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नकली शराब मामला : काम नहीं आई दलीलें, अग्रिम जमानत याचिका खारिज
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Tue, 24 Feb 2026 02:21 AM IST
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जिला न्यायालय रेवाड़ी। संवाद
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रेवाड़ी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नरेंद्र पाल की अदालत ने अवैध व नकली शराब के बड़े नेटवर्क से जुड़े मामले में आरोपी गांव भुराड़ी निवासी दुलीचंद की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामला थाना धारूहेड़ा में 2 दिसंबर 2023 को दर्ज एफआईआर से संबंधित है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार 12 दिसंबर 2023 को पुलिस टीम दिल्ली-जयपुर हाईवे स्थित साहबी ब्रिज पर गश्त पर थी। इसी दौरान गुप्त सूचना मिली कि एक टाटा 407 वाहन में अवैध व नकली शराब, फर्जी होलोग्राम, लेबल और शराब बनाने के उपकरण ले जाए जा रहे हैं।
सूचना के आधार पर पुलिस ने बैरिकेड लगाकर वाहन को रोका। जांच के दौरान वाहन से भारी मात्रा में स्पिरिट, तैयार नकली शराब, प्लास्टिक निप, ड्रम, हजारों की संख्या में फर्जी होलोग्राम, रैपर, लेबल, ढक्कन तथा बोतलों पर कैप लगाने की मशीन बरामद की गई।
पुलिस के अनुसार वाहन चालक पवन और उसके साथियों अजय व अर्जुन को मौके पर गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में मुख्य आरोपी पवन ने खुलासा किया कि अवैध शराब बनाने का काम मानेसर में किया जा रहा था। आगे की जांच में एक शराब ठेके से 149 पेटी नकली शराब भी बरामद की गई।
इसी दौरान सह-आरोपियों के बयान में दुलीचंद का नाम सामने आया। उस पर आरोप है कि वह तैयार की गई नकली शराब को ठेकेदारों और विक्रेताओं तक सप्लाई करता था।
दोनों पक्षों ने कोर्ट में दी ये दलीलें
राज्य की ओर से प्रस्तुत अतिरिक्त लोक अभियोजक ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि मुख्य आरोपी के खुलासे में दुलीचंद को अवैध शराब का मुख्य सप्लायर बताया गया है। पिछले दो वर्षों से वह जांच में शामिल नहीं हो रहा है और उसकी हिरासत में पूछताछ आवश्यक है ताकि नेटवर्क की पूरी कड़ी सामने लाई जा सके। यदि उसे अग्रिम जमानत दी गई तो वह जांच को प्रभावित कर सकता है।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि दुलीचंद का नाम मूल एफआईआर में नहीं है और उसके कब्जे से कोई बरामदगी नहीं हुई है। यह भी कहा गया कि अन्य सह-आरोपियों को नियमित जमानत मिल चुकी है और आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। अधिवक्ता ने आशंका जताई कि गिरफ्तारी की स्थिति में पुलिस द्वारा उत्पीड़न किया जा सकता है, इसलिए अग्रिम जमानत दी जाए।
अग्रिम जमानत देने का कोई मामला नहीं बनता
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि आरोपी से कस्टडी में पूछताछ तथ्यों की रिकवरी या खोज के लिए जरूरी है। प्रॉसिक्यूशन को आशंका है कि अगर आरोपी को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाता है तो वह जांच के दौरान पुलिस के साथ सहयोग नहीं कर सकता।
इसके अलावा कानून का नियम है कि अग्रिम जमानत देने की अर्जी पर विचार करते समय, कोर्ट को अपराध की प्रकृति, व्यक्ति की भूमिका, जांच की प्रक्रिया को प्रभावित करने या गवाहों को डराने सहित सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना पर विचार करना होगा।
इसलिए अपराध और सजा की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए आवेदक को अग्रिम जमानत देने का कोई मामला नहीं बनता है और यह अर्जी खारिज की जाती है
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अभियोजन पक्ष के अनुसार 12 दिसंबर 2023 को पुलिस टीम दिल्ली-जयपुर हाईवे स्थित साहबी ब्रिज पर गश्त पर थी। इसी दौरान गुप्त सूचना मिली कि एक टाटा 407 वाहन में अवैध व नकली शराब, फर्जी होलोग्राम, लेबल और शराब बनाने के उपकरण ले जाए जा रहे हैं।
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सूचना के आधार पर पुलिस ने बैरिकेड लगाकर वाहन को रोका। जांच के दौरान वाहन से भारी मात्रा में स्पिरिट, तैयार नकली शराब, प्लास्टिक निप, ड्रम, हजारों की संख्या में फर्जी होलोग्राम, रैपर, लेबल, ढक्कन तथा बोतलों पर कैप लगाने की मशीन बरामद की गई।
पुलिस के अनुसार वाहन चालक पवन और उसके साथियों अजय व अर्जुन को मौके पर गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में मुख्य आरोपी पवन ने खुलासा किया कि अवैध शराब बनाने का काम मानेसर में किया जा रहा था। आगे की जांच में एक शराब ठेके से 149 पेटी नकली शराब भी बरामद की गई।
इसी दौरान सह-आरोपियों के बयान में दुलीचंद का नाम सामने आया। उस पर आरोप है कि वह तैयार की गई नकली शराब को ठेकेदारों और विक्रेताओं तक सप्लाई करता था।
दोनों पक्षों ने कोर्ट में दी ये दलीलें
राज्य की ओर से प्रस्तुत अतिरिक्त लोक अभियोजक ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि मुख्य आरोपी के खुलासे में दुलीचंद को अवैध शराब का मुख्य सप्लायर बताया गया है। पिछले दो वर्षों से वह जांच में शामिल नहीं हो रहा है और उसकी हिरासत में पूछताछ आवश्यक है ताकि नेटवर्क की पूरी कड़ी सामने लाई जा सके। यदि उसे अग्रिम जमानत दी गई तो वह जांच को प्रभावित कर सकता है।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि दुलीचंद का नाम मूल एफआईआर में नहीं है और उसके कब्जे से कोई बरामदगी नहीं हुई है। यह भी कहा गया कि अन्य सह-आरोपियों को नियमित जमानत मिल चुकी है और आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। अधिवक्ता ने आशंका जताई कि गिरफ्तारी की स्थिति में पुलिस द्वारा उत्पीड़न किया जा सकता है, इसलिए अग्रिम जमानत दी जाए।
अग्रिम जमानत देने का कोई मामला नहीं बनता
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि आरोपी से कस्टडी में पूछताछ तथ्यों की रिकवरी या खोज के लिए जरूरी है। प्रॉसिक्यूशन को आशंका है कि अगर आरोपी को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाता है तो वह जांच के दौरान पुलिस के साथ सहयोग नहीं कर सकता।
इसके अलावा कानून का नियम है कि अग्रिम जमानत देने की अर्जी पर विचार करते समय, कोर्ट को अपराध की प्रकृति, व्यक्ति की भूमिका, जांच की प्रक्रिया को प्रभावित करने या गवाहों को डराने सहित सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना पर विचार करना होगा।
इसलिए अपराध और सजा की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए आवेदक को अग्रिम जमानत देने का कोई मामला नहीं बनता है और यह अर्जी खारिज की जाती है