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खुशवंत सिंह लिटफेस्ट: हिमालय में कंक्रीट के जंगल बढ़ने से तबाही का खतरा, ग्लेशियर पिघले तो गहराएगा जल संकट

Sun, 25 Oct 2026 10:24 AM IST
Ankesh Dogra सोमदत्त शर्मा, सोलन।
सोमदत्त शर्मा, सोलन। Published by: Ankesh Dogra Updated Sun, 25 Oct 2026 10:24 AM IST
सार

कसौली में 15वें खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्ट के दौरान विशेषज्ञों ने हिमालय में अनियोजित निर्माण और जलवायु परिवर्तन से बढ़ते खतरों पर चिंता जताई।

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Sonam Wangchuk Himalayan Environmental Crisis Khushwant Singh Literature Festival Kasauli
कसौली में खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्ट के दूसरे दिन मौजूद वक्ता व श्रोता। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

हिमालय में विकास के नाम पर अनियोजित निर्माण से तबाही का खतरा बढ़ रहा है। वहीं जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से भविष्य में जल संकट और गहरा सकता है। यह चिंता 15वें खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्ट के दूसरे दिन शनिवार को कसौली क्लब में आयोजित ‘द हिमालयाज : क्लीयर एंड प्रेजेंट डेंजर’ सत्र में जताई गई। सत्र में जाने-माने शिक्षाविद एवं पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ऑनलाइन शामिल हुए, जबकि पूर्व आईएएस अधिकारी, पर्यावरणविद एवं लेखक डॉ. रवि चोपड़ा ने भी हिमालयी क्षेत्र के अस्तित्व पर मंडरा रहे गंभीर संकट को लेकर चेताया।

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वांगचुक ने कहा कि हिमालय भारत सहित एशिया के करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। उन्होंने चिंता जताई कि पहाड़ों में विकास के नाम पर अनियोजित और अंधाधुंध निर्माण कार्य किए जा रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्र मैदानी इलाकों की तरह विकास का भारी दबाव सहन नहीं कर सकते। पहाड़ों की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर वहां कंक्रीट के जंगल बढ़ाए गए, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

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वांगचुक ने कहा कि हिमालय को ‘एशिया का जल मीनार’ कहा जाता है, क्योंकि यह करोड़ों लोगों की जलापूर्ति का प्रमुख स्रोत है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से भविष्य में जल संकट और गहरा सकता है। बादल फटने, अचानक बाढ़ आने और भूस्खलन जैसी आपदाओं का खतरा भी बढ़ सकता है। उन्होंने प्रकृति के साथ खिलवाड़ तत्काल बंद करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
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हिमालयी राज्यों के लिए बनें सख्त पर्यावरणीय कानून
वांगचुक ने नीति निर्माताओं, राजनेताओं और आम नागरिकों को चेताया कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालयी क्षेत्र में रहना मुश्किल हो सकता है। उन्होंने हिमालयी राज्यों के लिए विशेष और सख्त पर्यावरणीय नीतियां बनाने की मांग की। ऐसी नीतियों के माध्यम से वनों, नदियों और पहाड़ों के अंधाधुंध दोहन पर रोक लगाई जा सकती है। वक्ताओं ने हिमालय पर मंडराते खतरे को गंभीर वास्तविकता बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई दूर भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि ऐसा संकट है, जिससे निपटने के लिए तत्काल ठोस नीतियों और दूरदर्शी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। 

वांगचुक ने किसी के दबाव में खत्म नहीं किया आंदोलन : गीतांजलि 
पत्रकार सुनेत्रा चौधरी के साथ बातचीत में वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो ने केंद्र सरकार और भाजपा पर कई आरोप लगाए। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था और जेन-जी के विरोध प्रदर्शनों के बीच सोनम वांगचुक की अनुपस्थिति को लेकर लगाई जा रही अटकलों का खंडन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सोनम वांगचुक मार्गदर्शक की भूमिका में हैं और सक्रिय राजनीति में आने की उनकी कोई योजना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि वांगचुक भाजपा के साथ नहीं मिलेंगे। वांगचुक ने किसी समझौते के दबाव में आंदोलन खत्म नहीं किया।  गीतांजलि ने केंद्र पर विरोधियों को कथित तौर पर ब्लैकमेल करने के लिए ‘वॉशिंग मशीन’ जैसी रणनीति अपनाने का आरोप लगाया। 

