{"_id":"6a2849cab6c087e572027ada","slug":"lifecity-forming-the-confluence-of-simplicity-purity-and-literacy-was-nurtured-by-the-satguru-pratap-singh-of-the-namdhari-community-in-the-name-of-mother-jeevan-kaur-shaping-the-destiny-of-the-barren-land-sirsa-news-c-21-1-hsr1007-887191-2026-06-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"Sirsa News: सादगी, शुचिता और साक्षरता की त्रिवेणी बना जीवननगर, नामधारी समुदाय के सतगुरु प्रताप सिंह ने मां जीवन कौर के नाम से संवारी उजाड़ धरा की तकदीर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Sirsa News: सादगी, शुचिता और साक्षरता की त्रिवेणी बना जीवननगर, नामधारी समुदाय के सतगुरु प्रताप सिंह ने मां जीवन कौर के नाम से संवारी उजाड़ धरा की तकदीर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Tue, 09 Jun 2026 10:43 PM IST
विज्ञापन
श्रीजीवननगर के पार्क में बैठकर बातचीत करते ग्रामीण।
- फोटो : 1
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
रानियां। तहसील मुख्यालय से 32 किलोमीटर दूर बसा गांव श्री जीवन नगर आज धार्मिक आस्था के साथ-साथ खेलों की दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। करीब 6500 की आबादी वाला यह गांव आज क्षेत्र में साक्षरता, नशामुक्ति, शुचिता और सादगी की मिसाल बन चुका है।
इतिहासकार सुरजीत सिंह ने बताया कि आजादी से पहले इस इलाके को चंचाल कोठी के नाम से जाना जाता था जहां राजस्थान के चूरू जिले के सेठ पन्नालाल का साम्राज्य था। वे यहां की करीब 12,500 एकड़ भूमि के मालिक थे। विभाजन से पूर्व नामधारी समुदाय के सतगुरु प्रताप सिंह यहां आए। उन्होंने थिराज गांव के निवासी चरण सिंह पुत्र दयाल सिंह की मध्यस्थता से सेठ पन्नालाल से यह जमीन 24 लाख रुपये में खरीदी जिसकी रजिस्ट्री 22 जनवरी 1947 को हिसार में हुई।
-- -- -- --
पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को जमीन देकर बसाया
गांव के इतिहास के बारे में बुजुर्ग बलदेव सिह बताते हैं कि विभाजन के दौरान यहां रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग पाकिस्तान चले गए। उनके स्थान पर पाकिस्तान के लायलपुर, लाहौर और मुल्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को सतगुरु प्रताप सिंह ने यहां जमीनें देकर बसाया। इसके बाद उन्होंने अपनी माता जीवन कौर की स्मृति में इस जगह का नाम श्री जीवन नगर रखा। प्राचीन समय में इसके अंतर्गत जगमलेरां (संत नगर), दमदमा, धर्मपुरा, जगजीत नगर, हरिपुरा और संतावाली जैसे गांव शामिल थे जिन्हें चंचाल कोठी की पत्ती कहा जाता था।
विज्ञापन
-- -- -
कभी ऊंचे टीले आज लहलहाती है धान
बुजुर्ग गुरदेव सिंह संधू ने बताया कि
श्री जीवन नगर की भूमि कभी बंजर हुआ करती थी जहां चारों तरफ बालू रेत के ऊंचे टीले और कंटीली झाड़ियां थीं। गांव से 4 किलोमीटर दूर बहने वाली घग्गर नदी में जब बारिश का पानी आता तो पूरा इलाका बाढ़ की चपेट में आ जाता था। उस दौर में बाढ़ के पानी के सहारे जैसे-तैसे धान और शुष्क इलाकों में बाजरा, मूंग, मोठ व गेहूं की खेती होती थी लेकिन बदलते समय के साथ भूमि उपजाऊ होती गई। कभी बाढ़ बनकर डराने वाली घग्गर नदी आज धान की खेती और जमीन को उपजाऊ बनाती है।
-- -- --
खेलों की नर्सरी : ओलंपियन सरदार सिंह जैसे दिग्गजों की कर्मभूमि
गांव के महेंद्र सिंह भिंडर ने बताया कि
श्री जीवन नगर को विशेष रूप से हॉकी और बैडमिंटन की नर्सरी माना जाता है। इसी मिट्टी से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक खिलाड़ी सरदार सिंह समेत कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकले हैं जिन्होंने वैश्विक मंच पर देश का नाम रोशन किया। गांव के पास स्थित श्री गुरु हरि सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हॉकी मैदान में आज भी श्री जीवन नगर, संत नगर, हरिपुरा, दमदमा सहित आसपास के कई गांवों के युवा सुबह-शाम अभ्यास करते हैं।
-- -- -- -
गांव नशामुक्त घोषित
