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Sirmour News: राम ने भरत को पिता का दूसरा वचन निभाने का दिया संदेश
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ददाहू में राम कथा के दौरान मौजूद महिलाएं। संवाद
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ददाहू में रामकथा में सीता हरण प्रसंग ने भावुक किए श्रद्धालु
-भरत मिलाप और चरण पादुका प्रसंग का मार्मिक वर्णन, जय श्रीराम के उद्घोष से गूंजा गीता भवन
-रावण के छलपूर्वक सीता हरण की कथा सुनाई, बुधवार को राम राज्याभिषेक के साथ होगा समापन
संवाद न्यूज एजेंसी
ददाहू (सिरमौर)। गीता भवन ददाहू में आयोजित संगीतमय श्रीराम कथा के छठे दिन कथा व्यास पंडित राजन शांडिल्य ने भरत मिलाप और सीता हरण के अत्यंत भावपूर्ण प्रसंगों का वर्णन किया। कथा सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और पूरा पंडाल भगवान श्रीराम के जयघोष से गूंज उठा।
कथा व्यास ने बताया कि महाराज दशरथ के देहावसान के बाद भरत, शत्रुघ्न, तीनों माताओं और अयोध्या के राजपरिवार के सदस्य भगवान श्रीराम से मिलने वन पहुंचे। इस दौरान भगवान श्रीराम ने भरत से कहा कि उन्होंने पिता की आज्ञा के अनुसार वनवास स्वीकार कर पहला वचन पूरा कर दिया है। अब अयोध्या का राजसिंहासन संभालकर पिता का दूसरा वचन निभाने की जिम्मेदारी भरत की है।
उन्होंने बताया कि भरत ने भगवान श्रीराम के चरणों में गिरकर राजगद्दी स्वीकार करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। भरत ने कहा कि अयोध्या का राजपाट केवल श्रीराम का ही है। उन्होंने संकल्प लिया कि यदि 14 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी श्रीराम अयोध्या नहीं लौटे तो वे अपने प्राण त्याग देंगे। इसके बाद भरत भगवान श्रीराम की चरण पादुकाएं अपने सिर पर रखकर अयोध्या लौट गए और उन्हें ही राजसिंहासन का प्रतीक मानकर शासन चलाया।
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कथा के दौरान पंडित राजन शांडिल्य ने रावण द्वारा साधु का वेश धारण कर छलपूर्वक माता सीता का हरण करने और उन्हें आकाश मार्ग से लंका ले जाने का मार्मिक प्रसंग भी सुनाया। इसके बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण द्वारा माता सीता की खोज में वन-वन भटकने का भावपूर्ण वर्णन किया गया।-- -- -- -- -
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-भरत मिलाप और चरण पादुका प्रसंग का मार्मिक वर्णन, जय श्रीराम के उद्घोष से गूंजा गीता भवन
-रावण के छलपूर्वक सीता हरण की कथा सुनाई, बुधवार को राम राज्याभिषेक के साथ होगा समापन
संवाद न्यूज एजेंसी
ददाहू (सिरमौर)। गीता भवन ददाहू में आयोजित संगीतमय श्रीराम कथा के छठे दिन कथा व्यास पंडित राजन शांडिल्य ने भरत मिलाप और सीता हरण के अत्यंत भावपूर्ण प्रसंगों का वर्णन किया। कथा सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और पूरा पंडाल भगवान श्रीराम के जयघोष से गूंज उठा।
कथा व्यास ने बताया कि महाराज दशरथ के देहावसान के बाद भरत, शत्रुघ्न, तीनों माताओं और अयोध्या के राजपरिवार के सदस्य भगवान श्रीराम से मिलने वन पहुंचे। इस दौरान भगवान श्रीराम ने भरत से कहा कि उन्होंने पिता की आज्ञा के अनुसार वनवास स्वीकार कर पहला वचन पूरा कर दिया है। अब अयोध्या का राजसिंहासन संभालकर पिता का दूसरा वचन निभाने की जिम्मेदारी भरत की है।
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उन्होंने बताया कि भरत ने भगवान श्रीराम के चरणों में गिरकर राजगद्दी स्वीकार करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। भरत ने कहा कि अयोध्या का राजपाट केवल श्रीराम का ही है। उन्होंने संकल्प लिया कि यदि 14 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी श्रीराम अयोध्या नहीं लौटे तो वे अपने प्राण त्याग देंगे। इसके बाद भरत भगवान श्रीराम की चरण पादुकाएं अपने सिर पर रखकर अयोध्या लौट गए और उन्हें ही राजसिंहासन का प्रतीक मानकर शासन चलाया।
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कथा के दौरान पंडित राजन शांडिल्य ने रावण द्वारा साधु का वेश धारण कर छलपूर्वक माता सीता का हरण करने और उन्हें आकाश मार्ग से लंका ले जाने का मार्मिक प्रसंग भी सुनाया। इसके बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण द्वारा माता सीता की खोज में वन-वन भटकने का भावपूर्ण वर्णन किया गया।