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आध्यात्मिक जीवन में केवल साधना या प्रार्थना पर्याप्त नहीं : शैलेंद्र
Fri, 31 Jul 2026 05:59 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Fri, 31 Jul 2026 05:59 PM IST
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फोटो : सोनीपत के श्री रजनीश ध्यान मंदिर, दीपालपुर में आध्यात्मिक समारोह के दौरान प्रवचन करते स्
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संवाद न्यूज एजेंसी
सोनीपत। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्री रजनीश ध्यान मंदिर, दीपालपुर में आध्यात्मिक समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साधकों ने ध्यान, गुरु-वंदना, भजन और सत्संग में भाग लिया।
इस अवसर पर स्वामी शैलेंद्र सरस्वती (ओशो अनुज) ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन में केवल साधना या प्रार्थना पर्याप्त नहीं है। जीवन की वास्तविक पूर्णता साधना, गुरु-प्रसाद और परमात्मा की कृपा के समन्वय से ही प्राप्त होती है। उन्होंने ओशो के प्रवचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि साधक का पहला दायित्व स्वयं को गुरु-कृपा ग्रहण करने योग्य बनाना है।
मनुष्य का प्रयास आवश्यक है लेकिन अंतिम उपलब्धि गुरु के आशीर्वाद और परमात्मा की कृपा से ही संभव होती है। उन्होंने ध्यान को आत्मशुद्धि और आंतरिक शांति का माध्यम बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य किसी उपलब्धि को पाना नहीं, बल्कि स्वयं को ग्रहणशील बनाना है।
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स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने सूर्य की उपमा देते हुए कहा कि सूर्य सभी को समान रूप से प्रकाश देता है लेकिन बंद खिड़कियों वाले घर में प्रकाश नहीं पहुंचता। उसी प्रकार परमात्मा की कृपा सदैव उपलब्ध रहती है, लेकिन उसका अनुभव वही कर सकता है जो स्वयं को उसके योग्य बनाता है। कार्यक्रम में मां अमृत प्रिया आदि उपस्थित रहीं।
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सोनीपत। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्री रजनीश ध्यान मंदिर, दीपालपुर में आध्यात्मिक समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साधकों ने ध्यान, गुरु-वंदना, भजन और सत्संग में भाग लिया।
इस अवसर पर स्वामी शैलेंद्र सरस्वती (ओशो अनुज) ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन में केवल साधना या प्रार्थना पर्याप्त नहीं है। जीवन की वास्तविक पूर्णता साधना, गुरु-प्रसाद और परमात्मा की कृपा के समन्वय से ही प्राप्त होती है। उन्होंने ओशो के प्रवचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि साधक का पहला दायित्व स्वयं को गुरु-कृपा ग्रहण करने योग्य बनाना है।
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मनुष्य का प्रयास आवश्यक है लेकिन अंतिम उपलब्धि गुरु के आशीर्वाद और परमात्मा की कृपा से ही संभव होती है। उन्होंने ध्यान को आत्मशुद्धि और आंतरिक शांति का माध्यम बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य किसी उपलब्धि को पाना नहीं, बल्कि स्वयं को ग्रहणशील बनाना है।
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स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने सूर्य की उपमा देते हुए कहा कि सूर्य सभी को समान रूप से प्रकाश देता है लेकिन बंद खिड़कियों वाले घर में प्रकाश नहीं पहुंचता। उसी प्रकार परमात्मा की कृपा सदैव उपलब्ध रहती है, लेकिन उसका अनुभव वही कर सकता है जो स्वयं को उसके योग्य बनाता है। कार्यक्रम में मां अमृत प्रिया आदि उपस्थित रहीं।

फोटो : सोनीपत के श्री रजनीश ध्यान मंदिर, दीपालपुर में आध्यात्मिक समारोह के दौरान प्रवचन करते स्