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Kullu News: बेसहारा महिलाओं, बच्चों को संवारने के लिए सुदर्शना ने बेच दिए थे गहने
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मनाली के राधा संस्था एक साथ बैठकर भोजन करते बच्चें।-संवाद
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पतलीकूहल (कुल्लू)। मनाली क्षेत्र के नग्गर स्थित राधा एनजीओ (रूरल एसोसिएशन फॉर डेवलपमेंट एंड हेल्पफुल असिस्टेंस) आज केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि अनाथ, असहाय और जरूरतमंद बच्चों और महिलाओं के लिए उम्मीद की नई किरण बन चुकी है। संस्था की संचालिका सुदर्शना ठाकुर पिछले तीन दशकों से बेसहारा महिलाओं और बच्चों के जीवन को संवारने में जुटी हैं। उनके अथक प्रयासों से अब तक 200 से अधिक महिलाओं और बच्चों को नया जीवन और बेहतर भविष्य मिला है।
सुदर्शना ठाकुर के सामाजिक सफर की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई। उस समय एक 18 वर्षीय विधवा अपनी दो बेटियों के साथ सहायता की गुहार लेकर उनके पास पहुंची थी। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने महिलाओं को स्वेटर, जुराबें और अन्य ऊनी वस्त्र बनाने का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का अभियान शुरू किया। 2004 में उन्होंने राधा एनजीओ का औपचारिक पंजीकरण करवाया।
संस्था में जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ जीवनोपयोगी कौशल भी सिखाए जाते हैं। बुनाई, सिलाई-कढ़ाई, अचार, जैम और मुरब्बा निर्माण, पर्यावरण संरक्षण तथा पौधशाला (नर्सरी) जैसी गतिविधियों के माध्यम से बच्चों और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।
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सुदर्शना ठाकुर ने बताया कि संस्था से जुड़कर करीब 500 ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मिला है। संस्था की ओर से तैयार किए जाने वाले स्वेटर, मफलर, 23 प्रकार के अचार, एपल साइडर, जैम तथा फूलों की नर्सरी से होने वाली आय से संस्था अपने खर्चों का बड़ा हिस्सा स्वयं वहन करती है। वर्तमान में संस्था में 13 बच्चे रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
सुदर्शना ठाकुर ने बताया कि शुरुआती दौर उनके लिए बेहद संघर्षपूर्ण रहा। बच्चों के पालन-पोषण और संस्था का खर्च चलाने के लिए उन्होंने स्वयं रात-रात भर स्वेटर और जुराबें बुनीं। जरूरत पड़ने पर अपने आभूषण और निजी सामान तक बेच दिए। उनके सामाजिक योगदान की सराहना देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं। संवाद
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सुदर्शना ठाकुर के सामाजिक सफर की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई। उस समय एक 18 वर्षीय विधवा अपनी दो बेटियों के साथ सहायता की गुहार लेकर उनके पास पहुंची थी। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने महिलाओं को स्वेटर, जुराबें और अन्य ऊनी वस्त्र बनाने का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का अभियान शुरू किया। 2004 में उन्होंने राधा एनजीओ का औपचारिक पंजीकरण करवाया।
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संस्था में जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ जीवनोपयोगी कौशल भी सिखाए जाते हैं। बुनाई, सिलाई-कढ़ाई, अचार, जैम और मुरब्बा निर्माण, पर्यावरण संरक्षण तथा पौधशाला (नर्सरी) जैसी गतिविधियों के माध्यम से बच्चों और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।
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सुदर्शना ठाकुर ने बताया कि संस्था से जुड़कर करीब 500 ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मिला है। संस्था की ओर से तैयार किए जाने वाले स्वेटर, मफलर, 23 प्रकार के अचार, एपल साइडर, जैम तथा फूलों की नर्सरी से होने वाली आय से संस्था अपने खर्चों का बड़ा हिस्सा स्वयं वहन करती है। वर्तमान में संस्था में 13 बच्चे रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
सुदर्शना ठाकुर ने बताया कि शुरुआती दौर उनके लिए बेहद संघर्षपूर्ण रहा। बच्चों के पालन-पोषण और संस्था का खर्च चलाने के लिए उन्होंने स्वयं रात-रात भर स्वेटर और जुराबें बुनीं। जरूरत पड़ने पर अपने आभूषण और निजी सामान तक बेच दिए। उनके सामाजिक योगदान की सराहना देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं। संवाद
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