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Panchkula News: मौत से पहले के अंतिम पत्र के आधार प नहीं छीनी जा सकती किसी की आजादी
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि आरोपी की अग्रिम जमानत केवल इस आधार पर रद्द नहीं की जा सकती कि अपराध गंभीर है या निचली अदालत के आदेश से किसी पक्ष को असंतोष है। जमानत रद्द करने के लिए ठोस, नए और ठहराव योग्य आधार होने चाहिए।
जस्टिस सुमित गोयल ने उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें जालंधर निवासी पिता ने अपने बेटे की मौत से पहले लिखे गए कथित आखिरी नोट के आधार पर अमेरिका की नागरिक आरोपी सास को मिली अग्रिम जमानत रद्द कराने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने पाया कि जून 2025 में दी गई अग्रिम जमानत को निरस्त करने के लिए कोई ऐसा नया तथ्य सामने नहीं आया है जिससे यह प्रतीत हो कि आरोपी ने जांच में सहयोग नहीं किया या न्याय से भागने का प्रयास किया। न्यायालय ने कहा कि सिर्फ अपराध की गंभीरता या जमानत आदेश से असहमति, उसे वापस लेने का आधार नहीं बन सकती।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मृतक द्वारा छोड़ा गया नोट डाइंग डिक्लेरेशन के समान है और उसमें ससुराल पक्ष द्वारा मानसिक उत्पीड़न, अवैध मांगों और प्रताड़ना के आरोप दर्ज हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि जांच एजेंसी ने कथित नोट को फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजकर मामले को कमजोर किया और आरोपी के विदेश नागरिक होने से उसके फरार होने की आशंका है।
इन दलीलों पर अदालत ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत के स्तर पर ऐसे नोट को स्वतः डाइंग डिक्लेरेशन मान लेना स्वीकार्य नहीं है। जांच एजेंसी और आरोपी के बीच मिलीभगत का आरोप निराधार है, क्योंकि इसके समर्थन में कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि जांच एजेंसी की ओर से किसी प्रकार के असहयोग, साक्ष्यों से छेड़छाड़ या जांच में बाधा की शिकायत नहीं आई है। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि निचली अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर या गलत दृष्टिकोण अपनाकर जमानत दी थी।
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याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मृतक द्वारा छोड़ा गया नोट डाइंग डिक्लेरेशन के समान है और उसमें ससुराल पक्ष द्वारा मानसिक उत्पीड़न, अवैध मांगों और प्रताड़ना के आरोप दर्ज हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि जांच एजेंसी ने कथित नोट को फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजकर मामले को कमजोर किया और आरोपी के विदेश नागरिक होने से उसके फरार होने की आशंका है।
इन दलीलों पर अदालत ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत के स्तर पर ऐसे नोट को स्वतः डाइंग डिक्लेरेशन मान लेना स्वीकार्य नहीं है। जांच एजेंसी और आरोपी के बीच मिलीभगत का आरोप निराधार है, क्योंकि इसके समर्थन में कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि जांच एजेंसी की ओर से किसी प्रकार के असहयोग, साक्ष्यों से छेड़छाड़ या जांच में बाधा की शिकायत नहीं आई है। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि निचली अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर या गलत दृष्टिकोण अपनाकर जमानत दी थी।