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Mahendragarh-Narnaul News: महंगी किताबें और भारी बस्तों से अभिभावक परेशान
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Thu, 26 Mar 2026 11:47 PM IST
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फोटो नंबर-11शहर की एक दुकान में रखी किताबें। संवाद
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नारनौल। निजी स्कूलों में प्रवेश के समय अभिभावकों से न सिर्फ अधिक फीस ली जाती है बल्कि उन्हें स्कूल से ही महंगी किताबों, कॉपियों के सेट खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। कई निजी स्कूल एनसीईआरटी या सीबीएसई की निर्धारित पुस्तकों के बजाय अपनी ओर से छपवाई गई किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। इन किताबों की कीमत इतनी अधिक होती है कि हर अभिभावक के लिए इन्हें खरीदना आसान नहीं होता।
स्थिति यह है कि कुछ स्कूल आवश्यकता से अधिक किताबें भी सूची में शामिल कर देते हैं, जिससे अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ जाता है। साथ ही बच्चों के स्कूल बैग का वजन भी इतना अधिक हो जाता है कि छोटे बच्चों के लिए उसे उठाकर स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है।
एनसीईआरटी की किताबें कक्षा पहली से आठवीं तक 65 रुपये से अधिक नहीं होतीं, जबकि कक्षा 9वीं से 12वीं तक की किताबें भी 150 रुपये से ऊपर नहीं हैं। कक्षा पहली से आठवीं तक का पूरा सेट लगभग 1500 रुपये में उपलब्ध हो जाता है और सरकारी स्कूलों में ये किताबें निशुल्क वितरित की जाती हैं। इसके विपरीत निजी स्कूलों में यही किताबें 3000 से 5000 रुपये तक में दी जा रही हैं।
कक्षा अनुसार निर्धारित बैग का वजन
कक्षा पहली व दूसरी के 1.5 किलो ग्राम, कक्षा तीन से पांच तक दो व तीन किलोग्राम, कक्षा छठी व सातवीं के लिए 4 किलोग्राम इसी तरह आठवीं व नौवीं के लिए 4.5 किलोग्राम तथा दसवीं के लिए 10.5 किलोग्राम विभाग द्वारा निर्धारित किया गया है, लेकिन पहली व दूसरी कक्षा में बच्चों के बैग का वजन चार से पांच किलोग्राम हो जाता है।
विभाग ने जारी किया आदेश
स्कूल शिक्षा निदेशालय ने राज्य के सभी डीईओ और डीईईओ को भी निर्देश दिए हुए हैं कि वे नियमों का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करें। किसी भी स्कूल को छात्रों और अभिभावकों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ नहीं डालना चाहिए, जिससे कि उन्हें अनावश्यक किताबें, ड्रेस व अन्य चीजें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़े। इन मानदंडों का उल्लंघन करने वाले किसी भी स्कूल के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए।
बाक्स-
मेरा बच्चा पांचवीं कक्षा में है लेकिन छोटी कक्षा में किताबों पर ही कम से कम 5000 रुपये खर्च हो जाते हैं। इससे अभिभावकों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।-विनोद कुमार, रेवाड़ी रोड
बाक्स-
निजी स्कूलों में अपनी मनमानी के हिसाब से किताबें लगाई जाती है। कुछ किताबें तो ऐसी भी होती है जो स्कूल की तरफ से जरूरी कर दी जाती है। इसके अलावा किताबों के रेट भी बहुत ज्यादा होते हैं।-दिनेश कुमार,मोहल्ला बिसातियान
वर्जन-
निजी स्कूलों में किताबों की मनमानी को लेकर समय-समय पर जांच की जाती है। अगर हमारे पास कोई अभिभावक भी इस तरह की शिकायत लेकर आता है तो उसकी भी जांच की जाएगी।-पवन भारद्वाज, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, नारनौल।
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स्थिति यह है कि कुछ स्कूल आवश्यकता से अधिक किताबें भी सूची में शामिल कर देते हैं, जिससे अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ जाता है। साथ ही बच्चों के स्कूल बैग का वजन भी इतना अधिक हो जाता है कि छोटे बच्चों के लिए उसे उठाकर स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है।
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एनसीईआरटी की किताबें कक्षा पहली से आठवीं तक 65 रुपये से अधिक नहीं होतीं, जबकि कक्षा 9वीं से 12वीं तक की किताबें भी 150 रुपये से ऊपर नहीं हैं। कक्षा पहली से आठवीं तक का पूरा सेट लगभग 1500 रुपये में उपलब्ध हो जाता है और सरकारी स्कूलों में ये किताबें निशुल्क वितरित की जाती हैं। इसके विपरीत निजी स्कूलों में यही किताबें 3000 से 5000 रुपये तक में दी जा रही हैं।
कक्षा अनुसार निर्धारित बैग का वजन
कक्षा पहली व दूसरी के 1.5 किलो ग्राम, कक्षा तीन से पांच तक दो व तीन किलोग्राम, कक्षा छठी व सातवीं के लिए 4 किलोग्राम इसी तरह आठवीं व नौवीं के लिए 4.5 किलोग्राम तथा दसवीं के लिए 10.5 किलोग्राम विभाग द्वारा निर्धारित किया गया है, लेकिन पहली व दूसरी कक्षा में बच्चों के बैग का वजन चार से पांच किलोग्राम हो जाता है।
विभाग ने जारी किया आदेश
स्कूल शिक्षा निदेशालय ने राज्य के सभी डीईओ और डीईईओ को भी निर्देश दिए हुए हैं कि वे नियमों का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करें। किसी भी स्कूल को छात्रों और अभिभावकों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ नहीं डालना चाहिए, जिससे कि उन्हें अनावश्यक किताबें, ड्रेस व अन्य चीजें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़े। इन मानदंडों का उल्लंघन करने वाले किसी भी स्कूल के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए।
बाक्स-
मेरा बच्चा पांचवीं कक्षा में है लेकिन छोटी कक्षा में किताबों पर ही कम से कम 5000 रुपये खर्च हो जाते हैं। इससे अभिभावकों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।-विनोद कुमार, रेवाड़ी रोड
बाक्स-
निजी स्कूलों में अपनी मनमानी के हिसाब से किताबें लगाई जाती है। कुछ किताबें तो ऐसी भी होती है जो स्कूल की तरफ से जरूरी कर दी जाती है। इसके अलावा किताबों के रेट भी बहुत ज्यादा होते हैं।-दिनेश कुमार,मोहल्ला बिसातियान
वर्जन-
निजी स्कूलों में किताबों की मनमानी को लेकर समय-समय पर जांच की जाती है। अगर हमारे पास कोई अभिभावक भी इस तरह की शिकायत लेकर आता है तो उसकी भी जांच की जाएगी।-पवन भारद्वाज, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, नारनौल।