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Sirsa News: हुनर को मिल रही पहचान, सरकार भी दे रही प्रोत्साहन
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Thu, 29 Jan 2026 11:03 PM IST
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- पीएम विश्वकर्मा योजना : जिले में 4540 का हुआ कौशल सत्यापन, 1506 को मिली टूलकिट, 867 को मिला ऋण
संवाद न्यूज एजेंसी
सिरसा। भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्रालय की ओर से शुरू की गई पीएम विश्वकर्मा योजना का उद्देश्य हाथों और औजारों के माध्यम से कार्य करने वाले पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को पहचान देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। यह योजना असंगठित क्षेत्र में स्वरोजगार के आधार पर कार्य कर रहे परिवार आधारित पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े कारीगरों के सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
जिला एमएसएमई के उप निदेशक दिनेश कुमार ने बताया कि इस योजना का लाभ वही कारीगर उठा सकते हैं, जिनकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है। पात्रता शर्तों के अनुसार लाभार्थी ने पिछले पांच वर्षों के दौरान केंद्र या राज्य सरकार की किसी क्रेडिट आधारित योजना जैसे पीएमईजीपी, पीएम स्वनिधि या मुद्रा योजना के अंतर्गत ऋण नहीं लिया होना चाहिए। हालांकि, जिन कारीगरों ने मुद्रा या स्वनिधि योजना के तहत लिया गया ऋण पूर्ण रूप से चुका दिया है, वे पीएम विश्वकर्मा योजना के लिए पात्र होंगे। पांच वर्ष की अवधि की गणना ऋण स्वीकृति की तिथि से की जाएगी।
दिनेश कुमार ने बताया कि योजना के अंतर्गत एक परिवार के केवल एक सदस्य को ही पंजीकरण और लाभ प्रदान किया जाएगा। परिवार से आशय पति, पत्नी और अविवाहित बच्चों से है। सरकारी सेवा में कार्यरत व्यक्ति तथा उनके परिवार के सदस्य इस योजना के लिए पात्र नहीं होंगे। पीएम विश्वकर्मा योजना में बढ़ई, सुनार, लोहार, कुम्हार, दर्जी, मोची, धोबी, राजमिस्त्री, नाई, माला निर्माता, टोकरी एवं चटाई निर्माता, खिलौना निर्माता तथा मछली पकड़ने के जाल बनाने जैसे अनेक पारंपरिक व्यवसायों को शामिल किया गया है।
दिनेश कुमार ने बताया कि सिरसा जिले में अब तक 4540 पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों का कौशल सत्यापन किया जा चुका है। 3810 कारीगरों को बुनियादी प्रशिक्षण दिया गया है। इनमें से 1506 कारीगरों को 15,000 रुपये मूल्य की टूलकिट डाक विभाग के माध्यम से वितरित की गई है।
इसके साथ ही, विभिन्न बैंकों को भेजे गए 2450 आवेदनों में से 867 कारीगरों के ऋण स्वीकृत हो चुके हैं। 775 कारीगरों को ऋण राशि का वितरण किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि पीएम विश्वकर्मा योजना पारंपरिक हुनर को नई पहचान देने के साथ-साथ कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मील का पत्थर साबित हो रही है।
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सिरसा। भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्रालय की ओर से शुरू की गई पीएम विश्वकर्मा योजना का उद्देश्य हाथों और औजारों के माध्यम से कार्य करने वाले पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को पहचान देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। यह योजना असंगठित क्षेत्र में स्वरोजगार के आधार पर कार्य कर रहे परिवार आधारित पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े कारीगरों के सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
जिला एमएसएमई के उप निदेशक दिनेश कुमार ने बताया कि इस योजना का लाभ वही कारीगर उठा सकते हैं, जिनकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है। पात्रता शर्तों के अनुसार लाभार्थी ने पिछले पांच वर्षों के दौरान केंद्र या राज्य सरकार की किसी क्रेडिट आधारित योजना जैसे पीएमईजीपी, पीएम स्वनिधि या मुद्रा योजना के अंतर्गत ऋण नहीं लिया होना चाहिए। हालांकि, जिन कारीगरों ने मुद्रा या स्वनिधि योजना के तहत लिया गया ऋण पूर्ण रूप से चुका दिया है, वे पीएम विश्वकर्मा योजना के लिए पात्र होंगे। पांच वर्ष की अवधि की गणना ऋण स्वीकृति की तिथि से की जाएगी।
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दिनेश कुमार ने बताया कि योजना के अंतर्गत एक परिवार के केवल एक सदस्य को ही पंजीकरण और लाभ प्रदान किया जाएगा। परिवार से आशय पति, पत्नी और अविवाहित बच्चों से है। सरकारी सेवा में कार्यरत व्यक्ति तथा उनके परिवार के सदस्य इस योजना के लिए पात्र नहीं होंगे। पीएम विश्वकर्मा योजना में बढ़ई, सुनार, लोहार, कुम्हार, दर्जी, मोची, धोबी, राजमिस्त्री, नाई, माला निर्माता, टोकरी एवं चटाई निर्माता, खिलौना निर्माता तथा मछली पकड़ने के जाल बनाने जैसे अनेक पारंपरिक व्यवसायों को शामिल किया गया है।
दिनेश कुमार ने बताया कि सिरसा जिले में अब तक 4540 पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों का कौशल सत्यापन किया जा चुका है। 3810 कारीगरों को बुनियादी प्रशिक्षण दिया गया है। इनमें से 1506 कारीगरों को 15,000 रुपये मूल्य की टूलकिट डाक विभाग के माध्यम से वितरित की गई है।
इसके साथ ही, विभिन्न बैंकों को भेजे गए 2450 आवेदनों में से 867 कारीगरों के ऋण स्वीकृत हो चुके हैं। 775 कारीगरों को ऋण राशि का वितरण किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि पीएम विश्वकर्मा योजना पारंपरिक हुनर को नई पहचान देने के साथ-साथ कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मील का पत्थर साबित हो रही है।
