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Kurukshetra News: नृत्य की विधाओं को बचा रहा विवि, रत्नावली बना सरंक्षण का मंच
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Wed, 29 Apr 2026 02:13 AM IST
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कुरुक्षेत्र। प्रो डॉ पूजा चौधरी एक आयोजन के दौरान नृत्य करते हुए। स्वयं
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। भारतीय नृत्य की अलग-अलग विधाएं हैं, जो आज के समय में विलुप्त होती जा रही हैं। फिर वह कथक हो, शास्त्रीय, लोक या फिर प्रदेश स्तरीय लूर नृत्य, खोड़िया, धमाल, रसिया आदि। इन विधाओं को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के रत्नावली महोत्सव के जरिये फिर से जिंदा किया जा रहा है। रत्नावली आज विश्व स्तर पर पहचान बना चुका है, जो वर्ष 2006 से शुरू होकर आज तक चला आ रहा है।
रत्नावली ने आज प्रदेश के कई ऐसे नृत्य हैं, जिनको न सिर्फ बचाया है, बल्कि उनको ऐसे संजोया है कि वे आने वाली पीढ़ियां उसे देख सकें। डॉ. महासिंह पूनिया, जिन्होंने रत्नावली में अहम योगदान दिया बल्कि सबसे प्रसिद्ध लूर नृत्य को बचाया, वे बताते हैं कि हमने इसकी शुरुआत गांव-गांव जाकर, दादरी के बांगर एरिया में जाकर 80 साल की बुजुर्ग महिलाओं से बात कर एक डॉक्यूमेंटेशन कर उन महिलाओं की कार्यशाला आयोजित कर इसे युवाओं के लिए तैयार किया।
इसकी शुरुआत साल 2022 से करनाल के डीएवी कॉलेज की छात्राओं से हुई, जहां से यह दोबारा बनकर चला, फिर रत्नावली से राजभवन तक प्रदर्शित हुआ। वहीं ऐसे ही काम कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने गूगा, घूमर जैसे नृत्य को बचाने के लिए किए और उनको रत्नावली में शामिल किया। केयू में संगीत एवं नृत्य विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर वीर विकास ने बताया कि रत्नावली ने नृत्य को बचाने में अलग भूमिका निभाई है, वहीं सांस्कृतिक तौर पर कथक को भी जगह मिली, जहां से इसे भी दोबारा जीवंत किया गया।
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कुरुक्षेत्र। भारतीय नृत्य की अलग-अलग विधाएं हैं, जो आज के समय में विलुप्त होती जा रही हैं। फिर वह कथक हो, शास्त्रीय, लोक या फिर प्रदेश स्तरीय लूर नृत्य, खोड़िया, धमाल, रसिया आदि। इन विधाओं को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के रत्नावली महोत्सव के जरिये फिर से जिंदा किया जा रहा है। रत्नावली आज विश्व स्तर पर पहचान बना चुका है, जो वर्ष 2006 से शुरू होकर आज तक चला आ रहा है।
रत्नावली ने आज प्रदेश के कई ऐसे नृत्य हैं, जिनको न सिर्फ बचाया है, बल्कि उनको ऐसे संजोया है कि वे आने वाली पीढ़ियां उसे देख सकें। डॉ. महासिंह पूनिया, जिन्होंने रत्नावली में अहम योगदान दिया बल्कि सबसे प्रसिद्ध लूर नृत्य को बचाया, वे बताते हैं कि हमने इसकी शुरुआत गांव-गांव जाकर, दादरी के बांगर एरिया में जाकर 80 साल की बुजुर्ग महिलाओं से बात कर एक डॉक्यूमेंटेशन कर उन महिलाओं की कार्यशाला आयोजित कर इसे युवाओं के लिए तैयार किया।
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इसकी शुरुआत साल 2022 से करनाल के डीएवी कॉलेज की छात्राओं से हुई, जहां से यह दोबारा बनकर चला, फिर रत्नावली से राजभवन तक प्रदर्शित हुआ। वहीं ऐसे ही काम कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने गूगा, घूमर जैसे नृत्य को बचाने के लिए किए और उनको रत्नावली में शामिल किया। केयू में संगीत एवं नृत्य विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर वीर विकास ने बताया कि रत्नावली ने नृत्य को बचाने में अलग भूमिका निभाई है, वहीं सांस्कृतिक तौर पर कथक को भी जगह मिली, जहां से इसे भी दोबारा जीवंत किया गया।

कुरुक्षेत्र। प्रो डॉ पूजा चौधरी एक आयोजन के दौरान नृत्य करते हुए। स्वयं

कुरुक्षेत्र। प्रो डॉ पूजा चौधरी एक आयोजन के दौरान नृत्य करते हुए। स्वयं
