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Kangra News: वारिसों को चुकाने होंगे 5.95 लाख रुपये
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धर्मशाला। पालमपुर स्थित वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश गौरव कुमार की अदालत ने आईडीबीआई बैंक से जुड़े एक ऋण वसूली मामले में बैंक के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने प्रतिवादी के निधन के बाद कानूनी वारिसों को संयुक्त रूप से करीब 5.95 लाख रुपये की राशि बैंक को अदा करने के आदेश दिए हैं।
मामले के अनुसार वर्ष 2018 में प्रतिवादी ने कन्फेक्शनरी व्यवसाय के लिए आईडीबीआई बैंक पालमपुर शाखा से पांच लाख रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट ली थी। इसके बाद वर्ष 2020 में 99,800 रुपये का जीईसीएल टर्म लोन भी प्राप्त किया गया। कोविड-19 मोरेटोरियम अवधि के दौरान संचित ब्याज को एफआईटीएलआर सुविधा में परिवर्तित किया गया था।
बैंक का आरोप था कि ऋण लेने के बाद प्रतिवादी ने भुगतान में लगातार चूक की। नोटिस जारी करने के बावजूद बकाया राशि जमा नहीं करवाई। प्रतिवादी के निधन के बाद बैंक ने उनके कानूनी वारिसों को देनदारी के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए अदालत में वसूली का मुकदमा दायर किया।
वहीं, प्रतिवादियों ने अपने जवाब में बैंक के दावों से अनभिज्ञता जताई और कहा कि उन्होंने ऋण चुकाने से कभी इन्कार नहीं किया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि प्रतिवादी मूल बकाया राशि के साथ-साथ मुकदमा दायर करने की तिथि से भुगतान होने तक 11.60 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी अदा करेंगे।
साथ ही यह भी कहा गया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत मृतक के कानूनी वारिस होने के नाते उनकी जिम्मेदारी केवल उतनी ही सीमा तक होगी, जितनी संपत्ति उन्होंने विरासत में प्राप्त की है।
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मामले के अनुसार वर्ष 2018 में प्रतिवादी ने कन्फेक्शनरी व्यवसाय के लिए आईडीबीआई बैंक पालमपुर शाखा से पांच लाख रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट ली थी। इसके बाद वर्ष 2020 में 99,800 रुपये का जीईसीएल टर्म लोन भी प्राप्त किया गया। कोविड-19 मोरेटोरियम अवधि के दौरान संचित ब्याज को एफआईटीएलआर सुविधा में परिवर्तित किया गया था।
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बैंक का आरोप था कि ऋण लेने के बाद प्रतिवादी ने भुगतान में लगातार चूक की। नोटिस जारी करने के बावजूद बकाया राशि जमा नहीं करवाई। प्रतिवादी के निधन के बाद बैंक ने उनके कानूनी वारिसों को देनदारी के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए अदालत में वसूली का मुकदमा दायर किया।
वहीं, प्रतिवादियों ने अपने जवाब में बैंक के दावों से अनभिज्ञता जताई और कहा कि उन्होंने ऋण चुकाने से कभी इन्कार नहीं किया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि प्रतिवादी मूल बकाया राशि के साथ-साथ मुकदमा दायर करने की तिथि से भुगतान होने तक 11.60 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी अदा करेंगे।
साथ ही यह भी कहा गया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत मृतक के कानूनी वारिस होने के नाते उनकी जिम्मेदारी केवल उतनी ही सीमा तक होगी, जितनी संपत्ति उन्होंने विरासत में प्राप्त की है।