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Solan News: कार्तिकेय जन्म, तारकासुर वध और गणेश महिमा का किया वर्णन

Thu, 06 Aug 2026 11:42 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सोलन
संवाद न्यूज एजेंसी, सोलन Updated Thu, 06 Aug 2026 11:42 PM IST
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Described the birth of Kartikeya, the slaying of Tarakasura, and the glory of Ganesha.
कुनिहार के राजदरबार परिसर में आयोजित शिव महापुराण कथा के दौरान मौजूद भक्त। संवाद
शिव कांवड़ सेवा समिति हाटकोट करवा रहा है शिवमहापुरा कथा
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार (सोलन)। शिव कांवड़ सेवा समिति हाटकोट की ओर से राजदरबार परिसर में चल रही शिव महापुराण कथा में राष्ट्रीय प्रचारक गोरक्षा दल शशांक कौशल ने भगवान कार्तिकेय के जन्म तारकासुर वध भगवान गणेश के जन्म एवं प्रथम पूज्य बनने तथा शंखचूड़ और जालंधर की कथाओं का विस्तार से वर्णन किया।
कथा व्यास ने बताया कि तारकासुर ने कठोर तप कर ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही होगा। उसके अत्याचारों से त्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन के बाद भगवान कार्तिकेय का प्राकट्य हुआ। छह कृत्तिका माताओं ने उनका पालन-पोषण किया। इसलिए उनका नाम कार्तिकेय पड़ा। आगे चलकर उन्हें देवसेना का सेनापति बनाया गया और उन्होंने भीषण युद्ध में तारकासुर का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्त कराया। कथा व्यास ने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि धर्म और सत्य की विजय निश्चित है।
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उन्होंने भगवान गणेश के जन्म का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि माता पार्वती ने अपने उबटन से गणेशजी की रचना की और उन्हें द्वारपाल नियुक्त किया। भगवान शिव द्वारा उनका मस्तक विच्छेद किए जाने के बाद हाथी का मस्तक लगाकर उन्हें पुनर्जीवित किया गया और प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया गया। इसी कारण प्रत्येक शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है।
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कथा के दौरान गणेश उत्सव की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए शशांक कौशल ने कहा कि शास्त्रों में मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा और विधिवत विसर्जन का विधान है। वर्तमान समय में पीओपी और रासायनिक रंगों से बनी विशाल प्रतिमाएं जल स्रोतों को प्रदूषित कर रही हैं। जो पर्यावरण के साथ-साथ जीव-जंतुओं के लिए भी हानिकारक हैं। उन्होंने कहा कि सनातन परंपराओं पर प्रश्न उठाने के बजाय उन्हें शास्त्रसम्मत और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से निभाना समय की आवश्यकता है।


कथा व्यास ने शंखचूड़ और जालंधर की कथाओं का भी वर्णन करते हुए बताया कि अहंकार और अधर्म चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हो। अंत में उनका विनाश निश्चित है। भगवान सदैव धर्म सत्य और भक्ति की रक्षा करते हैं। कथा के समापन पर भगवान शिव की आरती की गई तथा श्रद्धालुओं ने विश्व शांति मानव कल्याण और प्रकृति संरक्षण की कामना की।
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