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Bilaspur News: आधुनिक कृषि से घटी बैलों की भूमिका, गांवों की बदली सामाजिक-आर्थिक तस्वीर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sun, 14 Jun 2026 11:57 PM IST
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सिकरोहा के जनेड गांव में बैलों से मक्की की बिजाई करता एक किसान। संवाद
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गोपाल शर्मा
जुखाला (बिलासपुर)। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कभी धुरी रहे बैलों की भूमिका आधुनिक कृषि के कारण तेजी से घट गई है। खेतों में मशीनों के बढ़ते उपयोग से बैल अब सड़कों पर लावारिस घूमते नजर आ रहे हैं। इससे गांवों की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है।
एक समय था जब खेती-बाड़ी से लेकर किसान के दैनिक जीवन तक बैलों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। खेतों की जुताई, बुवाई और अन्य कृषि कार्य पूरी तरह बैलों पर निर्भर थे। किसान अपने बैलों को परिवार के सदस्य की तरह संभालता था। उनकी सेहत का विशेष ध्यान रखता था। बैलों के गले में बंधी घंटियों की मधुर आवाज किसान की थकान दूर कर देती थी। ग्रामीण जीवन में खेती से जुड़े अधिकांश उपकरण स्थानीय स्तर पर तैयार होते थे। गांव का पूरा सामाजिक और आर्थिक तंत्र कृषि एवं पशुधन के इर्द-गिर्द घूमता था। खेती केवल रोजगार नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। कड़ी मेहनत और प्राकृतिक जीवनशैली के कारण लोग स्वस्थ रहते थे।
बैलों की उपेक्षा और दुर्घटनाएं
समय के साथ कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव आए हैं। आधुनिक कृषि यंत्रों, ट्रैक्टरों और पावर टीलरों ने बैलों की जगह ले ली है। मशीनों ने खेती को आसान बनाया, लेकिन बैलों की उपयोगिता लगातार कम होती गई। कृषि उत्पादों के उचित दाम न मिलने से खेती भी किसानों के लिए लाभ का सौदा नहीं रही। परिणामस्वरूप, जो बैल कभी किसान की प्रतिष्ठा थे, वे आज सड़कों पर आवारा घूमते हैं।
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परंपरागत खेती को सहेजने का प्रयास
भोजन और देखभाल के अभाव में ये पशु दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। पशु मेलों और मंडियों में भी बैलों की उपयोगिता अब केवल पारंपरिक रस्मों तक सीमित है। ग्रामीण बुजुर्गों का कहना है कि जिस गोवंश के नाम की झूठी कसम तक खाने से लोग डरते थे, वही आज उपेक्षा का शिकार है। हालांकि, कुछ किसान आज भी परंपरागत खेती को जीवित रखे हुए हैं। वे बैलों के माध्यम से खेती-बाड़ी कर ग्रामीण संस्कृति को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं।
जुखाला (बिलासपुर)। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कभी धुरी रहे बैलों की भूमिका आधुनिक कृषि के कारण तेजी से घट गई है। खेतों में मशीनों के बढ़ते उपयोग से बैल अब सड़कों पर लावारिस घूमते नजर आ रहे हैं। इससे गांवों की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है।
एक समय था जब खेती-बाड़ी से लेकर किसान के दैनिक जीवन तक बैलों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। खेतों की जुताई, बुवाई और अन्य कृषि कार्य पूरी तरह बैलों पर निर्भर थे। किसान अपने बैलों को परिवार के सदस्य की तरह संभालता था। उनकी सेहत का विशेष ध्यान रखता था। बैलों के गले में बंधी घंटियों की मधुर आवाज किसान की थकान दूर कर देती थी। ग्रामीण जीवन में खेती से जुड़े अधिकांश उपकरण स्थानीय स्तर पर तैयार होते थे। गांव का पूरा सामाजिक और आर्थिक तंत्र कृषि एवं पशुधन के इर्द-गिर्द घूमता था। खेती केवल रोजगार नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। कड़ी मेहनत और प्राकृतिक जीवनशैली के कारण लोग स्वस्थ रहते थे।
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बैलों की उपेक्षा और दुर्घटनाएं
समय के साथ कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव आए हैं। आधुनिक कृषि यंत्रों, ट्रैक्टरों और पावर टीलरों ने बैलों की जगह ले ली है। मशीनों ने खेती को आसान बनाया, लेकिन बैलों की उपयोगिता लगातार कम होती गई। कृषि उत्पादों के उचित दाम न मिलने से खेती भी किसानों के लिए लाभ का सौदा नहीं रही। परिणामस्वरूप, जो बैल कभी किसान की प्रतिष्ठा थे, वे आज सड़कों पर आवारा घूमते हैं।
परंपरागत खेती को सहेजने का प्रयास
भोजन और देखभाल के अभाव में ये पशु दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। पशु मेलों और मंडियों में भी बैलों की उपयोगिता अब केवल पारंपरिक रस्मों तक सीमित है। ग्रामीण बुजुर्गों का कहना है कि जिस गोवंश के नाम की झूठी कसम तक खाने से लोग डरते थे, वही आज उपेक्षा का शिकार है। हालांकि, कुछ किसान आज भी परंपरागत खेती को जीवित रखे हुए हैं। वे बैलों के माध्यम से खेती-बाड़ी कर ग्रामीण संस्कृति को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं।