{"_id":"69f63e670d9c3e312d099e99","slug":"farmers-at-the-dhenuka-milk-centre-in-waknaghat-have-not-received-their-milk-payments-for-five-months-solan-news-c-176-1-ssml1040-168500-2026-05-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"Solan News: धेनुका दुग्ध केंद्र वाकनाघाट में पांच महीने से किसानों को नहीं मिल पाए दूध के पैसे","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Solan News: धेनुका दुग्ध केंद्र वाकनाघाट में पांच महीने से किसानों को नहीं मिल पाए दूध के पैसे
विज्ञापन
वाकनाघाट दुग्ध एकत्रीकरण केंद्र के बाहर खड़े दुग्ध उत्पादक। स्रोत : दुग्ध उत्पादक
विज्ञापन
सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत के बाद अब डीसी का दरवाजा खटखटाएंगे ग्रामीण
भुगतान न होने पर कारण लोन की किस्तें चुकाना हुआ मुश्किल
संवाद न्यूज एजेंसी
वाकनाघाट (सोलन)। दुधारू पशु सुधार सभा जौणाजी के तहत आने वाले धेनुका दुग्ध एकत्रीकरण केंद्र वाकनाघाट में दूध उत्पादकों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। पिछले पांच महीनों से दूध का भुगतान न होने के कारण करीब 15 से 20 गांवों के किसान दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। आलम यह है कि किसी किसान के 40 हजार तो किसी के डेढ़ लाख रुपये समिति के पास फंसे हुए हैं।दूध उत्पादकों का कहना है कि उन्होंने गाय खरीदने के लिए बैंकों से लोन ले रखे हैं। भुगतान न होने के कारण वे न तो लोन की किस्तें चुका पा रहे हैं और न ही पशुओं के लिए फीड (चारा) खरीद पा रहे हैं। वाकना, छावशा, कोट, कदौर, बिशा, बाशा और मंझौल सहित करीब 20 गांवों के 50 से अधिक किसान प्रतिदिन यहां दूध लेकर आते हैं, लेकिन समिति की ओर से उन्हें केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं। किसानों का आरोप है कि भुगतान के संबंध में जब भी समिति के अध्यक्ष से बात की जाती है, तो उनकी ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। हार मानकर किसानों ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज करवाई है, लेकिन अभी तक वहां से भी कोई राहत नहीं मिली है। अब ग्रामीण एकजुट होकर उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक सोलन से मिलने की तैयारी कर रहे हैं।
61 रुपये का वादा, मिल रहे सिर्फ 35 रुपये
किसानों ने सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार दूध को 61 रुपये प्रति किलो खरीदने का दावा करती है, वहीं उन्हें धरातल पर मात्र 35 रुपये प्रति किलो का भाव दिया जा रहा है। इतनी कम कीमत मिलने के बावजूद समय पर भुगतान न होना किसानों की कमर तोड़ रहा है।
उग्र आंदोलन की चेतावनी
दूध उत्पादकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनके रुके हुए पैसों का भुगतान नहीं किया गया, तो वे सड़कों पर उतरने से गुरेज नहीं करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो होने वाले उग्र आंदोलन का खामियाजा सरकार और प्रशासन को भुगतना होगा।
Trending Videos
भुगतान न होने पर कारण लोन की किस्तें चुकाना हुआ मुश्किल
संवाद न्यूज एजेंसी
वाकनाघाट (सोलन)। दुधारू पशु सुधार सभा जौणाजी के तहत आने वाले धेनुका दुग्ध एकत्रीकरण केंद्र वाकनाघाट में दूध उत्पादकों का धैर्य अब जवाब दे रहा है। पिछले पांच महीनों से दूध का भुगतान न होने के कारण करीब 15 से 20 गांवों के किसान दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। आलम यह है कि किसी किसान के 40 हजार तो किसी के डेढ़ लाख रुपये समिति के पास फंसे हुए हैं।दूध उत्पादकों का कहना है कि उन्होंने गाय खरीदने के लिए बैंकों से लोन ले रखे हैं। भुगतान न होने के कारण वे न तो लोन की किस्तें चुका पा रहे हैं और न ही पशुओं के लिए फीड (चारा) खरीद पा रहे हैं। वाकना, छावशा, कोट, कदौर, बिशा, बाशा और मंझौल सहित करीब 20 गांवों के 50 से अधिक किसान प्रतिदिन यहां दूध लेकर आते हैं, लेकिन समिति की ओर से उन्हें केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं। किसानों का आरोप है कि भुगतान के संबंध में जब भी समिति के अध्यक्ष से बात की जाती है, तो उनकी ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। हार मानकर किसानों ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज करवाई है, लेकिन अभी तक वहां से भी कोई राहत नहीं मिली है। अब ग्रामीण एकजुट होकर उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक सोलन से मिलने की तैयारी कर रहे हैं।
61 रुपये का वादा, मिल रहे सिर्फ 35 रुपये
किसानों ने सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार दूध को 61 रुपये प्रति किलो खरीदने का दावा करती है, वहीं उन्हें धरातल पर मात्र 35 रुपये प्रति किलो का भाव दिया जा रहा है। इतनी कम कीमत मिलने के बावजूद समय पर भुगतान न होना किसानों की कमर तोड़ रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
उग्र आंदोलन की चेतावनी
दूध उत्पादकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनके रुके हुए पैसों का भुगतान नहीं किया गया, तो वे सड़कों पर उतरने से गुरेज नहीं करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो होने वाले उग्र आंदोलन का खामियाजा सरकार और प्रशासन को भुगतना होगा।
