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Yamuna Nagar News: तेंदुओं को रास आ रहा कलेसर जंगल, संख्या 47 के पार
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Sun, 03 May 2026 01:09 AM IST
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कलेसर जंगल में सुखराओ नदी के पास विचरण करता तेंदुआ। वन्य प्राणी विभाग
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राजेश कुमार
यमुनानगर। करीब 11,570 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला कलेसर जंगल तेंदुओं को रहा आ रहा है। यहां का माहौल तेंदुओं के लिए सुरक्षित और अनुकूल आवास के रूप में उभर रहा है। वन विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार यहां तेंदुओं की संख्या बढ़कर 47 से अधिक हो चुकी है, जो वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
इतना ही नहीं वन्य प्राणी विभाग के अनुसार व्यासपुर उपमंडल के गांव संधाय और मांडेवाला के आसपास के छोटे जंगलों में भी दो से तीन तेंदुओं की मौजूदगी देखी गई है। यह संकेत है कि तेंदुए अब अपने मूल क्षेत्र से बाहर भी फैल रहे हैं और नए इलाकों में अपना ठिकाना बना रहे हैं।
वर्ष 2012 में हुए सर्वेक्षण में कलेसर के जंगलों में तेंदुओं की संख्या मात्र आठ से 10 के बीच आंकी गई थी। इसके बाद 2017 में वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को जीवों की स्थिति का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई। उस समय किए गए सर्वे में तेंदुओं की संख्या 31 पाई गई थी। अब यह आंकड़ा बढ़कर 47 के पार पहुंच गया है।
वन विभाग ने जंगल में तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कैमरे लगाए हैं। इन कैमरों के माध्यम से उनकी संख्या, गतिविधियों और आवागमन पर लगातार निगरानी की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार तेंदुओं के बढ़ने का मुख्य कारण यहां भोजन और पानी की पर्याप्त उपलब्धता है।
कलेसर के जंगल में हिरण, सांभर और काकड़ जैसे शाकाहारी वन्यजीव बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जो तेंदुओं के प्रमुख शिकार हैं। इसके अलावा जंगली सुअर, नीलगाय और खरगोश भी उनकी भोजन श्रृंखला का हिस्सा हैं। जंगल के साथ बहने वाली यमुना नदी और वन विभाग द्वारा अंदर बनाई गई जल व्यवस्थाएं भी वन्यजीवों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही हैं।
कलेसर के साथ उत्तराखंड का राजाजी नेशनल पार्क और हिमाचल प्रदेश के जंगल भी जुड़े हैं। इस कारण तेंदुए इन क्षेत्रों के बीच आसानी से आवाजाही करते रहते हैं, जिससे उनकी संख्या और विस्तार में वृद्धि होती है। कलेसर में तेंदुओं की बढ़ती संख्या न केवल जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। संवाद
किसानों के लिए भी लाभकारी तेंदुओं की बढ़ती संख्या
जंगलों में तेंदुओं की मौजूदगी पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिन क्षेत्रों में तेंदुओं की संख्या कम होती है, वहां बंदर और जंगली सुअरों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है, जिससे किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचता है। तेंदुओं के डर से बंदर पेड़ों पर ही सीमित रहते हैं और जंगली सुअर छिपकर रहते हैं, जिससे उनकी संख्या नियंत्रित रहती है। मादा तेंदुआ का गर्भकाल लगभग 90 से 105 दिन का होता है और वह एक बार में एक से तीन शावकों को जन्म देती है।
कलेसर नेशनल पार्क में तेंदुए समेत सभी वन्य प्राणियों के लिए अनुकूल वातावरण है। यहां पर पर्याप्त भोजन की व्यवस्था होती है वहां पर तेंदुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है। जंगल में घास के मैदान बढ़ाने की योजना भी तैयार की जा रही है, जिससे तेंदुओं को इसमें शिकार करने में कोई दिक्कत न हो। - ज्योति कुमार, इंस्पेक्टर, वन्य प्राणी विभाग।
