{"_id":"6a62757da2713210ee02181f","slug":"sadhaura-is-a-symbol-of-the-shared-heritage-of-sikhs-and-muslims-yamuna-nagar-news-c-246-1-sknl1023-160020-2026-07-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"Yamuna Nagar News: सिख व मुसलमानों की साझा विरासत का प्रतीक है साढौरा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Yamuna Nagar News: सिख व मुसलमानों की साझा विरासत का प्रतीक है साढौरा
विज्ञापन
बंदा सिंह बहादुर की स्मृति में बनाया गया गुरुद्वारा साहिब। संवाद
- फोटो : 1
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
साहिल घई
साढौरा। जिले का ऐतिहासिक कस्बा साढौरा गौरवशाली अतीत, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के कारण देशभर में विशेष पहचान रखता है। इतिहासकारों के अनुसार इसका प्राचीन नाम साधु-राहा था। मान्यता है कि हिमालय की ओर जाने वाले साधु-संतों का यह प्रमुख मार्ग और विश्राम स्थल हुआ करता था। समय के साथ साधु-राहा का नाम बदलते-बदलते साढौरा हो गया।
करीब 191 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह प्राचीन कस्बा नकटी नदी के किनारे बसा है। साढौरा का इतिहास केवल मध्यकाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें महाभारत काल और द्वापर युग की मान्यताओं से भी जुड़ी मानी जाती हैं।
मध्यकाल में साढौरा सूफी संतों की कर्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध रहा। महान सूफी संत पीर बुद्धू शाह (बदरुद्दीन) की जन्मस्थली होने के कारण यह कस्बा सिख और मुस्लिम दोनों समुदायों की साझा विरासत का प्रतीक माना जाता है। पीर बुद्धू शाह ने दसवें सिख गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का कठिन समय में साथ दिया और 1686 के भंगाणी युद्ध में उनके समर्थन में अपने अनुयायियों को भेजा।
विज्ञापन
गुरु के प्रति उनकी निष्ठा के कारण तत्कालीन मुगल फौजदार उस्मान खान ने वर्ष 1704 में उन्हें यातनाएं देकर शहीद कर दिया। सिख इतिहास में साढौरा का महत्व और बढ़ जाता है, जब 1709 में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने यहां आक्रमण कर अत्याचारी फौजदार उस्मान खान को पराजित किया। इसे पीर बुद्धू शाह की शहादत का प्रतिशोध भी माना जाता है। आज भी कस्बे में स्थित किला गुरुद्वारा, जिसे कातलगढ़ के नाम से भी जाना जाता है, इस ऐतिहासिक घटना का साक्षी है। साढौरा धार्मिक विविधता की अद्भुत मिसाल भी है। यहां स्थित मनोकामना मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, रोजा पीर दरगाह और अन्य प्राचीन धार्मिक स्थल लोगों की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। धार्मिक और सामाजिक आयोजन में सभी समुदायों की भागीदारी देखने को मिलती है। यही सामाजिक समरसता इस गांव की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। संवाद
मीठे पानी के लिए भी था प्रसिद्ध
एक समय साढौरा अपने मीठे पानी के कुओं के लिए भी प्रसिद्ध था। राजस्व विभाग के पुराने अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1970 तक कस्बे में 62 कुएं थे। लगभग हर मोहल्ले में कई-कई कुएं मौजूद थे और कई मोहल्लों की पहचान उन्हीं कुओं के नाम से होती थी। आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था आने के बाद अधिकांश कुएं इतिहास का हिस्सा बन गए, लेकिन बुजुर्ग आज भी उनकी यादें संजोए हुए हैं।
प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण
वर्तमान में साढौरा प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां उप तहसील, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), बीडीपीओ कार्यालय, बस स्टैंड सहित कई सरकारी कार्यालय संचालित हैं। विधानसभा क्षेत्र के रूप में यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। आबादी लगभग 16 हजार है। मतदाताओं की संख्या 11,500 से अधिक है।
विज्ञापन
साढौरा। जिले का ऐतिहासिक कस्बा साढौरा गौरवशाली अतीत, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के कारण देशभर में विशेष पहचान रखता है। इतिहासकारों के अनुसार इसका प्राचीन नाम साधु-राहा था। मान्यता है कि हिमालय की ओर जाने वाले साधु-संतों का यह प्रमुख मार्ग और विश्राम स्थल हुआ करता था। समय के साथ साधु-राहा का नाम बदलते-बदलते साढौरा हो गया।
करीब 191 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह प्राचीन कस्बा नकटी नदी के किनारे बसा है। साढौरा का इतिहास केवल मध्यकाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें महाभारत काल और द्वापर युग की मान्यताओं से भी जुड़ी मानी जाती हैं।
विज्ञापन
मध्यकाल में साढौरा सूफी संतों की कर्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध रहा। महान सूफी संत पीर बुद्धू शाह (बदरुद्दीन) की जन्मस्थली होने के कारण यह कस्बा सिख और मुस्लिम दोनों समुदायों की साझा विरासत का प्रतीक माना जाता है। पीर बुद्धू शाह ने दसवें सिख गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का कठिन समय में साथ दिया और 1686 के भंगाणी युद्ध में उनके समर्थन में अपने अनुयायियों को भेजा।
विज्ञापन
गुरु के प्रति उनकी निष्ठा के कारण तत्कालीन मुगल फौजदार उस्मान खान ने वर्ष 1704 में उन्हें यातनाएं देकर शहीद कर दिया। सिख इतिहास में साढौरा का महत्व और बढ़ जाता है, जब 1709 में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने यहां आक्रमण कर अत्याचारी फौजदार उस्मान खान को पराजित किया। इसे पीर बुद्धू शाह की शहादत का प्रतिशोध भी माना जाता है। आज भी कस्बे में स्थित किला गुरुद्वारा, जिसे कातलगढ़ के नाम से भी जाना जाता है, इस ऐतिहासिक घटना का साक्षी है। साढौरा धार्मिक विविधता की अद्भुत मिसाल भी है। यहां स्थित मनोकामना मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, रोजा पीर दरगाह और अन्य प्राचीन धार्मिक स्थल लोगों की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। धार्मिक और सामाजिक आयोजन में सभी समुदायों की भागीदारी देखने को मिलती है। यही सामाजिक समरसता इस गांव की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। संवाद
मीठे पानी के लिए भी था प्रसिद्ध
एक समय साढौरा अपने मीठे पानी के कुओं के लिए भी प्रसिद्ध था। राजस्व विभाग के पुराने अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1970 तक कस्बे में 62 कुएं थे। लगभग हर मोहल्ले में कई-कई कुएं मौजूद थे और कई मोहल्लों की पहचान उन्हीं कुओं के नाम से होती थी। आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था आने के बाद अधिकांश कुएं इतिहास का हिस्सा बन गए, लेकिन बुजुर्ग आज भी उनकी यादें संजोए हुए हैं।
प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण
वर्तमान में साढौरा प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां उप तहसील, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), बीडीपीओ कार्यालय, बस स्टैंड सहित कई सरकारी कार्यालय संचालित हैं। विधानसभा क्षेत्र के रूप में यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। आबादी लगभग 16 हजार है। मतदाताओं की संख्या 11,500 से अधिक है।

बंदा सिंह बहादुर की स्मृति में बनाया गया गुरुद्वारा साहिब। संवाद- फोटो : 1