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Yamuna Nagar News: विभाजन का दर्द देखा, खाली हाथ भारत पहुंचे, मेहनत से बनाई पहचान
Fri, 14 Aug 2026 01:36 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Fri, 14 Aug 2026 01:36 AM IST
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महाराज कृष्ण पुरी।
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अशोक कुमार
यमुनानगर। कुछ लोग उम्र नहीं, इतिहास जीते हैं। महाराज कृष्ण पुरी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने भारत विभाजन की त्रासदी को अपनी आंखों से देखा और फिर नए भारत में शून्य से जीवन शुरू कर मेहनत, अनुशासन और सेवा के बल पर अपनी पहचान बनाई। जीवन के 100वें वर्ष में पहुंच चुके कृष्ण पुरी आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं। वह आरएसएस के वरिष्ठ स्वयंसेवक भी हैं।
उनका जन्म तत्कालीन भारत और वर्तमान पाकिस्तान के गुजरात क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता प्रतिष्ठित वकील थे। बचपन से ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाते थे और व्यायाम के प्रति विशेष रुचि रखते थे। वर्ष 1947 में विभाजन के दौरान हालात तेजी से बिगड़ने लगे। उन्होंने बताया कि लगभग पूरा हिंदू शहर खाली हो गया था।
लोगों के मकान और दुकानें लूट ली गईं। उनका परिवार भी मकान छोड़कर ट्रक से भारत की ओर रवाना हुआ। पिता, ताया और बुआ बाद में ट्रेन से भारत आए। विभाजन की याद करते हुए कृष्ण पुरी बताते हैं कि उनके पड़ोसी मौलवी जहरुद्दीन का परिवार अच्छा मुस्लिम परिवार था। भारत आने से पहले उनके पिता ने मकान की चाबियां मौलवी साहब को सौंपते हुए कहा था कि यदि कभी वापस लौटे तो चाबियां ले लेंगे, अन्यथा मकान संभाल लें।
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वह बताते हैं कि कुछ मुस्लिम परिवारों ने भी इंसानियत का परिचय दिया। उनके अनुसार, विभाजन के लिए धार्मिक नेताओं की भूमिका जिम्मेदार रही, लेकिन वह मानते हैं कि मुस्लिम भी अन्य लोगों की तरह अच्छे इंसान हो सकते हैं। भारत पहुंचने के बाद परिवार के सामने आर्थिक संकट था।
उन्होंने दिन में कार रिपेयर की वर्कशॉप में काम किया और शाम को नाइट कॉलेज में पढ़ाई की। दो साल की मेहनत के बाद उन्होंने बीए की पढ़ाई पूरी की और ट्रैक्टर मैकेनिक का प्रशिक्षण भी हासिल किया। इसके बाद उन्हें ट्रैक्टरों की ट्रेनिंग का अवसर मिला और इसी क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने परिवार को दोबारा संभाला।
विवाह के बाद वह हरियाणा के यमुनानगर में बस गए। तब यहां कैंपों में रह कर जीवन यापन करना पड़ा। यहां उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दोबारा सक्रिय रूप से जुड़कर सेवा कार्य किया। 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें अन्य स्वयंसेवकों के साथ जेल भी जाना पड़ा। सेवा भारती और संस्कार भारती से जुड़े रहकर उन्होंने सामाजिक कार्यों में योगदान दिया। उनकी जिंदगी में मित्रता का भी विशेष स्थान रहा। संवाद
भारत में मिले बालवीर नंदा 60 वर्षों तक रहे मित्र
विभाजन के बाद भारत में मिले बालवीर नंदा 60 वर्षों तक मित्र रहे। कृष्ण पुरी का संगीत से भी गहरा लगाव रहा। वह बांसुरी और हारमोनियम बजाते थे तथा भजन-कीर्तन में रुचि रखते थे। परिवार में नियमित सत्संग और धर्म चर्चा की परंपरा बनाई, ताकि बच्चों को संस्कार मिल सकें। उनके बेटों गिरीश पुरी व संजीव पुरी की गिनती बड़े कारोबारियों में होती है। समाज में विशेष पहचान बनाई है।
बच्चों को सही संस्कार और दिशा मिले
कृष्ण पुरी का मानना है कि बच्चों को सही संस्कार और दिशा मिले तो देश का भविष्य मजबूत होगा। आज उम्र के इस पड़ाव पर सक्रियता भले कम हुई हो, लेकिन उनका सकारात्मक दृष्टिकोण और मधुर व्यवहार अब भी कायम है। विभाजन का दर्द झेल कर भारत में नई जिंदगी खड़ी करने वाली यह पीढ़ी धीरे-धीरे इतिहास बन रही है, लेकिन कृष्ण पुरी की संघर्ष और सेवा की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।
