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Mandi News: कीचड़ में डाली नाटी, बुरी शक्तियों के नाश के लिए निभाई परंपरा
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सुंबली मेला में कीचड़ के बीच नाटी डालते श्रद्धालु। संवाद
- फोटो : सांकेतिक
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सुंबल बैली के पांच दिवसीय सुबली मेले का समापन
सैकड़ों श्रद्धालुओं ने निभाई अनूठी देव रस्में
संवाद न्यूज एजेंसी
बालीचौकी (मंडी)। सराज विधानसभा क्षेत्र की सुंबल बैली में सदियों पुराने वार्षिक सुंबली मेले का समापन शनिवार को अनूठी देव परंपराओं के साथ हुआ। अंतिम दिन श्रद्धालुओं और देवलुओं ने कीचड़ में उतरकर सामूहिक नाटी डाली। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह परंपरा बुरी शक्तियों के नाश और सुख-समृद्धि का प्रतीक है।
सुबह चार बजे आराध्य देवता सुमुनाग और नलबाणी की मूल कोठी गाडा गांव से देव आज्ञा लेकर दर्जनों लोग जंगल से परडाये (बड़ा पेड़) लाने निकले। लौटते समय परंपरा के अनुसार श्रद्धालु परडाये के साथ खेलते हुए और पारंपरिक तंज कसते हुए मेला मैदान पहुंचे। इसके बाद एक-दूसरे पर कीचड़ फेंकने की रस्म निभाई गई और उसी कीचड़ में सामूहिक नाटी डाली गई। बाद में नदी किनारे देव परंपराओं का निर्वहन हुआ। मान्यता है कि इन रस्मों से क्षेत्र की नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और देवता पूरे क्षेत्र की रक्षा का आशीर्वाद देते हैं। इस वर्ष मेले में सात हारियानों सहित सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए।
पांच दिवसीय मेले की शुरुआत हूम उत्सव से पहले हुई थी। पहले दिन करीब 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित सुमुनाग और नलबाणी मंदिर में बच्चों का मुंडन संस्कार हुआ। दूसरे दिन कारकुंदों पर फेरे और विशेष देव रस्में निभाई गईं। तीसरे दिन गाडा गांव की मूल कोठी में धार्मिक अनुष्ठान हुए, जबकि चौथे दिन छोटी जलेब के साथ सुबल सह में छोटे मेले का आयोजन किया गया।
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आराध्य देवता के गूर मोहर सिंह ने बताया कि सुंबली मेला सदियों पुरानी देव संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि कीचड़ में नाटी, पारंपरिक तंज और अंत में क्षेत्र की रक्षा के लिए प्रतीकात्मक लकीर खींचने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है।
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सैकड़ों श्रद्धालुओं ने निभाई अनूठी देव रस्में
संवाद न्यूज एजेंसी
बालीचौकी (मंडी)। सराज विधानसभा क्षेत्र की सुंबल बैली में सदियों पुराने वार्षिक सुंबली मेले का समापन शनिवार को अनूठी देव परंपराओं के साथ हुआ। अंतिम दिन श्रद्धालुओं और देवलुओं ने कीचड़ में उतरकर सामूहिक नाटी डाली। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह परंपरा बुरी शक्तियों के नाश और सुख-समृद्धि का प्रतीक है।
सुबह चार बजे आराध्य देवता सुमुनाग और नलबाणी की मूल कोठी गाडा गांव से देव आज्ञा लेकर दर्जनों लोग जंगल से परडाये (बड़ा पेड़) लाने निकले। लौटते समय परंपरा के अनुसार श्रद्धालु परडाये के साथ खेलते हुए और पारंपरिक तंज कसते हुए मेला मैदान पहुंचे। इसके बाद एक-दूसरे पर कीचड़ फेंकने की रस्म निभाई गई और उसी कीचड़ में सामूहिक नाटी डाली गई। बाद में नदी किनारे देव परंपराओं का निर्वहन हुआ। मान्यता है कि इन रस्मों से क्षेत्र की नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और देवता पूरे क्षेत्र की रक्षा का आशीर्वाद देते हैं। इस वर्ष मेले में सात हारियानों सहित सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए।
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पांच दिवसीय मेले की शुरुआत हूम उत्सव से पहले हुई थी। पहले दिन करीब 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित सुमुनाग और नलबाणी मंदिर में बच्चों का मुंडन संस्कार हुआ। दूसरे दिन कारकुंदों पर फेरे और विशेष देव रस्में निभाई गईं। तीसरे दिन गाडा गांव की मूल कोठी में धार्मिक अनुष्ठान हुए, जबकि चौथे दिन छोटी जलेब के साथ सुबल सह में छोटे मेले का आयोजन किया गया।
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आराध्य देवता के गूर मोहर सिंह ने बताया कि सुंबली मेला सदियों पुरानी देव संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि कीचड़ में नाटी, पारंपरिक तंज और अंत में क्षेत्र की रक्षा के लिए प्रतीकात्मक लकीर खींचने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है।