गीतांजलि ने खुद को सनातन परंपरा का पालन करने वाली हिंदू बताते हुए भाजपा की विचारधारा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भाजपा और सनातन को एक नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि सनातन परंपरा सत्य बोलने पर जोर देती है। गीतांजलि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती दी कि वे प्राइम टाइम पर उनके साथ चर्चा करें। उन्होंने युवा आईएएस अधिकारियों के प्रति सहानुभूति जताते हुए कहा कि वे अच्छे इरादों के साथ सेवा में आते हैं, लेकिन डर के कारण उन्हें गलत काम करने पड़ते हैं।

सीमा पर ही नहीं, सूचना व तकनीकी मोर्चों पर भी लड़े जा रहे युद्ध : नरवणे
कसौली क्लब में आयोजित 15वें खुशवंत सिंह लिटफेस्ट में पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की पुस्तक मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। इसमें भारतीय सेना के इतिहास, रणनीतिक फैसलों, सुरक्षा संबंधी मिथकों और सैन्य मामलों से जुड़े उन पहलुओं पर चर्चा हुई।

प्रख्यात लेखक और पत्रकार किशलय भट्टाचार्य के साथ संवाद करते हुए जनरल नरवणे ने कहा कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर ही नहीं लड़े जाते, बल्कि सूचना और तकनीक के मोर्चों पर भी उनकी अहम भूमिका होती है। बदलते समय में युद्ध की प्रकृति व्यापक हुई है और इसमें कूटनीति, अर्थव्यवस्था, मनोविज्ञान और सूचना प्रबंधन जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। सत्र के दौरान नरवणे ने सेना के शीर्ष नेतृत्व के सामने आने वाली चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि शांति और संघर्ष के बीच संतुलन बनाए रखना सैन्य नेतृत्व की बड़ी जिम्मेदारी होती है। ऐसे में कई बार रणनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फैसले लेने पड़ते हैं, जिनके पीछे के कारण तत्काल सार्वजनिक नहीं किए जा सकते।

उन्होंने भारतीय सैन्य इतिहास की विभिन्न घटनाओं और उनसे जुड़ी धारणाओं पर भी चर्चा की। नरवणे के अनुसार, रणनीतिक गोपनीयता के कारण कई जानकारियां तत्काल सामने नहीं आ पातीं। समय बीतने के साथ ऐतिहासिक घटनाओं का विश्लेषण अधिक व्यापक संदर्भ में किया जा सकता है, जिससे उनके पीछे की परिस्थितियों और निर्णयों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। सशस्त्र बलों के कामकाज और रणनीतिक फैसलों को लेकर आम जनता के बीच कई भ्रांतियां प्रचलित हैं। इन मिथकों को दूर करने के लिए तथ्यों और इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में समझना जरूरी है। युद्ध केवल रणक्षेत्र में हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। कूटनीतिक रणनीति, मनोवैज्ञानिक प्रभाव और दृढ़ इच्छाशक्ति भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

युवाओं से भ्रामक सूचनाओं से सतर्क रहने की अपील...युवाओं के साथ संवाद किया गया। नरवणे ने युवाओं से सुरक्षा संबंधी मुद्दों को गंभीरता से समझने और सोशल मीडिया पर प्रसारित अधूरी या भ्रामक सूचनाओं से सतर्क रहने की अपील की। डिजिटल युग में सही जानकारी की पहचान करना और तथ्यों के आधार पर राय बनाना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।

कश्मीर की सामान्य स्थिति पर विशेषज्ञों में मतभेद
कश्मीर पर आयोजित सत्र में विशेषज्ञों ने राज्य में सामान्य स्थिति, कश्मीरी लोगों की गरिमा और कश्मीरी पंडितों की वापसी जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे। ए जनरल एंड ए स्पाई : द कश्मीर फाइल्स पर चर्चा करते हुए मेजर जनरल रंजन महाजन और पूर्व रॉ चीफ एएस दुल्लत ने कहा कि उनके समय में कश्मीर में कुछ सही नहीं था। कश्मीरियों ने काफी कुछ झेला, लेकिन आज के समय काफी कुछ सही हो गया है। इस पर कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा कि कश्मीर में स्कूल और कॉलेज खुले हैं व लोग घूम रहे हैं, लेकिन हर जगह सशस्त्र पुलिसकर्मी होने पर इसे सामान्य कैसे कहा जा सकता है।
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