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Sirsa News: 95 वर्षीय श्रावक मोहनलाल जैन ने ग्रहण किया संथारा
Tue, 28 Jul 2026 11:29 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Tue, 28 Jul 2026 11:29 PM IST
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कालांवाली। जैन साध्वी संधारा की रस्म पूरी करवाते हुए। संवाद
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जैन समाज ने की धार्मिक साधना की सराहना
फोटो - 39
संवाद न्यूज एजेंसी
कालांवाली। एसएस जैन सभा के संरक्षक पारस जैन, दलीप जैन और ललित जैन के पिता 95 वर्षीय श्रावक मोहनलाल जैन ने संथारा ग्रहण किया। यह जैन धर्म की सर्वोच्च आध्यात्मिक साधनाओं में से एक है।
कालांवाली में विराजित महासाध्वी श्रेष्ठा महाराज, श्रमणी गौरव महासाध्वी चंदना महाराज, साध्वी कर्णिका और साध्वी प्रियांशी ठाणा-5 के सानिध्य में उन्हें संथारा दिलाया गया। इस दौरान जैन समाज के कई लोग उपस्थित रहे।
एसएस जैन सभा के प्रधान संदीप जैन ने बताया कि मोहनलाल जैन की आयु 95 वर्ष है। उनकी और दुग्गड़ परिवार की लंबे समय से इच्छा थी कि वे जीवन के अंतिम पड़ाव में संथारा लें। मंगलवार शाम महासाध्वी श्रेष्ठा ने धार्मिक प्रक्रिया पूरी करवाकर उन्हें संथारा प्रदान कराया।
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मोहनलाल जैन ने पुत्र पारस जैन की प्रेरणा, अपनी इच्छा और पूरे परिवार की सहमति से यह साधना स्वीकार की। संदीप जैन ने श्रद्धालुओं से उनके निवास स्थान पर दर्शन और वंदना करने की अपील की।
जैन संथारा का महत्व
जैन धर्म में संथारा को संलेखना या समाधि-मरण भी कहते हैं। यह एक आध्यात्मिक व्रत माना जाता है। इसमें साधक गुरु के मार्गदर्शन में वैराग्य और आत्मचिंतन करता है। साधक समभाव के साथ जीवन के अंतिम चरण को स्वीकार करता है। जैन परंपरा के अनुसार इसमें आहार का त्याग, ध्यान, स्वाध्याय, क्षमायाचना और आत्मशुद्धि की साधना की जाती है।
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कालांवाली। एसएस जैन सभा के संरक्षक पारस जैन, दलीप जैन और ललित जैन के पिता 95 वर्षीय श्रावक मोहनलाल जैन ने संथारा ग्रहण किया। यह जैन धर्म की सर्वोच्च आध्यात्मिक साधनाओं में से एक है।
कालांवाली में विराजित महासाध्वी श्रेष्ठा महाराज, श्रमणी गौरव महासाध्वी चंदना महाराज, साध्वी कर्णिका और साध्वी प्रियांशी ठाणा-5 के सानिध्य में उन्हें संथारा दिलाया गया। इस दौरान जैन समाज के कई लोग उपस्थित रहे।
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एसएस जैन सभा के प्रधान संदीप जैन ने बताया कि मोहनलाल जैन की आयु 95 वर्ष है। उनकी और दुग्गड़ परिवार की लंबे समय से इच्छा थी कि वे जीवन के अंतिम पड़ाव में संथारा लें। मंगलवार शाम महासाध्वी श्रेष्ठा ने धार्मिक प्रक्रिया पूरी करवाकर उन्हें संथारा प्रदान कराया।
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मोहनलाल जैन ने पुत्र पारस जैन की प्रेरणा, अपनी इच्छा और पूरे परिवार की सहमति से यह साधना स्वीकार की। संदीप जैन ने श्रद्धालुओं से उनके निवास स्थान पर दर्शन और वंदना करने की अपील की।
जैन संथारा का महत्व
जैन धर्म में संथारा को संलेखना या समाधि-मरण भी कहते हैं। यह एक आध्यात्मिक व्रत माना जाता है। इसमें साधक गुरु के मार्गदर्शन में वैराग्य और आत्मचिंतन करता है। साधक समभाव के साथ जीवन के अंतिम चरण को स्वीकार करता है। जैन परंपरा के अनुसार इसमें आहार का त्याग, ध्यान, स्वाध्याय, क्षमायाचना और आत्मशुद्धि की साधना की जाती है।
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