Kargil Vijay Diwas 2026 : शिमला के धमून के दो भाइयों ने कारगिल में दिखाया शौर्य, 43 दिन तक दुश्मन से लड़े
कारगिल विजय दिवस पर शिमला जिले की धमून पंचायत के दो वीर भाइयों दिवाकर दत्त शर्मा और रामलाल शर्मा की बहादुरी फिर चर्चा में है। दोनों ने जैक राइफल्स में रहते हुए कारगिल युद्ध में तोलोलिंग सहित अहम मोर्चों पर दुश्मन से मुकाबला किया। आज भी वे युवाओं को सेना में भर्ती होकर देशसेवा के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
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कारगिल युद्ध को हुए 28 साल का लंबा समय बीत गया है, लेकिन आज भी उस युद्ध की शौर्य गाथा युवाओं को प्रेरणा दे रही है। भारत के सैनिकों ने माइनस 30 डिग्री तापमान के बीच हजारों फीट ऊंचाई पर स्थित अपनी पोस्टों पर कब्जा जमाए बैठे पाकिस्तानी सैनिकों का अदम्य साहस के साथ मुकाबला किया और विजय हासिल की। इस युद्ध में जिला शिमला के जवानों का भी अविस्मरणीय योगदान रहा है।
कारगिल युद्ध में धमून पंचायत के वीरों ने भी हिस्सा लेकर प्रदेश का मान बढ़ाया। इनमें दो भाई दिवाकर दत्त शर्मा और रामलाल शर्मा भी शामिल थे। दोनों एक साथ जैक राइफल में भर्ती हुए थे और कारगिल युद्ध में हिस्सा लिया था। सूबेदार मेजर (सेवानिवृत्त) दिवाकर दत्त शर्मा ने बताया कि उन्हें तोलोलिंग की पहाड़ियों पर कब्जा वापस लेने का लक्ष्य दिया था। कारगिल युद्ध में उनके सामने तीन बड़ी चुनौतियां थीं। पहली चुनौती मौसम से लड़ना था। द्रास और इसके आसपास की पहाड़ियों में तापमान माइनस 30 से 40 डिग्री तक पहुंच जाता था।
तोलोलिंग श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-1ए) पर सीधी नजर रखने वाली बेहद अहम चोटी थी। सैनिक ऊपर की ओर चढ़ाई कर रहे थे तो दोनों ओर से भारी गोलाबारी हो रही थी। इस कारण हर दिन सैनिकों को नुकसान उठाना पड़ रहा था। प्लाटून हवलदार होने के नाते उन्हें अपने सैनिकों का हौसला बढ़ाना पड़ता था। 43 दिन तक भारतीय सैनिकों ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अदम्य शौर्य का परिचय देते हुए जीत दर्ज की। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि देश सबसे पहले है और देश है तो हम भी हैं।
इसलिए सभी को देश को सर्वोपरि रखना चाहिए। सूबेदार सेवानिवृत्त रामलाल शर्मा ने बताया कि कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों ने विपरीत परिस्थितियों में लड़ते हुए पाकिस्तान को मात दी थी। उन्होंने बताया कि वह और उनके चचेरे भाई एक साथ सेना में भर्ती हुए थे और एक ही यूनिट में तैनात रहे। दोनों ने एक साथ कारगिल युद्ध में हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि साथियों के बलिदान से दुख होता था, लेकिन देश के लिए हौसला कभी टूटने नहीं दिया। बड़े भाई के बीमार होने के कारण वह ज्यादा बातचीत नहीं कर पाए।
कारगिल युद्ध लड़ने वाले प्रवीण शर्मा ने बताया कि द्रास पहुंचने वाली शुरुआती यूनिटों में उनकी यूनिट भी शामिल थी। चार मई को उन्हें द्रास रवाना होने की सूचना मिली और पांच मई को वह वहां पहुंच गए। यहां पहुंचते ही पाकिस्तानी सैनिकों ने चेक पोस्टों से भारी गोलीबारी और बमबारी शुरू कर दी।स्थानीय लोग पहले ही गांव छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जा चुके थे। इसके बाद उन्हें मुश्कोह सेक्टर जाने के निर्देश मिले। उनकी यूनिट को पॉइंट 4875 और पॉइंट 5152 मीटर की चौकी पर कब्जा करने का लक्ष्य दिया था।
उन्होंने बताया कि दुश्मन ऊंचाई पर तैनात था, इसलिए रात के समय ही आगे बढ़ा जाता था ताकि पाकिस्तानी सैनिक उन्हें देख न सकें। इस दौरान किसी भी तरह की रोशनी का इस्तेमाल नहीं किया जाता था। इस ऑपरेशन के दौरान तीन महीने तक पहाड़ों और पत्थरों के नीचे रहकर गुजारने पड़े। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद प्रवीण शर्मा अब सीनियर सेकेंडरी स्कूल बलग में प्रधानाचार्य के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। वर्तमान में भी वह अपने विद्यार्थियों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करते हैं।