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Minjar Mela 2026: चंबा में शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला, राज्यपाल ने किया भव्य शुभारंभ; जानें इतिहास
Sun, 26 Jul 2026 11:29 AM IST
Ankesh Dogra
अनिमेष कौशल, शिमला।
अनिमेष कौशल, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Sun, 26 Jul 2026 11:29 AM IST
सार
चंबा में रविवार को अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला-2026 का पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुभारंभ हुआ। राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने शोभायात्रा में भाग लेकर भगवान लक्ष्मीनारायण और रघुनाथ मंदिर में मिंजर अर्पित की तथा चौगान मैदान में ध्वजारोहण कर आठ दिवसीय मेले का उद्घाटन किया। मेले में 2 अगस्त तक सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेलकूद प्रतियोगिताएं और प्रदर्शनी आयोजित की जाएंगी।
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अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला 2026
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश के सबसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला-2026 का रविवार को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य शुभारंभ हुआ। प्रदेश के राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने पारंपरिक शोभायात्रा में भाग लेकर भगवान लक्ष्मीनारायण और भगवान रघुनाथ मंदिर में मिंजर अर्पित की तथा प्रदेश की सुख-समृद्धि, शांति और अच्छी फसल की कामना की। इसके बाद ऐतिहासिक चौगान मैदान में ध्वजारोहण कर आठ दिवसीय मेले का औपचारिक उद्घाटन किया।
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शोभायात्रा में दिखी चंबा की सांस्कृतिक विरासत
मेले से पहले नगर परिषद कार्यालय परिसर से पारंपरिक शोभायात्रा निकाली गई। ढोल-नगाड़ों, बैंड-बाजों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच निकली इस शोभायात्रा में स्थानीय संस्कृति और धार्मिक आस्था की अनूठी झलक देखने को मिली। शोभायात्रा में एसडीएम चिराग शर्मा, नगर परिषद अध्यक्ष भुवनेश्वरी गुलाटी, उपाध्यक्ष जितेंद्र सूर्य, कार्यकारी अधिकारी राखी कौशल, सभी पार्षद, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए।
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आस्था और संस्कृति का अनोखा संगम
मिंजर मेले के शुभारंभ के दौरान पूरे शहर में उत्सव का माहौल रहा। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन, लोक संस्कृति की रंगत और धार्मिक परंपराओं ने आयोजन को विशेष बना दिया। राज्यपाल ने मंदिरों में पूजा-अर्चना के बाद प्रदेशवासियों की खुशहाली और समृद्धि की कामना की।
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2 अगस्त तक होंगे रंगारंग कार्यक्रम
जिला प्रशासन के अनुसार 26 जुलाई से 2 अगस्त तक चलने वाले इस अंतरराष्ट्रीय मेले में सांस्कृतिक संध्याएं, लोकनृत्य, संगीत कार्यक्रम, खेलकूद प्रतियोगिताएं, प्रदर्शनी और विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन होंगे। मेले में प्रदेश के अलावा देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटकों और श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।
मिंजर मेला: चंबा की संस्कृति, आस्था और भाईचारे का जीवंत उत्सव
हिमाचल प्रदेश का अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चंबा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कृषि परंपरा और सामाजिक सौहार्द का जीवंत प्रतीक है। सदियों से मनाया जा रहा यह उत्सव हर वर्ष श्रावण मास में आयोजित होता है और देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं व पर्यटकों को आकर्षित करता है।
कैसे शुरू हुई परंपरा?
लोक परंपराओं के अनुसार, मिंजर मेले की शुरुआत चंबा रियासत के प्रारंभिक दौर से मानी जाती है। माना जाता है कि किसी महत्वपूर्ण विजय और समृद्ध फसल की खुशी में लोगों ने राजा का स्वागत धान और मक्की की बालियों के प्रतीक 'मिंजर' से किया। धीरे-धीरे यह परंपरा एक बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक मेले में बदल गई, जो आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
क्या है 'मिंजर' का महत्व?
