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Bilaspur News: बिजली बोर्ड के सेवानिवृत्त कर्मचारी को कार हादसे में लगी थी चोटें

संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर Updated Fri, 15 May 2026 06:52 PM IST
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A retired electricity board employee was injured in a car accident.
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आठ साल बाद वारिसों को एमएसीटी घुमारवीं से मिल मुआवजा

चालक की लापरवाही मानी, बीमा कंपनी को 9 प्रतिशत ब्याज सहित 25 हजार रुपये देने के आदेश

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। ऊना से शादी समारोह से लौट रहे बिजली विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारी के सड़क हादसे में घायल होने के मामले में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण घुमारवीं ने बड़ा फैसला सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने चालक की लापरवाही को हादसे का कारण मानते हुए मृतक के कानूनी वारिसों को 25 हजार रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए हैं। यह राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करनी होगी। यह फैसला मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण घुमारवीं के पीठासीन ने सुनाया।
अदालत में दायर याचिका के अनुसार गांव बडोटा, डाकघर लुहारवीं, तहसील घुमारवीं निवासी परस राम 12 मई 2018 को ऊना में एक शादी समारोह में शामिल होने गए थे। वापसी के दौरान वह वाहन में अन्य लोगों के साथ घर लौट रहे थे। जब वाहन बाड़ी कलां के पास पहुंचा तो चालक ने कथित रूप से तेज और लापरवाही से वाहन चलाते हुए नियंत्रण खो दिया। वाहन सड़क के डिवाइडर से जा टकराया। हादसे में परसराम को कई गंभीर चोटें आईं। उनके बाएं कंधे में फ्रैक्चर हुआ और वह लंबे समय तक बिस्तर पर रहे। उन्हें तुरंत सीएचसी घुमारवीं पहुंचाया गया। मामले में थाना भराड़ी में एफआईआर दर्ज की गई थी। परसराम ने दावा याचिका में कहा था कि वह बिजली बोर्ड से सेवानिवृत्त कर्मचारी थे और साथ ही कृषि कार्य भी करते थे। उनकी मासिक आय करीब 60 हजार रुपये थी। दुर्घटना के बाद इलाज, दवाइयों और अन्य खर्चों पर भारी रकम खर्च हुई। हादसे के कारण उन्हें शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी। इसी आधार पर उन्होंने 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी। वाहन मालिक और चालक ने अदालत में संयुक्त जवाब दाखिल करते हुए कहा कि दुर्घटना चालक की लापरवाही से नहीं हुई। उनका कहना था कि अचानक सड़क पर आवारा पशु आ गया था, जिससे वाहन अनियंत्रित हो गया। उन्होंने यह भी दलील दी कि संभव है परसराम वाहन से खुद कूदे हों और इसी कारण उन्हें चोटें लगी हों। वहीं बीमा कंपनी यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने भी दावा याचिका का विरोध करते हुए वाहन के दस्तावेज, बीमा शर्तों और दुर्घटना के तरीके पर सवाल उठाए।
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सुनवाई के दौरान परसराम ने स्वयं अदालत में गवाही दी। उनके अलावा पुलिस कर्मी रमेश कुमार को भी गवाह के रूप में पेश किया गया, जिन्होंने एफआईआर की प्रति अदालत में प्रस्तुत की। अदालत ने पाया कि पुलिस जांच और चालान में चालक की लापरवाही सामने आई थी। ट्रिब्यूनल ने कहा कि चालक और मालिक ने आवारा पशु संबंधी अपने दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया। केवल जवाब में आरोप लगाने से तथ्य साबित नहीं हो जाते। मामले की सुनवाई के दौरान परसराम की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी शकुंतला देवी, बेटियां संतोष, वीणा, रेनू और बेटा विकास शर्मा को कानूनी वारिस के रूप में मामले में शामिल किया गया। बीमा कंपनी की ओर से दलील दी गई कि घायल व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद उसके वारिस मुआवजे के हकदार नहीं हैं, लेकिन अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए इस तर्क को खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि परसराम ने इलाज संबंधी मूल मेडिकल बिल अदालत में पेश नहीं किए। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि इलाज का खर्च बोर्ड की ओर से आंशिक रूप से वापस कर दिया गया था। इसके अलावा दुर्घटना के कारण किसी स्थायी विकलांगता का भी रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। इसी कारण अदालत ने इलाज खर्च, भविष्य की आय में कमी या अन्य मदों में मुआवजा देने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने माना कि हादसे के कारण परसराम को दर्द, पीड़ा और मानसिक कष्ट झेलना पड़ा। इसी आधार पर 25 हजार रुपये मुआवजा तय किया गया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दुर्घटना के समय वाहन का बीमा वैध था और चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस भी मौजूद था। ऐसे में वाहन मालिक और चालक संयुक्त रूप से जिम्मेदार होंगे, जबकि बीमा कंपनी को पूरी राशि जमा करनी होगी। ट्रिब्यूनल ने आदेश दिए कि मुआवजे की राशि 9 प्रतिशत ब्याज सहित सभी कानूनी वारिसों में बराबर बांटी जाए।
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