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Bilaspur News: भाद्रपद शुरू होते ही गोबिंद सागर झील में लोग तारने लगे बेड़े
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गोबिंदसागर झील किनारे बेड़ा तारने की रस्म पूरी करते लोग। संवाद
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ऋषिकेश समेत कई घाटों पर पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु, पूजा-अर्चना कर परिवार और पूर्वजों की सुख-शांति की कामना
वैतरणी नदी पार कराने की मान्यता से जुड़ी है बेड़ा तारने की परंपरा
संवाद न्यूज एजेंसी
ऋषिकेश (बिलासपुर)। भाद्रपद मास शुरू होते ही गोबिंद सागर झील में बेड़ा तारने की सदियों पुरानी परंपरा भी शुरू हो गई है। भाद्रपद के पहले ही दिन सोमवार को झील के किनारे स्थित ऋषिकेश समेत विभिन्न घाटों पर सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचे। लोगों ने विधिवत पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और पूर्वजों की शांति की कामना के साथ बेड़ा तारने की परंपरा निभाई। सुबह से ही घाटों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई थी और दिनभर धार्मिक माहौल बना रहा।
बताया जाता है कि गोबिंद सागर झील के किनारे बेड़ा तारने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। भादों का महीना शुरू होते ही आसपास के क्षेत्रों के लोग इस धार्मिक परंपरा को निभाने के लिए झील के घाटों पर पहुंचते हैं। इसके लिए परिवार पहले से पूजा की तैयारियां करते हैं और प्रसाद व अन्य सामग्री लेकर घाट पर आते हैं। सदियों से चली आ रही इस परंपरा को लोग आज भी पूरी आस्था और विश्वास के साथ निभा रहे हैं। झील के किनारे स्थित लुहणू घाट, ऋषिकेश घाट, बैरी और नाले नौण में बेड़ा तारने की परंपरा निभाई जाती है। इनमें ऋषिकेश घाट पर बेड़ा तारने का विशेष महत्व बताया जाता है। भाद्रपद मास में इन घाटों पर दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। पहले दिन भी घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और अपनी बारी के अनुसार धार्मिक रस्में पूरी कीं। यह सिलसिला पूरे भाद्रपद मास में करीब एक माह तक चलता है। बेड़ा तारने की प्रक्रिया भी अपने आप में धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। परिवार के लोग घर से प्रसाद और पूजा की अन्य सामग्री लेकर घाट पर पहुंचते हैं। यहां पंडित वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा करवाते हैं। इसके बाद मल्लाह को वस्त्र और अन्य अलंकार भेंट स्वरूप दिए जाते हैं। कई लोग सोने की अंगूठियां, कपड़े और खाद्य सामग्री भी भेंट करते हैं। धार्मिक विधि पूरी होने के बाद बेड़ा तारने वाले परिवार के सदस्यों और उनके साथ आए अन्य लोगों को नाव में बैठाया जाता है। नाव के माध्यम से उन्हें गोबिंद सागर झील का चक्कर करवाया जाता है। इस परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। लोगों का मानना है कि मृत्यु के बाद आत्मा के सामने वैतरणी नदी आती है और उसे पार करना पड़ता है। ऐसे में जीवित रहते बेड़ा तारने का पुण्य कार्य मृत्यु के बाद आत्मा को वैतरणी नदी और भवसागर को पार कराने में सहायक होता है। मान्यता है कि इससे आत्मा को बैकुंठ धाम में शरण मिलती है। इसी विश्वास के चलते लोग अपने परिवार और पूर्वजों के नाम पर श्रद्धा के साथ बेड़ा तारते हैं। भाद्रपद मास के दौरान गोबिंद सागर झील के घाटों पर बेड़ा तारने का क्रम लगातार चलता रहेगा। अलग-अलग दिनों में आसपास के गांवों और क्षेत्रों से लोग यहां पहुंचेंगे। पूजा-अर्चना के साथ परिवार के सदस्य झील में नाव की सवारी कर धार्मिक परंपरा पूरी करेंगे। इसके चलते पूरे महीने झील के विभिन्न घाटों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहेगी। बेड़ा तारने के दौरान घाटों पर धार्मिक माहौल देखने को मिला। महिलाएं समूह में एकत्र होकर भजन गाती रहीं और कई जगह नृत्य भी किया। पूजा-अर्चना, मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन के बीच श्रद्धालुओं ने पूरी आस्था के साथ परंपरा निभाई। घाटों पर परिवारों के पहुंचने और धार्मिक रस्में पूरी करने का सिलसिला दिनभर चलता रहा। गोबिंद सागर के किनारे निभाई जाने वाली यह परंपरा आज भी क्षेत्र की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
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वैतरणी नदी पार कराने की मान्यता से जुड़ी है बेड़ा तारने की परंपरा
संवाद न्यूज एजेंसी
ऋषिकेश (बिलासपुर)। भाद्रपद मास शुरू होते ही गोबिंद सागर झील में बेड़ा तारने की सदियों पुरानी परंपरा भी शुरू हो गई है। भाद्रपद के पहले ही दिन सोमवार को झील के किनारे स्थित ऋषिकेश समेत विभिन्न घाटों पर सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचे। लोगों ने विधिवत पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और पूर्वजों की शांति की कामना के साथ बेड़ा तारने की परंपरा निभाई। सुबह से ही घाटों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई थी और दिनभर धार्मिक माहौल बना रहा।
बताया जाता है कि गोबिंद सागर झील के किनारे बेड़ा तारने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। भादों का महीना शुरू होते ही आसपास के क्षेत्रों के लोग इस धार्मिक परंपरा को निभाने के लिए झील के घाटों पर पहुंचते हैं। इसके लिए परिवार पहले से पूजा की तैयारियां करते हैं और प्रसाद व अन्य सामग्री लेकर घाट पर आते हैं। सदियों से चली आ रही इस परंपरा को लोग आज भी पूरी आस्था और विश्वास के साथ निभा रहे हैं। झील के किनारे स्थित लुहणू घाट, ऋषिकेश घाट, बैरी और नाले नौण में बेड़ा तारने की परंपरा निभाई जाती है। इनमें ऋषिकेश घाट पर बेड़ा तारने का विशेष महत्व बताया जाता है। भाद्रपद मास में इन घाटों पर दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। पहले दिन भी घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और अपनी बारी के अनुसार धार्मिक रस्में पूरी कीं। यह सिलसिला पूरे भाद्रपद मास में करीब एक माह तक चलता है। बेड़ा तारने की प्रक्रिया भी अपने आप में धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। परिवार के लोग घर से प्रसाद और पूजा की अन्य सामग्री लेकर घाट पर पहुंचते हैं। यहां पंडित वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा करवाते हैं। इसके बाद मल्लाह को वस्त्र और अन्य अलंकार भेंट स्वरूप दिए जाते हैं। कई लोग सोने की अंगूठियां, कपड़े और खाद्य सामग्री भी भेंट करते हैं। धार्मिक विधि पूरी होने के बाद बेड़ा तारने वाले परिवार के सदस्यों और उनके साथ आए अन्य लोगों को नाव में बैठाया जाता है। नाव के माध्यम से उन्हें गोबिंद सागर झील का चक्कर करवाया जाता है। इस परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। लोगों का मानना है कि मृत्यु के बाद आत्मा के सामने वैतरणी नदी आती है और उसे पार करना पड़ता है। ऐसे में जीवित रहते बेड़ा तारने का पुण्य कार्य मृत्यु के बाद आत्मा को वैतरणी नदी और भवसागर को पार कराने में सहायक होता है। मान्यता है कि इससे आत्मा को बैकुंठ धाम में शरण मिलती है। इसी विश्वास के चलते लोग अपने परिवार और पूर्वजों के नाम पर श्रद्धा के साथ बेड़ा तारते हैं। भाद्रपद मास के दौरान गोबिंद सागर झील के घाटों पर बेड़ा तारने का क्रम लगातार चलता रहेगा। अलग-अलग दिनों में आसपास के गांवों और क्षेत्रों से लोग यहां पहुंचेंगे। पूजा-अर्चना के साथ परिवार के सदस्य झील में नाव की सवारी कर धार्मिक परंपरा पूरी करेंगे। इसके चलते पूरे महीने झील के विभिन्न घाटों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहेगी। बेड़ा तारने के दौरान घाटों पर धार्मिक माहौल देखने को मिला। महिलाएं समूह में एकत्र होकर भजन गाती रहीं और कई जगह नृत्य भी किया। पूजा-अर्चना, मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन के बीच श्रद्धालुओं ने पूरी आस्था के साथ परंपरा निभाई। घाटों पर परिवारों के पहुंचने और धार्मिक रस्में पूरी करने का सिलसिला दिनभर चलता रहा। गोबिंद सागर के किनारे निभाई जाने वाली यह परंपरा आज भी क्षेत्र की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

गोबिंदसागर झील किनारे बेड़ा तारने की रस्म पूरी करते लोग। संवाद
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