गांव की विशेषता यह है कि यहां के लोग नशे जैसी सामाजिक बुराइयों से दूर हैं। बच्चे और युवा शिक्षा के साथ-साथ खेल गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। युवा सुबह-शाम प्रशिक्षित कोचों के मार्गदर्शन में विभिन्न खेलों का नियमित अभ्यास करते हैं। साक्षरता दर आसपास के गांवों की तुलना में बेहतर मानी जाती है। गांव से मात्र दो किलोमीटर दूरी पर स्थित श्री गुरु हरि सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय व उसके साथ बना हॉकी मैदान क्षेत्र के खिलाड़ियों के लिए प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र है।
-- -- -- --
शुद्ध खानपान व सादा पहनावा बना पहचान
स्थापना के समय से ही यहां के लोगों का खानपान शुद्ध और शाकाहारी रहा है। आज के आधुनिक दौर में भी यहां की महिलाएं पारंपरिक सलवार-सूट व चुनरी और पुरुष कुर्ता-पजामा, धोती व पगड़ी धारण कर अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं।
इतिहासकार सुरजीत सिंह ने बताया कि आजादी से पहले इस इलाके को चंचाल कोठी के नाम से जाना जाता था जहां राजस्थान के चूरू जिले के सेठ पन्नालाल का साम्राज्य था। वे यहां की करीब 12,500 एकड़ भूमि के मालिक थे। विभाजन से पूर्व नामधारी समुदाय के सतगुरु प्रताप सिंह यहां आए। उन्होंने थिराज गांव के निवासी चरण सिंह पुत्र दयाल सिंह की मध्यस्थता से सेठ पन्नालाल से यह जमीन 24 लाख रुपये में खरीदी जिसकी रजिस्ट्री 22 जनवरी 1947 को हिसार में हुई।
विज्ञापन
विज्ञापन
पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को जमीन देकर बसाया
गांव के इतिहास के बारे में बुजुर्ग बलदेव सिह बताते हैं कि विभाजन के दौरान यहां रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग पाकिस्तान चले गए। उनके स्थान पर पाकिस्तान के लायलपुर, लाहौर और मुल्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को सतगुरु प्रताप सिंह ने यहां जमीनें देकर बसाया। इसके बाद उन्होंने अपनी माता जीवन कौर की स्मृति में इस जगह का नाम श्री जीवन नगर रखा। प्राचीन समय में इसके अंतर्गत जगमलेरां (संत नगर), दमदमा, धर्मपुरा, जगजीत नगर, हरिपुरा और संतावाली जैसे गांव शामिल थे जिन्हें चंचाल कोठी की पत्ती कहा जाता था।
कभी ऊंचे टीले आज लहलहाती है धान
बुजुर्ग गुरदेव सिंह संधू ने बताया कि
श्री जीवन नगर की भूमि कभी बंजर हुआ करती थी जहां चारों तरफ बालू रेत के ऊंचे टीले और कंटीली झाड़ियां थीं। गांव से 4 किलोमीटर दूर बहने वाली घग्गर नदी में जब बारिश का पानी आता तो पूरा इलाका बाढ़ की चपेट में आ जाता था। उस दौर में बाढ़ के पानी के सहारे जैसे-तैसे धान और शुष्क इलाकों में बाजरा, मूंग, मोठ व गेहूं की खेती होती थी लेकिन बदलते समय के साथ भूमि उपजाऊ होती गई। कभी बाढ़ बनकर डराने वाली घग्गर नदी आज धान की खेती और जमीन को उपजाऊ बनाती है।
खेलों की नर्सरी : ओलंपियन सरदार सिंह जैसे दिग्गजों की कर्मभूमि
गांव के महेंद्र सिंह भिंडर ने बताया कि
श्री जीवन नगर को विशेष रूप से हॉकी और बैडमिंटन की नर्सरी माना जाता है। इसी मिट्टी से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक खिलाड़ी सरदार सिंह समेत कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकले हैं जिन्होंने वैश्विक मंच पर देश का नाम रोशन किया। गांव के पास स्थित श्री गुरु हरि सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हॉकी मैदान में आज भी श्री जीवन नगर, संत नगर, हरिपुरा, दमदमा सहित आसपास के कई गांवों के युवा सुबह-शाम अभ्यास करते हैं।
गांव नशामुक्त घोषित
गांव की विशेषता यह है कि यहां के लोग नशे जैसी सामाजिक बुराइयों से दूर हैं। बच्चे और युवा शिक्षा के साथ-साथ खेल गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। युवा सुबह-शाम प्रशिक्षित कोचों के मार्गदर्शन में विभिन्न खेलों का नियमित अभ्यास करते हैं। साक्षरता दर आसपास के गांवों की तुलना में बेहतर मानी जाती है। गांव से मात्र दो किलोमीटर दूरी पर स्थित श्री गुरु हरि सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय व उसके साथ बना हॉकी मैदान क्षेत्र के खिलाड़ियों के लिए प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र है।
शुद्ध खानपान व सादा पहनावा बना पहचान
स्थापना के समय से ही यहां के लोगों का खानपान शुद्ध और शाकाहारी रहा है। आज के आधुनिक दौर में भी यहां की महिलाएं पारंपरिक सलवार-सूट व चुनरी और पुरुष कुर्ता-पजामा, धोती व पगड़ी धारण कर अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं।