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Agniveer: मुआवजे के लिए दर-दर भटक रहे ट्रेनिंग के दौरान घायल हुए अग्निवीर, सेना ने 'अनुपस्थित' बताकर किया बाहर
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अग्निवीर
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
23 साल के प्रभजोत सिंह दिहाड़ी मजदूर हैं, वे 2022 में अग्निपथ योजना के तहत बतौर अग्निवीर भर्ती हुए थे। अग्निपथ योजना के तहत पहले बैच में भर्ती हुए प्रभजोत बामुश्किल से 10 हफ्ते की ट्रेनिंग की परी कर पाए थे, कि उनके हाथ में चोट लग गई और उन्हें इलाज के लिए घर भेज दिया गया। 23 साल के हरजिंदर सिंह और 22 साल के गुरजीत सिंह की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। ये तीनों ही जब फिट होने के बाद जब ट्रेनिंग सेंटर पहुंचे, तो उन्हें 'अनुपस्थित' बताकर सेना से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। देश के अलग-अलग प्रांतों में ऐसे कई युवक हैं, जो अग्निवीर की ट्रेनिंग के दौरान जख्मी हुए, लेकिन उन्हें इंश्योरेंस में से डिसेबिलिटी परसेंटेज के हिसाब से न तो मुआवजा मिला है और न ही कोई अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया)।
केस-1: दिहाड़ी मजदूरी के लिए हुए मजबूर, मिली एक माह की सैलरी
पहले अग्निवीर और अब दिहाड़ी मजदूर प्रभजोत सिंह अमर उजाला से खास बातचीत में बताते हैं कि वे अग्निपथ स्कीम में पहले बैच में भर्ती हुए थे। उनके पिता ट्रक ड्राइवर हैं और वे दो भाई और उनकी दो बहनें हैं। परिवार में उनके पिता और वे ही कमाने वाले हैं। पंजाब के गुरदासपुर जिले के रहने वाले प्रभजोत बताते हैं कि 01 जनवरी 2023 से उनकी ट्रेनिंग सिख रेजिमेंट ट्रेनिंग सेंटर, रामगढ़ (झारखंड) में शुरू हुई। जब उनका सलेक्शन हुआ तो परिवार वाले बेहद खुश थे। वे भी भारतीय सेना से जुड़ने पर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। शुरू में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, 31 हफ्ते की ट्रेनिंग के ढाई महीने अच्छे से बीत गए। लेकिन 23 मार्च, 2023 को ट्रेनिंग के दौरन उनकी बाईं बाजू पर चोट लग गई। उन्हें रामगढ़ के ही मिलिट्री हॉस्पिटल में ही भर्ती कराया गया। उसके बाद उन्हें लखनऊ भेजा गया। ठीक हो कर जब वे फिट हो कर वापस लौटे, तो उन्हें ट्रेनिंग के दौरान अनुपस्थित बता कर घर भेज दिया गया। प्रभजोत बताते हैं कि वे अपनी मर्जी से तो छुट्टी पर नहीं गए थे, उन्हें इलाज के लिए भर्ती कराया गया था। लेकिन रेजिमेंट ट्रेनिंग सेंटर ने उन्हें अनुपस्थित बता कर सेना से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उन्होंने बताया कि उनसे कुछ कागजों पर जबरन दस्तखत करने के लिए भी कहा गया, लेकिन उन्होंने नहीं किए। वह बताते हैं कि उस कागज में लिखा था कि मैं अपनी मर्जी से छुट्टी पर गया था। उनसे कहा गया कि अगर तुम दस्तखत कर देगा तो तुम्हें ये फायदे मिलेंगे और एक्स-सर्विस मैन का कोटा मिलेगा। लेकिन उन्हें दस्तखत नहीं किए। नतीजन उन्हें कोई डॉक्यूमेंट दिए बिना ही बाहर कर दिया गया। उन्हें सिर्फ एक महीने की तनख्वाह दी गई। वह बताते हैं कि ट्रेनिंग सेटरों पर अग्निवीरों के नियमों में बारे में अफसरों को पूरी जानकारी ही नहीं है।
केस-2: 42 दिन की सिक लीव पर भेजा
पंजाब के ही एक और अग्निवीर, फिरोजपुर के मुकियावली गांव के रहने वाले 23 साल के हरजिंदर सिंह अमर उजाला से बताते हैं कि वे भी अग्निपथ स्कीम के दूसरे बैच में भर्ती हुए थे और सिख लाइट इन्फैंट्री, फतेहगढ़ (यूपी) में उनकी पांच महीने 10 दिन की ट्रेनिंग पूरी हो चुकी थी। अगले कुछ दिनों में उनकी कसम परेड होनी थी, लेकिन बैटल फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट (BPET), जिसमें पांच किमी की दौड़ होती है, उस दौरान वह गिर गए और उनके पैर की फीमर हड्डी में फ्रैक्चर हो गया। उनका पहले फतेहगढ़ मिलिट्री हॉस्पिटल में इलाज चला और उसके बाद लखनऊ में ऑपरेशन हुआ, जहां उनके पैर में प्लेट डाली गई। उन्हें 42 दिन की सिक लीव पर भेज दिया और उनसे फिर सेंटर पर रिपोर्ट करने के लिए कहा गया। हरजिंदर बताते हैं कि उन्हें कई दिनों तक इधर-उधर दौड़ाया गया। बाद में उनसे कहा गया कि अपने पैरेंट्स को बुला कर लाओ। जब उनके पैरेंट्स आए तो कागजी कार्रवाई पूरी करके उन्हें घर वापस भेज दिया गया। उनसे कहा गया कि वे 30 दिन तक लगातार 'अनुपस्थित' रहे हैं, इसलिए अब वे ट्रेनिंग पर वापस नहीं आ सकते। उन्हें न कोई डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट दिया गया औऱ न ही कोई एक्स-ग्रेशिया अमाउंट। उन्हें नौ महीने का पीएफ और सैलरी मिला कर कुल 95 हजार रुपये ही दिए गए।
केस-3: ट्रेनिंग पूरी होने में बचे थे सात दिन
पंजाब के फतेहगढ़ साहिब के रामपुर गांव के रहने वाले 22 साल के गुरजीत सिंह भी अग्निपथ स्कीम के तहत पहले बैच में 28 दिसंबर 2022 को भर्ती हुए थे। अमर उजाला से बातचीत में वे बताते हैं कि वे भी सिख लाइट इन्फैंट्री, फतेहगढ़ (यूपी) में ट्रेनिंग कर रहे थे। उनकी ट्रेनिंग पूरी होने में केवल सात दिन ही बचे थे और 17 जून को उनकी कसम परेड होनी थी। लेकिन ट्रेनिंग के दौरान 09 जून 2023 को वे जख्मी हो गए। उनकी गर्दन की फीमर में फ्रैक्चर हो गया। उन्हें लखनऊ के बेस हस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां उनका ऑपरेशन किया गया। वे दो महीने अस्पताल में रहे। वह बताते हैं कि उनसे कहा गया कि उन्हें बोर्ड आउट नहीं किया गया। बस उन्हें अनफिट कह कर घर भेज दिया गया। गुरजीत का कहना है कि उनसे कहा गया कि अग्निवीर के मामले में फिट या अनफिट ही होता है। वे 30 दिन अस्पताल में रहे उन्हें छुट्टी पर बता कर घर भेज दिया गया। वह बताते हैं कि उन्हें कोई मदद नहीं मिली। सेना की तरफ से न तो उन्हें एक्स-ग्रेशिया, इंश्योरेस या डिसेबिलिटी परसेंटेज के हिसाब से कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया। वह बताते हैं कि उनके साथ और भी कई ऐसे जवान हैं, जो इस तरह की पीड़ा से गुजरे हैं।
केस-4: फिट होने के बाद भी नहीं मिली एंट्री
राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले संदीप सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह बताते हैं कि वे भी अग्निपथ स्कीम के पहले बैच में राजपूत रेजिमेंट, फतेहगढ़ में भर्ती हुए थे। उनके सारे टेस्ट पूरे हो गए थे और ट्रेनिंग पूरी होने में मात्र 17 दिन ही बचे थे। लेकिन फाइनल बीपीईटी टेस्ट पूरा होने के बाद उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया। वह बताते हैं कि उनके नॉर्मल फ्रैक्चर था। वे 30 दिन मिलिट्री हॉस्पिटल में रहे। उन्होंने कहा कि वे वापस सेंटर जाना चाहते हैं। उनसे ऑपरेशन करवाने के लिए कहा गया। लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। जिसके बाद उन्हें जबरन 40 दिन की सिक लीव पर भेज दिया गया। सिक लीव पूरी होने के बाद उन्हें मिलिट्री हॉस्पिटल बुलाया गया। जहां डॉक्टरों ने उन्हें फिट बता कर (शेप-1) सेंटर मिलिट्री हॉस्पिटल फतेहगढ़ भेज दिया। वह बताते हैं कि वहां उन्हें एक महीने तक इधर-उधर दौड़ाते रहे। वहां से वे सेंटर गए, जहां वे कुछ दिन रहे। जहां उन्हें 30 दिन की रेगुलर लीव पर रहने की बात कह कर घर भेज दिया गया। वह कहते हैं कि उन्हें कारण बताया गया कि नियमों के तहत वे ट्रेनिंग से 30 दिन बाहर रहे हैं, इसलिए फिट होने के बाद भी वे वापस नहीं लौट सकते। वह कहते हैं कि मैं जबरदस्ती तो छुट्टी पर नहीं गया था। मेरी मजबूरी थी।
कोई मुआवजा दिए बिना भेज रहे घर
