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Chamba News: मस्तो ने धागों की ताकत से चंबा रुमाल से सजाई महिलाओं की ताकत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Sat, 07 Mar 2026 10:50 PM IST
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मस्तो देवी। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस संबंधी।
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जीवन के कठिन दौर में भी नहीं मानी हार, 1994 में पति की मौत के बाद कड़ी मेहनत से संवारा बच्चों का भविष्य
युवतियों को पारंपरिक कढ़ाई सिखाकर भविष्य संवार रही हैं 60 साल की मस्तो
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। जीवन की सबसे कठिन परीक्षा में भी मस्तो देवी ने हार नहीं मानी। पति के निधन और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने चंबा रुमाल को न केवल अपनाया, बल्कि इसे स्वरोजगार और संस्कृति का प्रतीक बनाया।
आज 60 वर्षीय मस्तो देवी दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल की अध्यक्ष हैं। युवतियों को पारंपरिक कढ़ाई की बारीकियां सिखाकर उनका भविष्य संवार रही हैं।सिद्धपुरा निवासी मस्तो देवी ने बताया कि साल 1994 में उनके पति राजेंद्र कुमार का निधन हो गया था। तब वह 27 साल की थीं। तीन बच्चों के साथ बुजुर्ग सास की जिम्मेदारी उनके के कंधों पर आ गई। जिंदगी मुश्किल थी, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। चंबा रुमाल ने मस्तो की जिंदगी को नया मोड़ दिया। उस समय दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल की ओर से एक चंबा कढ़ाई का केंद्र आरंभ हुआ। इसमें 35 दिनों का चंबा रुमाल का प्रशिक्षण मिल रहा था। पद्मश्री विजय शर्मा ने उनकी मदद करते हुए उन्हें प्रशिक्षण हासिल करने के लिए प्रेरित किया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें एक छोटा रुमाल बनाने के लिए दिया गया।
उन्होंने पूरी मेहनत के साथ उसे पूरा कर वापस सौंपा तो दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल को उनका रुमाल इतना भाया कि उन्होंने इसमें ही अपना भविष्य बनाने के लिए प्रेरणा दी। लगातार पांच वर्ष तक चंबा रुमाल बनाने पर दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल ने उन्हें काउंसिल का अध्यक्ष बनाया। तब से चंबा रुमाल बनाने को लेकर शुरू किया अभियान 32 वर्ष भी जारी है। आज मस्तो करीब 60 साल की हो गई हैं। चंबा रुमाल बनाने को लेकर उनकी ललक से उन्हें कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। मस्तो देवी के मुताबिक कोई भी चुनौती मेहनत के आगे नहीं टिक सकती है। बशर्ते सच्चे मन से आगे बढ़ने की ललक होनी चाहिए। परिवार में उनकी बड़ी बेटी राधा है जो चंबा रुमाल बनाने का कार्य करती है। बेटा रवि और छोटी बेटी मनीषा, बहू, और पोते-पोतियां हैं। वर्तमान में भी वह दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल की अध्यक्ष हैं।
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कई अवार्ड कर चुकी हैं हासिल
मस्तो देवी उम्र के इस पड़ाव में भी युवतियों को खादी कॉटन के कपड़े पर रेशमी, सिल्क और नेचुरल कॉटन धागे से कढ़ाई के गुर देती हैं। साल 2003 में कमला देवी चट्टोपाध्याय, 2019 में राष्ट्रीय मेरिट अवार्ड और 2021 मार्तंड पुरस्कार विजेता शिल्पी का लक्ष्य निर्धन परिवार की युवतियों को चंबा कढ़ाई की बारीकियां सीखा कर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ना है।
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पांच से 50 हजार तक है चंबा रुमाल की कीमत
चंबा रुमाल की कारीगरी मलमल, सिल्क और कॉटन के कपड़ों पर की जाती है। यह वर्गाकार और आयताकार होते हैं। चंबा रुमाल में कई प्रकार के डिजाइन अंकित किए जाते हैं। चंबा रुमाल पर की गई कढ़ाई ऐसी होती है कि दोनों तरफ एक जैसी कढ़ाई के बेल बूटे बनकर उभरते हैं। बाजार में चंबा रुमाल की कीमत 5 हजार से 50 हजार तक है।
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दुपट्टे, साड़ियों पर कारीगरी पसंद कर रहे कारीगर