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यमुनानगर। करीब 11,570 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला कलेसर जंगल तेंदुओं को रहा आ रहा है। यहां का माहौल तेंदुओं के लिए सुरक्षित और अनुकूल आवास के रूप में उभर रहा है। वन विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार यहां तेंदुओं की संख्या बढ़कर 47 से अधिक हो चुकी है, जो वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
इतना ही नहीं वन्य प्राणी विभाग के अनुसार व्यासपुर उपमंडल के गांव संधाय और मांडेवाला के आसपास के छोटे जंगलों में भी दो से तीन तेंदुओं की मौजूदगी देखी गई है। यह संकेत है कि तेंदुए अब अपने मूल क्षेत्र से बाहर भी फैल रहे हैं और नए इलाकों में अपना ठिकाना बना रहे हैं।
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वर्ष 2012 में हुए सर्वेक्षण में कलेसर के जंगलों में तेंदुओं की संख्या मात्र आठ से 10 के बीच आंकी गई थी। इसके बाद 2017 में वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को जीवों की स्थिति का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई। उस समय किए गए सर्वे में तेंदुओं की संख्या 31 पाई गई थी। अब यह आंकड़ा बढ़कर 47 के पार पहुंच गया है।
वन विभाग ने जंगल में तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कैमरे लगाए हैं। इन कैमरों के माध्यम से उनकी संख्या, गतिविधियों और आवागमन पर लगातार निगरानी की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार तेंदुओं के बढ़ने का मुख्य कारण यहां भोजन और पानी की पर्याप्त उपलब्धता है।
कलेसर के जंगल में हिरण, सांभर और काकड़ जैसे शाकाहारी वन्यजीव बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जो तेंदुओं के प्रमुख शिकार हैं। इसके अलावा जंगली सुअर, नीलगाय और खरगोश भी उनकी भोजन श्रृंखला का हिस्सा हैं। जंगल के साथ बहने वाली यमुना नदी और वन विभाग द्वारा अंदर बनाई गई जल व्यवस्थाएं भी वन्यजीवों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही हैं।
कलेसर के साथ उत्तराखंड का राजाजी नेशनल पार्क और हिमाचल प्रदेश के जंगल भी जुड़े हैं। इस कारण तेंदुए इन क्षेत्रों के बीच आसानी से आवाजाही करते रहते हैं, जिससे उनकी संख्या और विस्तार में वृद्धि होती है। कलेसर में तेंदुओं की बढ़ती संख्या न केवल जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। संवाद
किसानों के लिए भी लाभकारी तेंदुओं की बढ़ती संख्या
जंगलों में तेंदुओं की मौजूदगी पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिन क्षेत्रों में तेंदुओं की संख्या कम होती है, वहां बंदर और जंगली सुअरों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है, जिससे किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचता है। तेंदुओं के डर से बंदर पेड़ों पर ही सीमित रहते हैं और जंगली सुअर छिपकर रहते हैं, जिससे उनकी संख्या नियंत्रित रहती है। मादा तेंदुआ का गर्भकाल लगभग 90 से 105 दिन का होता है और वह एक बार में एक से तीन शावकों को जन्म देती है।
कलेसर नेशनल पार्क में तेंदुए समेत सभी वन्य प्राणियों के लिए अनुकूल वातावरण है। यहां पर पर्याप्त भोजन की व्यवस्था होती है वहां पर तेंदुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है। जंगल में घास के मैदान बढ़ाने की योजना भी तैयार की जा रही है, जिससे तेंदुओं को इसमें शिकार करने में कोई दिक्कत न हो। - ज्योति कुमार, इंस्पेक्टर, वन्य प्राणी विभाग।

कलेसर जंगल में सुखराओ नदी के पास विचरण करता तेंदुआ। वन्य प्राणी विभाग