'मिंजर' रेशमी धागों से तैयार की जाने वाली एक विशेष लटकन होती है, जो धान और मक्की की नई बालियों का प्रतीक मानी जाती है। इसे अच्छी फसल, खुशहाली और समृद्धि का संदेश देने वाला शुभ प्रतीक माना जाता है। मेले के दौरान लोग इसे अपने वस्त्रों पर धारण करते हैं और मंदिरों में अर्पित करते हैं।
ऐसे होती है मेले की शुरुआत
श्रावण मास के दूसरे रविवार को पारंपरिक शोभायात्रा के साथ मेले का शुभारंभ होता है। शोभायात्रा में भगवान लक्ष्मीनारायण और भगवान रघुनाथ मंदिर में मिंजर अर्पित की जाती है। इसके बाद ऐतिहासिक चौगान मैदान में ध्वजारोहण कर आठ दिवसीय मेले की औपचारिक शुरुआत होती है।
हिमाचल प्रदेश का अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चंबा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कृषि परंपरा और सामाजिक सौहार्द का जीवंत प्रतीक है। सदियों से मनाया जा रहा यह उत्सव हर वर्ष श्रावण मास में आयोजित होता है और देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं व पर्यटकों को आकर्षित करता है।
कैसे शुरू हुई परंपरा?
लोक परंपराओं के अनुसार, मिंजर मेले की शुरुआत चंबा रियासत के प्रारंभिक दौर से मानी जाती है। माना जाता है कि किसी महत्वपूर्ण विजय और समृद्ध फसल की खुशी में लोगों ने राजा का स्वागत धान और मक्की की बालियों के प्रतीक 'मिंजर' से किया। धीरे-धीरे यह परंपरा एक बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक मेले में बदल गई, जो आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
क्या है 'मिंजर' का महत्व?
'मिंजर' रेशमी धागों से तैयार की जाने वाली एक विशेष लटकन होती है, जो धान और मक्की की नई बालियों का प्रतीक मानी जाती है। इसे अच्छी फसल, खुशहाली और समृद्धि का संदेश देने वाला शुभ प्रतीक माना जाता है। मेले के दौरान लोग इसे अपने वस्त्रों पर धारण करते हैं और मंदिरों में अर्पित करते हैं।
ऐसे होती है मेले की शुरुआत
श्रावण मास के दूसरे रविवार को पारंपरिक शोभायात्रा के साथ मेले का शुभारंभ होता है। शोभायात्रा में भगवान लक्ष्मीनारायण और भगवान रघुनाथ मंदिर में मिंजर अर्पित की जाती है। इसके बाद ऐतिहासिक चौगान मैदान में ध्वजारोहण कर आठ दिवसीय मेले की औपचारिक शुरुआत होती है।
रावी नदी में होती है मिंजर की विदाई
मेले का समापन विशेष धार्मिक अनुष्ठान के साथ होता है। अंतिम दिन शोभायात्रा रावी नदी के तट तक पहुंचती है, जहां मिंजर, नारियल, मौसमी फल और शुभ सामग्री जल में अर्पित की जाती है। यह परंपरा प्रकृति के प्रति आभार, अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक मानी जाती है।
भाईचारे की मिसाल
मिंजर मेले की सबसे अनूठी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। वर्षों से विभिन्न समुदायों के लोग इस आयोजन की तैयारियों और धार्मिक परंपराओं में मिलकर भाग लेते हैं। यही वजह है कि यह मेला केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि चंबा की साझा सांस्कृतिक विरासत और आपसी भाईचारे का भी प्रतीक माना जाता है।
आज का स्वरूप
समय के साथ मिंजर मेला अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल कर चुका है। आठ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में लोकनृत्य, लोकसंगीत, सांस्कृतिक संध्याएं, खेल प्रतियोगिताएं, हस्तशिल्प प्रदर्शनी और स्थानीय व्यंजनों का आनंद लेने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक इस ऐतिहासिक मेले का हिस्सा बनने चंबा पहुंचते हैं।
मेले का समापन विशेष धार्मिक अनुष्ठान के साथ होता है। अंतिम दिन शोभायात्रा रावी नदी के तट तक पहुंचती है, जहां मिंजर, नारियल, मौसमी फल और शुभ सामग्री जल में अर्पित की जाती है। यह परंपरा प्रकृति के प्रति आभार, अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक मानी जाती है।
भाईचारे की मिसाल
मिंजर मेले की सबसे अनूठी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। वर्षों से विभिन्न समुदायों के लोग इस आयोजन की तैयारियों और धार्मिक परंपराओं में मिलकर भाग लेते हैं। यही वजह है कि यह मेला केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि चंबा की साझा सांस्कृतिक विरासत और आपसी भाईचारे का भी प्रतीक माना जाता है।
आज का स्वरूप
समय के साथ मिंजर मेला अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल कर चुका है। आठ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में लोकनृत्य, लोकसंगीत, सांस्कृतिक संध्याएं, खेल प्रतियोगिताएं, हस्तशिल्प प्रदर्शनी और स्थानीय व्यंजनों का आनंद लेने का अवसर मिलता है। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक इस ऐतिहासिक मेले का हिस्सा बनने चंबा पहुंचते हैं।