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Mandi News: चौहारघाटी में बाढ़ के खतरे का 45 मिनट पहले मिलेगा अलर्ट

Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Mon, 22 Jun 2026 12:31 AM IST
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Alert for flood risk in Chohar Valley will be received 45 minutes in advance.
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लंबाडग व उहल में जलस्तर बढ़ने पर बजेगी घंटी

शानन परियोजना में लगा आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम
संवाद न्यूज एजेंसी
जोगिंद्रनगर (मंडी)। चौहारघाटी में अब बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के संभावित खतरे का समय रहते पता लगाया जा सकेगा। इसके लिए बरोट स्थित शानन परियोजना के तहत आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है। इस तकनीक के माध्यम से लंबाडग और उहल नदी के जलस्तर में अचानक बढ़ोतरी होने पर कंट्रोल रूम में 45 मिनट पहले अलर्ट घंटी बजेगी। इससे निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद मिलेगी।
बरोट स्थित शानन परियोजना की रेजरवायर से करीब 20 किलोमीटर दूर बड़ागांव के गड़सा ब्रिज के पास उहल नदी किनारे यह आधुनिक सिस्टम लगाया गया है। वहीं, लंबाडग नदी की निगरानी के लिए लोहारडी में भी इसी तरह के सेंसर स्थापित किए जाएंगे। इस पूरी परियोजना पर एक करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं।
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वर्ष 1928 में स्थापित 110 मेगावाट क्षमता वाली शानन परियोजना में अब तक ऐसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया था। मानसून के दौरान जलस्तर अचानक बढ़ने से बरोट घाटी में बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। ऐसे में यह सिस्टम संभावित खतरे की पहले ही सूचना देकर राहत और बचाव कार्यों को प्रभावी बनाने में मदद करेगा।
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वर्ष 2024 में लंबाडग परियोजना की पेनस्टॉक पाइप फटने के बाद मुल्थान बाजार में भारी तबाही हुई थी। इस हादसे में करीब 75 दुकानों को नुकसान पहुंचा था, जबकि 600 कनाल कृषि भूमि तेज बहाव में बह गई थी। मलबा और बड़े पत्थर खेतों व रिहायशी क्षेत्रों तक पहुंच गए थे, जिससे किसानों की फसलें भी बर्बाद हुई थीं। इस घटना के बाद बरोट बाजार तक भय का माहौल बन गया था।
अब शानन परियोजना की पुरानी और नई रेजरवायर की निगरानी सेटेलाइट सिस्टम से भी की जाएगी। जलस्तर में अचानक वृद्धि होने पर कंट्रोल रूम में अलर्ट बजते ही बड़ागांव से टिक्कन तक लगे हूटर सक्रिय हो जाएंगे। इससे नदी किनारे रहने वाले लोग समय रहते सतर्क हो सकेंगे।
कोट्स
शानन प्रोजेक्ट के अधीक्षण अभियंता भूपेंद्र सिंह ने बताया कि अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित होने से बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के खतरे का समय रहते आकलन संभव होगा। इससे जनहानि और संपत्ति के नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी।
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