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Yamuna Nagar News: बलिदानी सुधीर को चार वर्षीय पुत्र आयांश ने दी मुखाग्नि
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Sun, 25 Jan 2026 02:02 AM IST
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गांव शेरपुर में बलिदानी सुधीर नरवाल के शव को चुमती पत्नी रूबी। संवाद
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संवाद न्यूज एजेंसी
छछरौली (यमुनानगर)। जम्मू-कश्मीर के डोडा में हुए भीषण सड़क हादसे में बलिदान हुए जवान सुधीर नरवाल को शुक्रवार को उनके पैतृक गांव शेरपुर में नम आंखों के साथ अंतिम विदाई दी गई। चार वर्षीय पुत्र आयांश ने बलिदानी पिता को मुखाग्नि दी। शहीद को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें सेना, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के साथ हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए।
जम्मू-कश्मीर के डोडा क्षेत्र में 22 जनवरी को सेना का एक वाहन करीब 200 मीटर गहरी खाई में गिर गया था। इस दर्दनाक हादसे में वाहन में सवार 21 जवानों में से 10 जवानों की मौके पर ही शहादत हो गई थी। इन्हीं में यमुनानगर जिले के छछरौली क्षेत्र के गांव शेरपुर निवासी जवान सुधीर नरवाल भी शामिल थे। बालिदान होने की सूचना 23 जनवरी को शाम करीब चार बजे फोन के माध्यम से परिजनों को दी गई। खराब मौसम के कारण उनका पार्थिव शरीर 24 जनवरी को दोपहर करीब 12 बजे गांव पहुंच सका।
पार्थिव शरीर के गांव पहुंचते ही माहौल गमगीन हो गया। सेना के जवानों ने शहीद को सलामी दी और पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की गई। इस अवसर पर सेना के वरिष्ठ अधिकारी मेजर मनजिंदर सिंह और मेजर प्रशांत तिवाड़ी सहित करीब 30 जवान मौजूद रहे। सुबह से ही सैकड़ों ग्रामीण और आसपास के गांवों के लोग शहीद के घर पहुंचने लगे थे, जो अंतिम संस्कार के समय हजारों में बदल गए।
शहीद सुधीर नरवाल अपने परिवार का मजबूत सहारा थे। उनके पिता का कुछ समय पहले निधन हो चुका था और वे दो बहनों के इकलौते भाई थे। शहादत की सूचना मिलने के बाद से उनकी पत्नी सदमे में हैं, वहीं मां का रो-रोकर बुरा हाल था। मां बार-बार अपने बेटे को वापस लाने की गुहार लगाती रहीं, जिसे देख वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।
अंतिम संस्कार में कैबिनेट मंत्री श्याम सिंह राणा, कंवरपाल गुर्जर, यमुनानगर विधायक घनश्याम दास अरोड़ा, भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश सपरा सहित कई प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। कैबिनेट मंत्री श्याम सिंह राणा ने कहा कि सरकार शहीद के परिवार के साथ खड़ी है और उन्हें हर संभव सहायता प्रदान की जाएगी।
मां बोलीं - मेरा सुधीर लौटा दो, पत्नी बेसुध
कौशिक खान
छछरौली। गांव शेरपुर शनिवार को एक ऐसे दर्द का गवाह बना, जिसे शब्दों में समेट पाना आसान नहीं था। जम्मू-कश्मीर के डोडा हादसे में बलिदान हुए जवान सुधीर नरवाल की अंतिम यात्रा जब गांव की गलियों से गुजरी, तो हर चेहरा आंसुओं से भीगा था। तिरंगे में लिपटी पार्थिव देह को देख गांव की महिलाएं बिलख पड़ीं और बुजुर्गों की आंखें भी भर आईं।सबसे मार्मिक दृश्य उस समय सामने आया, जब शहीद के चार वर्षीय बेटे आयांश ने अपने नन्हे हाथों से पिता को मुखाग्नि दी।मासूम को शायद यह एहसास नहीं था कि जिसे वह आखिरी बार छू रहा है, वह उसके पिता अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। कभी वह तिरंगे को देखता, तो कभी मां की ओर टकटकी लगाए खड़ा रहता। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति का कलेजा कांप उठा।शहीद की पत्नी बीते दो दिनों से सदमे में हैं। कभी चुपचाप बैठ जातीं, तो कभी सुधीर का नाम लेकर बेसुध हो जातीं। वहीं, मां का रो-रोकर बुरा हाल था। मां बार-बार यही कहती रहीं- “मेरा सुधीर मुझे लौटा दो, मैं उसे देखना चाहती हूं।” मां की यह पुकार सुनकर वहां मौजूद लोग खुद को संभाल नहीं पाए और माहौल और ज्यादा गमगीन हो गया। सुधीर परिवार के इकलौते बेटे थे।पिता का पहले ही निधन हो चुका था और दो बहनों की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर थी। गांव वालों का कहना था कि सुधीर मिलनसार और हमेशा मदद को तैयार रहने वाले जवान थे। आज उनकी शहादत ने पूरे गांव को एक परिवार की तरह जोड़ दिया।जब सेना के जवानों ने सलामी दी और ‘अमर रहे’ के नारे गूंजे, तो गर्व और गम एक साथ आंखों में उतर आए। शेरपुर ने अपने बेटे को खोया जरूर, लेकिन देश को एक ऐसा सपूत दे गया, जिसकी कुर्बानी हमेशा याद रखी जाएगी। संवाद
