य कर
कुरुक्षेत्र। श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संहिता एवं सिद्धांत स्नातकोत्तर विभाग द्वारा महर्षि चरक जयंती श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई गई। विद्यार्थियों ने सामूहिक रूप से चरक जयंती गायन किया। मुख्य वक्ता प्रो. बलबीर संधु ने कहा कि महर्षि चरक को समझने से पहले आयुर्वेद के अवतरण और उसकी ज्ञान परंपरा को समझना आवश्यक है। आयुर्वेद की परंपरा पौराणिक काल से चली आ रही है और भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल पश्चिमी इतिहास की कसौटियों से नहीं समझा जा सकता।
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भारतीय वांग्मय में वर्णित परंपराओं, ग्रंथों और पौराणिक प्रमाणों का अध्ययन अपनी दृष्टि से किया जाना चाहिए। अपने इतिहास और ज्ञान परंपरा को समझने के लिए भारतीय स्रोतों को महत्व देना आवश्यक है। कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति वैद्य करतार सिंह धीमान, कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत गुप्ता तथा मुख्य वक्ता प्रो. बलबीर सिंह संधु, आयुर्वेद अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान के प्राचार्य प्रो. आशीष मेहता, विभागाध्यक्ष प्रो. कृष्ण ने किया।
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प्रो. संधु ने बताया कि आयुर्वेद का ज्ञान सबसे पहले ब्रह्मा के पास था। ब्रह्मा ने यह ज्ञान दक्ष प्रजापति को, दक्ष प्रजापति ने अश्विनी कुमार को और अश्विनी कुमार से इंद्र ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद महर्षि भारद्वाज इस ज्ञान को मृत्युलोक में लेकर आए और पुनर्वसु आत्रेय को प्रदान किया। पुनर्वसु आत्रेय ने अपने छह शिष्यों, अग्निवेश, भेद, जतुकर्ण, पराशर, हारित और शार्पण को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। इन शिष्यों ने अपनी-अपनी संहिताओं की रचना की, जिनमें अग्निवेश तंत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध हुआ।
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कुलपति वैद्य धीमान ने कहा कि आयुर्वेद की वर्तमान समृद्ध परंपरा और संस्थागत स्वरूप के पीछे ऋषि-महर्षियों का अमूल्य योगदान है। उन ऋषियों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखकर उसे आत्मसात करें और लोकहित में उसका उपयोग करें। आयुर्वेद के मूल ग्रंथों को सही अर्थों में समझने के लिए शब्दों के सूक्ष्म अंतर को समझना जरूरी है।
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