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Kangra News: नाबालिग के यौन उत्पीड़न के दोषी को जाना होगा जेल, अपील खारिज
Mon, 29 Jun 2026 07:07 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Mon, 29 Jun 2026 07:07 AM IST
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धर्मशाला। करीब 16 वर्ष पुराने नाबालिग से यौन उत्पीड़न और जान से मारने की धमकी देने के मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (द्वितीय) धर्मशाला की अदालत ने दोषी की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक-एक वर्ष के साधारण कारावास और पांच-पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी को तत्काल ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए हैं।
मामले के अनुसार वर्ष 2010 में पीड़िता छठी कक्षा (11 वर्ष) की छात्रा थी और अपनी बुआ के घर रह रही थी। पड़ोस में रहने वाले आरोपी ने उसे अपने घर बुलाकर अश्लील हरकतें की थीं और किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी थी। बच्ची के कपड़ों पर खून के निशान मिलने के बाद मामला सामने आया था और पुलिस थाना नगरोटा बगवां ने जांच शुरू की थी।
अदालत के समक्ष आरोपी ने दलील दी थी कि मामले में कोई स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। मामले की एफआईआर दर्ज करवाने में भी देरी हुई और चिकित्सकीय साक्ष्य भी स्पष्ट नहीं हैं। उसने निचली अदालत के निर्णय को चुनौती देते हुए बरी किए जाने की मांग की थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि बाल पीड़िता की गवाही स्वाभाविक, विश्वसनीय और अडिग रही है।
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उन्होंने कहा कि यदि पीड़िता का बयान भरोसेमंद हो तो केवल उसी के आधार पर भी दोष सिद्धि की जा सकती है। रिश्तेदार गवाह होने मात्र से उनकी गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती। 11 वर्षीय बच्ची आरोपी की धमकी और मानसिक आघात के कारण तुरंत घटना नहीं बता सकी थी। जब उसकी बुआ ने कपड़ों पर खून के निशान देखे और अस्पताल में चिकित्सक के सामने बच्ची ने पूरी बात बताई, तभी मामला दर्ज हुआ।
ऐसे संवेदनशील मामलों में कुछ दिनों की देरी मात्र से केस कमजोर नहीं होता। चिकित्सा रिपोर्ट भी पीड़िता के बयान के अनुरूप है। इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने अपील को खारिज कर दिया।
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मामले के अनुसार वर्ष 2010 में पीड़िता छठी कक्षा (11 वर्ष) की छात्रा थी और अपनी बुआ के घर रह रही थी। पड़ोस में रहने वाले आरोपी ने उसे अपने घर बुलाकर अश्लील हरकतें की थीं और किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी थी। बच्ची के कपड़ों पर खून के निशान मिलने के बाद मामला सामने आया था और पुलिस थाना नगरोटा बगवां ने जांच शुरू की थी।
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अदालत के समक्ष आरोपी ने दलील दी थी कि मामले में कोई स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। मामले की एफआईआर दर्ज करवाने में भी देरी हुई और चिकित्सकीय साक्ष्य भी स्पष्ट नहीं हैं। उसने निचली अदालत के निर्णय को चुनौती देते हुए बरी किए जाने की मांग की थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि बाल पीड़िता की गवाही स्वाभाविक, विश्वसनीय और अडिग रही है।
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उन्होंने कहा कि यदि पीड़िता का बयान भरोसेमंद हो तो केवल उसी के आधार पर भी दोष सिद्धि की जा सकती है। रिश्तेदार गवाह होने मात्र से उनकी गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती। 11 वर्षीय बच्ची आरोपी की धमकी और मानसिक आघात के कारण तुरंत घटना नहीं बता सकी थी। जब उसकी बुआ ने कपड़ों पर खून के निशान देखे और अस्पताल में चिकित्सक के सामने बच्ची ने पूरी बात बताई, तभी मामला दर्ज हुआ।
ऐसे संवेदनशील मामलों में कुछ दिनों की देरी मात्र से केस कमजोर नहीं होता। चिकित्सा रिपोर्ट भी पीड़िता के बयान के अनुरूप है। इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने अपील को खारिज कर दिया।