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यमुनानगर। कुछ लोग उम्र नहीं, इतिहास जीते हैं। महाराज कृष्ण पुरी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने भारत विभाजन की त्रासदी को अपनी आंखों से देखा और फिर नए भारत में शून्य से जीवन शुरू कर मेहनत, अनुशासन और सेवा के बल पर अपनी पहचान बनाई। जीवन के 100वें वर्ष में पहुंच चुके कृष्ण पुरी आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं। वह आरएसएस के वरिष्ठ स्वयंसेवक भी हैं।
उनका जन्म तत्कालीन भारत और वर्तमान पाकिस्तान के गुजरात क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता प्रतिष्ठित वकील थे। बचपन से ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाते थे और व्यायाम के प्रति विशेष रुचि रखते थे। वर्ष 1947 में विभाजन के दौरान हालात तेजी से बिगड़ने लगे। उन्होंने बताया कि लगभग पूरा हिंदू शहर खाली हो गया था।
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लोगों के मकान और दुकानें लूट ली गईं। उनका परिवार भी मकान छोड़कर ट्रक से भारत की ओर रवाना हुआ। पिता, ताया और बुआ बाद में ट्रेन से भारत आए। विभाजन की याद करते हुए कृष्ण पुरी बताते हैं कि उनके पड़ोसी मौलवी जहरुद्दीन का परिवार अच्छा मुस्लिम परिवार था। भारत आने से पहले उनके पिता ने मकान की चाबियां मौलवी साहब को सौंपते हुए कहा था कि यदि कभी वापस लौटे तो चाबियां ले लेंगे, अन्यथा मकान संभाल लें।
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वह बताते हैं कि कुछ मुस्लिम परिवारों ने भी इंसानियत का परिचय दिया। उनके अनुसार, विभाजन के लिए धार्मिक नेताओं की भूमिका जिम्मेदार रही, लेकिन वह मानते हैं कि मुस्लिम भी अन्य लोगों की तरह अच्छे इंसान हो सकते हैं। भारत पहुंचने के बाद परिवार के सामने आर्थिक संकट था।
उन्होंने दिन में कार रिपेयर की वर्कशॉप में काम किया और शाम को नाइट कॉलेज में पढ़ाई की। दो साल की मेहनत के बाद उन्होंने बीए की पढ़ाई पूरी की और ट्रैक्टर मैकेनिक का प्रशिक्षण भी हासिल किया। इसके बाद उन्हें ट्रैक्टरों की ट्रेनिंग का अवसर मिला और इसी क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने परिवार को दोबारा संभाला।
विवाह के बाद वह हरियाणा के यमुनानगर में बस गए। तब यहां कैंपों में रह कर जीवन यापन करना पड़ा। यहां उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दोबारा सक्रिय रूप से जुड़कर सेवा कार्य किया। 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें अन्य स्वयंसेवकों के साथ जेल भी जाना पड़ा। सेवा भारती और संस्कार भारती से जुड़े रहकर उन्होंने सामाजिक कार्यों में योगदान दिया। उनकी जिंदगी में मित्रता का भी विशेष स्थान रहा। संवाद
भारत में मिले बालवीर नंदा 60 वर्षों तक रहे मित्र
विभाजन के बाद भारत में मिले बालवीर नंदा 60 वर्षों तक मित्र रहे। कृष्ण पुरी का संगीत से भी गहरा लगाव रहा। वह बांसुरी और हारमोनियम बजाते थे तथा भजन-कीर्तन में रुचि रखते थे। परिवार में नियमित सत्संग और धर्म चर्चा की परंपरा बनाई, ताकि बच्चों को संस्कार मिल सकें। उनके बेटों गिरीश पुरी व संजीव पुरी की गिनती बड़े कारोबारियों में होती है। समाज में विशेष पहचान बनाई है।
बच्चों को सही संस्कार और दिशा मिले
कृष्ण पुरी का मानना है कि बच्चों को सही संस्कार और दिशा मिले तो देश का भविष्य मजबूत होगा। आज उम्र के इस पड़ाव पर सक्रियता भले कम हुई हो, लेकिन उनका सकारात्मक दृष्टिकोण और मधुर व्यवहार अब भी कायम है। विभाजन का दर्द झेल कर भारत में नई जिंदगी खड़ी करने वाली यह पीढ़ी धीरे-धीरे इतिहास बन रही है, लेकिन कृष्ण पुरी की संघर्ष और सेवा की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।