चंबा रुमाल पर होने वाली कारीगरी अब लोग दुपट्टे, साड़ियों और सूट पर भी करवाना पसंद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बदलते परिवेश में अब चंबा रुमाल की कारीगरी का स्वरूप बदल रहा है। दिल्ली स्थित क्राफ्ट संग्रहालय में चंबा रुमाल की प्रदर्शनी में स्टाल लगा कर मस्तो देवी लोगों, पर्यटकों को चंबा रुमाल की कारीगरी से अवगत करवा रही हैं। यह प्रदर्शनी 30 जनवरी से 28 फरवरी तक रही।
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युवतियों को पारंपरिक कढ़ाई सिखाकर भविष्य संवार रही हैं 60 साल की मस्तो
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। जीवन की सबसे कठिन परीक्षा में भी मस्तो देवी ने हार नहीं मानी। पति के निधन और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने चंबा रुमाल को न केवल अपनाया, बल्कि इसे स्वरोजगार और संस्कृति का प्रतीक बनाया।
आज 60 वर्षीय मस्तो देवी दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल की अध्यक्ष हैं। युवतियों को पारंपरिक कढ़ाई की बारीकियां सिखाकर उनका भविष्य संवार रही हैं।सिद्धपुरा निवासी मस्तो देवी ने बताया कि साल 1994 में उनके पति राजेंद्र कुमार का निधन हो गया था। तब वह 27 साल की थीं। तीन बच्चों के साथ बुजुर्ग सास की जिम्मेदारी उनके के कंधों पर आ गई। जिंदगी मुश्किल थी, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। चंबा रुमाल ने मस्तो की जिंदगी को नया मोड़ दिया। उस समय दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल की ओर से एक चंबा कढ़ाई का केंद्र आरंभ हुआ। इसमें 35 दिनों का चंबा रुमाल का प्रशिक्षण मिल रहा था। पद्मश्री विजय शर्मा ने उनकी मदद करते हुए उन्हें प्रशिक्षण हासिल करने के लिए प्रेरित किया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें एक छोटा रुमाल बनाने के लिए दिया गया।
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उन्होंने पूरी मेहनत के साथ उसे पूरा कर वापस सौंपा तो दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल को उनका रुमाल इतना भाया कि उन्होंने इसमें ही अपना भविष्य बनाने के लिए प्रेरणा दी। लगातार पांच वर्ष तक चंबा रुमाल बनाने पर दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल ने उन्हें काउंसिल का अध्यक्ष बनाया। तब से चंबा रुमाल बनाने को लेकर शुरू किया अभियान 32 वर्ष भी जारी है। आज मस्तो करीब 60 साल की हो गई हैं। चंबा रुमाल बनाने को लेकर उनकी ललक से उन्हें कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। मस्तो देवी के मुताबिक कोई भी चुनौती मेहनत के आगे नहीं टिक सकती है। बशर्ते सच्चे मन से आगे बढ़ने की ललक होनी चाहिए। परिवार में उनकी बड़ी बेटी राधा है जो चंबा रुमाल बनाने का कार्य करती है। बेटा रवि और छोटी बेटी मनीषा, बहू, और पोते-पोतियां हैं। वर्तमान में भी वह दिल्ली क्राफ्ट काउंसिल की अध्यक्ष हैं।
कई अवार्ड कर चुकी हैं हासिल
मस्तो देवी उम्र के इस पड़ाव में भी युवतियों को खादी कॉटन के कपड़े पर रेशमी, सिल्क और नेचुरल कॉटन धागे से कढ़ाई के गुर देती हैं। साल 2003 में कमला देवी चट्टोपाध्याय, 2019 में राष्ट्रीय मेरिट अवार्ड और 2021 मार्तंड पुरस्कार विजेता शिल्पी का लक्ष्य निर्धन परिवार की युवतियों को चंबा कढ़ाई की बारीकियां सीखा कर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ना है।
पांच से 50 हजार तक है चंबा रुमाल की कीमत
चंबा रुमाल की कारीगरी मलमल, सिल्क और कॉटन के कपड़ों पर की जाती है। यह वर्गाकार और आयताकार होते हैं। चंबा रुमाल में कई प्रकार के डिजाइन अंकित किए जाते हैं। चंबा रुमाल पर की गई कढ़ाई ऐसी होती है कि दोनों तरफ एक जैसी कढ़ाई के बेल बूटे बनकर उभरते हैं। बाजार में चंबा रुमाल की कीमत 5 हजार से 50 हजार तक है।
दुपट्टे, साड़ियों पर कारीगरी पसंद कर रहे कारीगर
चंबा रुमाल पर होने वाली कारीगरी अब लोग दुपट्टे, साड़ियों और सूट पर भी करवाना पसंद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बदलते परिवेश में अब चंबा रुमाल की कारीगरी का स्वरूप बदल रहा है। दिल्ली स्थित क्राफ्ट संग्रहालय में चंबा रुमाल की प्रदर्शनी में स्टाल लगा कर मस्तो देवी लोगों, पर्यटकों को चंबा रुमाल की कारीगरी से अवगत करवा रही हैं। यह प्रदर्शनी 30 जनवरी से 28 फरवरी तक रही।