{"_id":"69694fefafea42488c0994bf","slug":"gps-based-tracking-is-just-a-formality-panchkula-news-c-87-1-spkl1029-131741-2026-01-16","type":"story","status":"publish","title_hn":"Panchkula News: जीपीएस आधारित निशानदेही केवल औपचारिकता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Panchkula News: जीपीएस आधारित निशानदेही केवल औपचारिकता
विज्ञापन
विज्ञापन
जीपीएस निशानदेही पर उठे सवाल, ग्रामीणों ने बताया दिखावटी व्यवस्था
संवाद न्यूज एजेंसी
मोरनी। हरियाणा सरकार की योजना के तहत शामलात भूमि पर वर्ष 2004 से पूर्व के कब्जाधारियों को मालिकाना हक देने की प्रक्रिया मोरनी क्षेत्र में जारी है। योजना के तहत भूमि की निशानदेही का कार्य किया जा रहा है, लेकिन इसमें प्रयोग की जा रही जीपीएस मशीन को लेकर ग्रामीणों में भारी रोष व्याप्त है। ग्रामीणों का आरोप है कि जीपीएस आधारित निशानदेही जमीनी हकीकत से दूर है और यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि जीपीएस मशीन केवल जमीन का कुल रक्बा मापने का उपकरण है, जिसके पास राजस्व विभाग का कोई पुराना रिकॉर्ड या जमाबंदी से संबंधित डाटा उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में इसके आधार पर की जा रही निशानदेही से वास्तविक सीमाएं तय नहीं हो पा रही हैं, बल्कि लोगों की समस्याएं और बढ़ रही हैं।
भारी शुल्क वसूली का आरोप
बलवंत सिंह, कमल सिंह, राजेंद्र सिंह सहित अन्य ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जीपीएस निशानदेही के नाम पर उनसे भारी-भरकम शुल्क वसूला जा रहा है, जो पूरी तरह अनुचित है। उन्होंने मांग की कि शामलात भूमि की निशानदेही पुराने राजस्व रिकॉर्ड और जमाबंदी के आधार पर मैनुअल तरीके से करवाई जानी चाहिए।
पहाड़ी क्षेत्र में जीपीएस पर सवाल
ग्रामीणों ने बताया कि वीरवार को मोरनी की जब्याल पंचायत के खसरा नंबर-1 की निशानदेही जीपीएस मशीन से की गई, जिससे वे संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ भू-भाग में जीपीएस मशीन सटीक माप देने में सक्षम नहीं है। यह मशीन केवल विभाग द्वारा निर्धारित बिंदुओं के आधार पर क्षेत्रफल बताती है, जबकि वास्तविक सीमाओं का निर्धारण इससे संभव नहीं हो पाता।
ऐतिहासिक धरोहरों को जंगल दर्शाने का आरोप
ग्रामीणों ने यह भी गंभीर आरोप लगाया कि जमाबंदी के अनुसार मोरनी का सैकड़ों साल पुराना ऐतिहासिक किला और जोहड़ राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हैं, लेकिन जीपीएस आधारित निशानदेही में इन्हें जंगल क्षेत्र के रूप में दिखाया जा रहा है, जो एक बड़ी प्रशासनिक चूक है।
ग्रामीणों ने जिला उपायुक्त और राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से मांग की है कि जीपीएस मशीन के बजाय अनुभवी राजस्व कर्मचारियों द्वारा पुराने रिकॉर्ड के अनुसार मैनुअल निशानदेही करवाई जाए, ताकि लोगों को न्याय मिल सके और भविष्य में अनावश्यक विवादों से बचा जा सके।
Trending Videos
संवाद न्यूज एजेंसी
मोरनी। हरियाणा सरकार की योजना के तहत शामलात भूमि पर वर्ष 2004 से पूर्व के कब्जाधारियों को मालिकाना हक देने की प्रक्रिया मोरनी क्षेत्र में जारी है। योजना के तहत भूमि की निशानदेही का कार्य किया जा रहा है, लेकिन इसमें प्रयोग की जा रही जीपीएस मशीन को लेकर ग्रामीणों में भारी रोष व्याप्त है। ग्रामीणों का आरोप है कि जीपीएस आधारित निशानदेही जमीनी हकीकत से दूर है और यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि जीपीएस मशीन केवल जमीन का कुल रक्बा मापने का उपकरण है, जिसके पास राजस्व विभाग का कोई पुराना रिकॉर्ड या जमाबंदी से संबंधित डाटा उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में इसके आधार पर की जा रही निशानदेही से वास्तविक सीमाएं तय नहीं हो पा रही हैं, बल्कि लोगों की समस्याएं और बढ़ रही हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
भारी शुल्क वसूली का आरोप
बलवंत सिंह, कमल सिंह, राजेंद्र सिंह सहित अन्य ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जीपीएस निशानदेही के नाम पर उनसे भारी-भरकम शुल्क वसूला जा रहा है, जो पूरी तरह अनुचित है। उन्होंने मांग की कि शामलात भूमि की निशानदेही पुराने राजस्व रिकॉर्ड और जमाबंदी के आधार पर मैनुअल तरीके से करवाई जानी चाहिए।
पहाड़ी क्षेत्र में जीपीएस पर सवाल
ग्रामीणों ने बताया कि वीरवार को मोरनी की जब्याल पंचायत के खसरा नंबर-1 की निशानदेही जीपीएस मशीन से की गई, जिससे वे संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ भू-भाग में जीपीएस मशीन सटीक माप देने में सक्षम नहीं है। यह मशीन केवल विभाग द्वारा निर्धारित बिंदुओं के आधार पर क्षेत्रफल बताती है, जबकि वास्तविक सीमाओं का निर्धारण इससे संभव नहीं हो पाता।
ऐतिहासिक धरोहरों को जंगल दर्शाने का आरोप
ग्रामीणों ने यह भी गंभीर आरोप लगाया कि जमाबंदी के अनुसार मोरनी का सैकड़ों साल पुराना ऐतिहासिक किला और जोहड़ राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हैं, लेकिन जीपीएस आधारित निशानदेही में इन्हें जंगल क्षेत्र के रूप में दिखाया जा रहा है, जो एक बड़ी प्रशासनिक चूक है।
ग्रामीणों ने जिला उपायुक्त और राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से मांग की है कि जीपीएस मशीन के बजाय अनुभवी राजस्व कर्मचारियों द्वारा पुराने रिकॉर्ड के अनुसार मैनुअल निशानदेही करवाई जाए, ताकि लोगों को न्याय मिल सके और भविष्य में अनावश्यक विवादों से बचा जा सके।