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Kangra News: उधारकर्ता और दो गारंटरों को 5.47 लाख चुकाने के आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Wed, 20 May 2026 08:45 AM IST
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धर्मशाला। व्यापारिक उद्देश्य के लिए लिए गए लोन की अदायगी न करने और बैंक के नोटिसों को नजरअंदाज करना एक महिला उधारकर्ता और दो गारंटरों को भारी पड़ गया है। सिविल न्यायाधीश जयसिंहपुर की अदालत ने केसीसी बैंक की याचिका पर फैसला सुनाते हुए तीनों को संयुक्त रूप से 5,47,715 रुपये 6 फीसदी वार्षिक ब्याज के साथ चुकाने के आदेश दिए हैं।
मामले के अनुसार जयसिंहपुर तहसील की एक महिला ने साल 2009 में व्यापारिक कार्य के लिए बैंक से 5 लाख रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट ली थी। इसमें क्षेत्र के तीन लोगों ने गारंटी दी थी। शुरुआत में किस्तों का भुगतान नियमित रहा, लेकिन जनवरी 2017 के बाद उधारकर्ता ने पैसे जमा करना बंद कर दिया।
बैंक के बार-बार आग्रह करने पर प्रतिवादी ने 2019 और 2020 में बैलेंस कंफर्मेशन लेटर पर हस्ताक्षर कर बकाया राशि स्वीकार की, लेकिन कानूनी नोटिस के बाद भी भुगतान नहीं किया। इसके बाद बैंक ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि उनसे बिना पढ़ाए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए और यह मामला समय सीमा (लिमिटेशन) से बाहर है।
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अदालत ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों पर प्रतिवादियों के हस्ताक्षर मौजूद हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार बिना किसी दबाव या धोखाधड़ी के किए गए हस्ताक्षर पूरी तरह वैध हैं। अदालत ने माना कि 2020 में दिए गए बैलेंस कंफर्मेशन लेटर के कारण यह मामला समय सीमा के भीतर है। इस मामले में एक गारंटर का केस पहले ही वापस ले लिया गया था, जिसके बाद अब कोर्ट ने मुख्य आरोपी और शेष दो गारंटरों को संयुक्त रूप से यह राशि चुकाने की डिक्री पारित की है।
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मामले के अनुसार जयसिंहपुर तहसील की एक महिला ने साल 2009 में व्यापारिक कार्य के लिए बैंक से 5 लाख रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट ली थी। इसमें क्षेत्र के तीन लोगों ने गारंटी दी थी। शुरुआत में किस्तों का भुगतान नियमित रहा, लेकिन जनवरी 2017 के बाद उधारकर्ता ने पैसे जमा करना बंद कर दिया।
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बैंक के बार-बार आग्रह करने पर प्रतिवादी ने 2019 और 2020 में बैलेंस कंफर्मेशन लेटर पर हस्ताक्षर कर बकाया राशि स्वीकार की, लेकिन कानूनी नोटिस के बाद भी भुगतान नहीं किया। इसके बाद बैंक ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि उनसे बिना पढ़ाए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए और यह मामला समय सीमा (लिमिटेशन) से बाहर है।
अदालत ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों पर प्रतिवादियों के हस्ताक्षर मौजूद हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार बिना किसी दबाव या धोखाधड़ी के किए गए हस्ताक्षर पूरी तरह वैध हैं। अदालत ने माना कि 2020 में दिए गए बैलेंस कंफर्मेशन लेटर के कारण यह मामला समय सीमा के भीतर है। इस मामले में एक गारंटर का केस पहले ही वापस ले लिया गया था, जिसके बाद अब कोर्ट ने मुख्य आरोपी और शेष दो गारंटरों को संयुक्त रूप से यह राशि चुकाने की डिक्री पारित की है।