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Chamba News: चंबा के हर घर-घर गूंज रहा पैहला ता नां लेइए नारैण दा

संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा Updated Sun, 22 Mar 2026 10:42 PM IST
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The first song resonating in every house of Chamba is Ta Na Liye Narain Da.
चंबा के मुगला में चैत्र मास के  उपलक्ष पर ढोलरू गाते दंपती।संवाद
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चंबा की अनूठी लोक परंपरा, चैत्र मास में गूंजता है ढोलरु गायन
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घर-घर जाकर गीतों से दी जा रही है हिंदू नववर्ष की बधाई
पंकज सलारिया
चंबा। शिव भूमि चंबा अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इनमें से एक सबसे अनूठी और प्राचीन लोकगाथा है ढोलरू गायन जो चैत्र मास की संक्रांति से शुरू होकर पूरे महीने चलता है।
यह परंपरा एक सदियों ने निभाई जाती है। इसमें लोग ढोल की थाप पर पारंपरिक गीत गाते घर-घर जाकर हिंदू नववर्ष की बधाई देते हैं। ढोलरू गायन की पौराणिक कथा शिव और विष्णु भगवान से जुड़ी है। मान्यता मान्यता है कि भस्मासुर को भगवान शिव ने वरदान दिया था कि वह किसी के सिर पर भी हाथ रखेगा तो वह भस्म हो जाएगा। तब भस्मासुर देवी पार्वती पर मोहित हो गया और भगवान शिव पर हाथ रखने की कोशिश करने लगा। भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया और भस्मासुर के सामने नृत्य करने की शर्त रखी मगर भस्मासुर ने अपनी ही शक्ति से अपना अंत कर लिया। इसके बाद विष्णु भगवान ने अपने बाजू की मैल से एक ऑमहाशय को ढोल सहित उत्पन्न किया जिसने ढोल की ताल पर गीत गाकर ऐसा माहौल बनाया कि भस्मीदंत नाचने लगा और खुद ही अपना सर्वनाश कर बैठा। इस घटना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उस महाशय को को दो वरदान दिए। एक, उन्हें बांस की कला का अद्वितीय कौशल प्राप्त हुआ और दूसरा, चैत्र मास में वे अपने गीत-संगीत से लोगों को नए साल की बधाई देने के अधिकारी बने। चैत्र मास की शुरुआत होते ही चंबा जिले के विभिन्न गांवों और कस्बों में इस परंपरा को निभाने वाले विशेष समुदाय के लोग घर-घर जाकर पैहला ता नां लेइये नारेण दा गाते हैं और परिवारों को नए साल की बधाई देते हैं। ढोल की थाप और परंपरागत लोकगीतों की गूंज से चंबा की फिजा भक्तिमय हो उठती है।
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लोक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम के विवाह के अवसर पर पहली बार अयोध्या में ढोलरू गायन हुआ था। तब से यह परंपरा हर वर्ष चैत्र मास में घर-घर जाकर नववर्ष की शुभकामनाएं देने के रूप में जीवित हैं।
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