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Rohtak News: मरीजों की जांच-दवा के लिए परिजनों काे लगाने पड़े बाजार के चक्कर
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19-पीजीआई के ट्राॅमा सेंटर में जींद के फैक्टरी हादसे में झुलसे मरीजों का हाल जाने पहुंचे रोहतक
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चार मरीज 40 से 45 प्रतिशत तक व तीन मरीज 60 प्रतिशत से अधिक झुलसे
- जींद में रंग फैक्टरी में आग लगने से झुलसे छह कर्मचारियों को गंभीर हालत में लाया गया पीजीआई के ट्राॅमा सेंटर
- उपायुक्त ने एमएस के साथ मरीजों का जाना हाल, हर सुविधा मुहैया कराने के दिए थे निर्देश
अभिषेक कीरत
रोहतक। जींद में शनिवार को रंग फैक्टरी में आग लगने से झुलसे सात मरीजों को पीजीआई के ट्राॅमा सेंटर में भी राहत नहीं मिली। मरीजों की जांच व दवा के लिए भी उनके परिजनों को बाजार के चक्कर लगाने पड़े। इनमें से चार मरीज 40 से 45 प्रतिशत तक व तीन मरीज 60 प्रतिशत से अधिक झुलसे हुए थे।
यह हाल भी तक रहा, जब खुद उपायुक्त सचिन गुप्ता ने ट्राॅमा सेंटर पहुंचकर मरीजों का हाल जाना व पीजीआई प्रशासन को मरीजों काे हर तरह की सुविधा मुहैया कराने का भी निर्देश दिया था।
इसके बावजूद मरीजों के परिजनों को जरूरत की हर चीज के लिए बाहर दुकानों पर जाना पड़ा। हादसे के बाद पड़ताल करने पर मरीजों का यह दर्द सामने आया। संवाद
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केस-1
700 रुपये में ब्लड टेस्ट रिपोर्ट लाकर दी
हादसे में झुलसी कमलेश के पति रमेश ने बताया कि ट्राॅमा सेंटर से टेस्ट के लिए पुराने इमरजेंसी हॉल में भेजा गया। जब यहां पहुंचा तो लैब के बाहर बैठे आदमी ने बोला कि मशीन खराब है। फिर उसने एक नंबर दिया कि इस पर कॉल कर लीजिए। उसकी बातों पर भरोसा नहीं हुआ तो लैब के अंदर पता करने चला गया। लैब वाले ने टेस्ट कराने को कहा। जैसे ही इमरजेंसी से निकलकर एक लड़का बाइक पर आया। उसने पूछा क्या बात हुई। उसने 700 रुपये में खून का सैंपल साथ ले जाकर टेस्ट रिपोर्ट लाकर मुझे दे दी। मुझे इमरजेंसी के बाहर ही खड़े रहने को कहा। यहां तो सीरियस मरीजों के लिए पहले ही इलाज की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए थी।
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केस-2
एक मरीज के परिजन ने बताया कि इलाज के लिए बाहर से एक ट्यूब मंगाई गई। यह ट्यूब बाहर से 750 रुपये में मिली। अगर इतने पैसे होते तो फैक्टरी में कम पैसों में काम ही क्यों करते।
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हादसे से पांच मिनट पहले ही फैक्टरी में गया था जगबीर
हादसे में झुलसे 55 वर्षीय जगबीर के साथ आए परिजन सचिन ने बताया कि वह पिछले दो महीने से जींद की फैक्टरी से गत्ता उठा रहे हैं। उनकी अपनी गाड़ी है जिससे वह गत्ता ढोते हैं। हादसे से पांच मिनट पहले ही फैक्टरी में प्रवेश किया था। दो बेटे व एक बेटी हैं। बेटी की शादी हो चुकी है।
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सात हजार रुपये मिलता है वेतन
झुलसी रानी के देवर अंकित ने बताया कि फैक्टरी में रंग ही बनाने का काम है, यह सोचकर फैक्टरी में काम करने के लिए भेज दिए थे। वेतन भी केवल सात हजार रुपये मिलता है। इतनी छोटी रकम के लिए जान पर बन आएगी, यह सोचा ही नहीं था।