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छछरौली (यमुनानगर)। जम्मू-कश्मीर के डोडा में हुए भीषण सड़क हादसे में बलिदान हुए जवान सुधीर नरवाल को शुक्रवार को उनके पैतृक गांव शेरपुर में नम आंखों के साथ अंतिम विदाई दी गई। चार वर्षीय पुत्र आयांश ने बलिदानी पिता को मुखाग्नि दी। शहीद को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें सेना, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के साथ हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए।
जम्मू-कश्मीर के डोडा क्षेत्र में 22 जनवरी को सेना का एक वाहन करीब 200 मीटर गहरी खाई में गिर गया था। इस दर्दनाक हादसे में वाहन में सवार 21 जवानों में से 10 जवानों की मौके पर ही शहादत हो गई थी। इन्हीं में यमुनानगर जिले के छछरौली क्षेत्र के गांव शेरपुर निवासी जवान सुधीर नरवाल भी शामिल थे। बालिदान होने की सूचना 23 जनवरी को शाम करीब चार बजे फोन के माध्यम से परिजनों को दी गई। खराब मौसम के कारण उनका पार्थिव शरीर 24 जनवरी को दोपहर करीब 12 बजे गांव पहुंच सका।
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पार्थिव शरीर के गांव पहुंचते ही माहौल गमगीन हो गया। सेना के जवानों ने शहीद को सलामी दी और पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की गई। इस अवसर पर सेना के वरिष्ठ अधिकारी मेजर मनजिंदर सिंह और मेजर प्रशांत तिवाड़ी सहित करीब 30 जवान मौजूद रहे। सुबह से ही सैकड़ों ग्रामीण और आसपास के गांवों के लोग शहीद के घर पहुंचने लगे थे, जो अंतिम संस्कार के समय हजारों में बदल गए।
शहीद सुधीर नरवाल अपने परिवार का मजबूत सहारा थे। उनके पिता का कुछ समय पहले निधन हो चुका था और वे दो बहनों के इकलौते भाई थे। शहादत की सूचना मिलने के बाद से उनकी पत्नी सदमे में हैं, वहीं मां का रो-रोकर बुरा हाल था। मां बार-बार अपने बेटे को वापस लाने की गुहार लगाती रहीं, जिसे देख वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।
अंतिम संस्कार में कैबिनेट मंत्री श्याम सिंह राणा, कंवरपाल गुर्जर, यमुनानगर विधायक घनश्याम दास अरोड़ा, भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश सपरा सहित कई प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। कैबिनेट मंत्री श्याम सिंह राणा ने कहा कि सरकार शहीद के परिवार के साथ खड़ी है और उन्हें हर संभव सहायता प्रदान की जाएगी।
मां बोलीं - मेरा सुधीर लौटा दो, पत्नी बेसुध
कौशिक खान
छछरौली। गांव शेरपुर शनिवार को एक ऐसे दर्द का गवाह बना, जिसे शब्दों में समेट पाना आसान नहीं था। जम्मू-कश्मीर के डोडा हादसे में बलिदान हुए जवान सुधीर नरवाल की अंतिम यात्रा जब गांव की गलियों से गुजरी, तो हर चेहरा आंसुओं से भीगा था। तिरंगे में लिपटी पार्थिव देह को देख गांव की महिलाएं बिलख पड़ीं और बुजुर्गों की आंखें भी भर आईं।सबसे मार्मिक दृश्य उस समय सामने आया, जब शहीद के चार वर्षीय बेटे आयांश ने अपने नन्हे हाथों से पिता को मुखाग्नि दी।मासूम को शायद यह एहसास नहीं था कि जिसे वह आखिरी बार छू रहा है, वह उसके पिता अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। कभी वह तिरंगे को देखता, तो कभी मां की ओर टकटकी लगाए खड़ा रहता। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति का कलेजा कांप उठा।शहीद की पत्नी बीते दो दिनों से सदमे में हैं। कभी चुपचाप बैठ जातीं, तो कभी सुधीर का नाम लेकर बेसुध हो जातीं। वहीं, मां का रो-रोकर बुरा हाल था। मां बार-बार यही कहती रहीं- “मेरा सुधीर मुझे लौटा दो, मैं उसे देखना चाहती हूं।” मां की यह पुकार सुनकर वहां मौजूद लोग खुद को संभाल नहीं पाए और माहौल और ज्यादा गमगीन हो गया। सुधीर परिवार के इकलौते बेटे थे।पिता का पहले ही निधन हो चुका था और दो बहनों की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर थी। गांव वालों का कहना था कि सुधीर मिलनसार और हमेशा मदद को तैयार रहने वाले जवान थे। आज उनकी शहादत ने पूरे गांव को एक परिवार की तरह जोड़ दिया।जब सेना के जवानों ने सलामी दी और ‘अमर रहे’ के नारे गूंजे, तो गर्व और गम एक साथ आंखों में उतर आए। शेरपुर ने अपने बेटे को खोया जरूर, लेकिन देश को एक ऐसा सपूत दे गया, जिसकी कुर्बानी हमेशा याद रखी जाएगी। संवाद

गांव शेरपुर में बलिदानी सुधीर नरवाल के शव को चुमती पत्नी रूबी। संवाद

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