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वर्जन
मुझे झुलसे मरीजों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसको लेकर डॉ. पंकज ही कुछ जानकारी दे पाएंगे। मरीजों को हुई असुविधा के बारे में पता किया जाएगा।
- डॉ. कुंदन मित्तल, एमएस, पीजीआई
- जींद में रंग फैक्टरी में आग लगने से झुलसे छह कर्मचारियों को गंभीर हालत में लाया गया पीजीआई के ट्राॅमा सेंटर
- उपायुक्त ने एमएस के साथ मरीजों का जाना हाल, हर सुविधा मुहैया कराने के दिए थे निर्देश
अभिषेक कीरत
रोहतक। जींद में शनिवार को रंग फैक्टरी में आग लगने से झुलसे सात मरीजों को पीजीआई के ट्राॅमा सेंटर में भी राहत नहीं मिली। मरीजों की जांच व दवा के लिए भी उनके परिजनों को बाजार के चक्कर लगाने पड़े। इनमें से चार मरीज 40 से 45 प्रतिशत तक व तीन मरीज 60 प्रतिशत से अधिक झुलसे हुए थे।
यह हाल भी तक रहा, जब खुद उपायुक्त सचिन गुप्ता ने ट्राॅमा सेंटर पहुंचकर मरीजों का हाल जाना व पीजीआई प्रशासन को मरीजों काे हर तरह की सुविधा मुहैया कराने का भी निर्देश दिया था।
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इसके बावजूद मरीजों के परिजनों को जरूरत की हर चीज के लिए बाहर दुकानों पर जाना पड़ा। हादसे के बाद पड़ताल करने पर मरीजों का यह दर्द सामने आया। संवाद
केस-1
700 रुपये में ब्लड टेस्ट रिपोर्ट लाकर दी
हादसे में झुलसी कमलेश के पति रमेश ने बताया कि ट्राॅमा सेंटर से टेस्ट के लिए पुराने इमरजेंसी हॉल में भेजा गया। जब यहां पहुंचा तो लैब के बाहर बैठे आदमी ने बोला कि मशीन खराब है। फिर उसने एक नंबर दिया कि इस पर कॉल कर लीजिए। उसकी बातों पर भरोसा नहीं हुआ तो लैब के अंदर पता करने चला गया। लैब वाले ने टेस्ट कराने को कहा। जैसे ही इमरजेंसी से निकलकर एक लड़का बाइक पर आया। उसने पूछा क्या बात हुई। उसने 700 रुपये में खून का सैंपल साथ ले जाकर टेस्ट रिपोर्ट लाकर मुझे दे दी। मुझे इमरजेंसी के बाहर ही खड़े रहने को कहा। यहां तो सीरियस मरीजों के लिए पहले ही इलाज की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए थी।
केस-2
एक मरीज के परिजन ने बताया कि इलाज के लिए बाहर से एक ट्यूब मंगाई गई। यह ट्यूब बाहर से 750 रुपये में मिली। अगर इतने पैसे होते तो फैक्टरी में कम पैसों में काम ही क्यों करते।
हादसे से पांच मिनट पहले ही फैक्टरी में गया था जगबीर
हादसे में झुलसे 55 वर्षीय जगबीर के साथ आए परिजन सचिन ने बताया कि वह पिछले दो महीने से जींद की फैक्टरी से गत्ता उठा रहे हैं। उनकी अपनी गाड़ी है जिससे वह गत्ता ढोते हैं। हादसे से पांच मिनट पहले ही फैक्टरी में प्रवेश किया था। दो बेटे व एक बेटी हैं। बेटी की शादी हो चुकी है।
सात हजार रुपये मिलता है वेतन
झुलसी रानी के देवर अंकित ने बताया कि फैक्टरी में रंग ही बनाने का काम है, यह सोचकर फैक्टरी में काम करने के लिए भेज दिए थे। वेतन भी केवल सात हजार रुपये मिलता है। इतनी छोटी रकम के लिए जान पर बन आएगी, यह सोचा ही नहीं था।
वर्जन
मुझे झुलसे मरीजों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसको लेकर डॉ. पंकज ही कुछ जानकारी दे पाएंगे। मरीजों को हुई असुविधा के बारे में पता किया जाएगा।
- डॉ. कुंदन मित्तल, एमएस, पीजीआई

19-पीजीआई के ट्राॅमा सेंटर में जींद के फैक्टरी हादसे में झुलसे मरीजों का हाल जाने पहुंचे रोहतक