वहीं, इस मामले में एक्स-सर्विस मैंस ग्रीवेंसेज सेल, मोहाली के प्रेसिडेंट रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल एसएस सोही ने अमर उजाला को बताया कि उन्होंने ऐसे कुछ मामले सामने आने पर सेनाअध्यक्ष को पत्र भी लिखा है, जिसमें उन्होंने ऐसे अग्निवीरों को न्याय देने की मांग की है। वह कहते हैं कि आर्मी, नेवी और एयरफोर्स में हमारे अग्निवीरों के साथ अमानवीय ढंग से अन्याय हो रहा है। अग्निपथ स्कीम के तहत अग्निवीरों के ट्रेनिंग की अवधि को घटा कर 6 महीने कर दिया गया है। जिससे उन पर परफॉरमेंस का दबाव बढ़ गया है और इसी दबाव के कारण, 800 भर्तियों के बैच में से 7-10 अग्निवीर अक्सर जख्मी/फ्रैक्चर हो जाते हैं। घायलों को 30 दिनों से अधिक समय तक इलाज के लिए अस्पताल (ड्यूटी पर) में भर्ती कराया जाता है और उनकी डिसेबिलिटी के लिए कोई मुआवजा दिए बिना, उन्हें घर भेज दिया जाता है। वह कहते हैं कि इस योजना को लेकर निचले स्तर पर ही कोई जानकारी नहीं है। अपनी मर्जी से नियम बनाए जा रहे हैं। न तो कोई डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट दिया जा रहा है और ट्रेनिंग के दौरान जख्मी होने पर न ही कोई मुआवजा दिया जा रहा है।
मां-बाप पर बोझ बनने के लिए मजबूर
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल एसएस सोही का कहना है कि नियमों के अनुसार अगर कोई सैनिक ट्रेनिंग या नौकरी के दौरान जख्मी हो जाता है, तो इलाज के बाद अगर वह फिट हो जाता है, तो उसे दोबारा ज्वाइनिंग करानी चाहिए। वहीं, अगर वह अनफिट है तो मेडिकल बोर्ड से उसकी डिसेबिलिटी परसेंटज निकलवा कर उसे मुआवजा देना चाहिए। लेकिन अग्निवारों के मामले में ऐसा नहीं हो रहा है। उनके अनफिट होने पर उन्हें मुआवजा देने की बजाय उन्हें अपने मां-बाप पर बोझ बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। वह कहते हैं कि न तो उन्हें सेना की तरफ से कोई डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट दिया जा रहा है, ताकि वे किसी सरकारी नौकरी में शामिल हो सकें और न ही कोई मुआवजा या इंश्योरेंस या एक्स-ग्रेशिया की रकम दी जा रही है। वह मजबूरन 10-12 हजार की नौकरी करने के लिए मजबूर है।
वह कहते हैं कि अग्निवीर बनने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से आते हैं। उनके साथ अन्याय करके सैन्य कमांडर उन्हें दैनिक मजदूरी के लिए मजबूर कर रहे हैं। सेना के रिक्रूटमेंट की तरह, उनका रिलीज मेडिकल बोर्ड (RMB) नहीं किया जाता है। वह कहते हैं कि इन अग्निवीरों को 48 लाख रुपये का बीमा, 44 लाख रुपये का अनुग्रह मुआवजा और शेष सेवा अवधि का भुगतान मिलना चाहिए।
30 दिन अनुपस्थित रहने पर सेना में वापसी नहीं
इस मामले में जब सेना के पीआरओ से जब बात की, तो उन्हें तत्काल कुछ भी कहने से इनकार करते हुए ईमेल भेजने की बात कही और कहा कि वे सेना से जवाब मिलने के बाद ही कुछ बता पाएंगे। (उनका जवाब आने पर स्टोरी को अपडेट कर दिया जाएगा। वहीं, दिल्ली में सैन्य सूत्रों का कहना है कि नियम के मुताबिक, किसी भी वजह से 30 दिन अनुपस्थित रहने पर अग्निवीरों को फिर से सेना में शामिल नहीं किया जाता है। सेना के एक अधिकारी ने बताया कि सेना के पास कई युवाओं ने पत्र भेज कर अपील की है कि वे ट्रेनिंग के दौरान जख्मी या फ्रैक्चर हो गए थे, तो क्या उन्हें मेडिकल वजहों से छुट्टी पर होने के मामले में अगले बैच में ट्रेनिंग का मौका मिल सकता है। सूत्रों ने कहा कि ऐसा मुमकिन नहीं है। किसी अग्निवीर को दूसरे बैच में नहीं डाला जा सकता। उन्होंने बताया कि हम कोशिश में जुटे हैं कि छोटी-मोटी चोट लगने पर वे ट्रेनी क्लास की पढ़ाई कर लें और फिजिकल ट्रेनिंग बाद में ले लें। वहीं गंभीर चोट के मामलों में भी ऐसा करना संभव नहीं होगा।
चार साल की नौकरी के दौरान विकलांगता पर मिलेंगे ये फायदे
अग्निवीरों की ट्रेनिंग के दौरान डिसेबिलिटी के मामले में कोई स्पष्ट नियम नहीं है। अगर कोई अग्निवीर ट्रेनिंग के दौरान जख्मी या फ्रैक्चर हो जाता है, उसका इलाज करा कर उसे वापस घर भेज दिया जाता है। वहीं चार साल की नौकरी के दौरान अगर अग्निवीर के विकलांग होने पर व्यक्ति को स्थायी निम्न चिकित्सा श्रेणी (एलएमसी) में रखा जाता है, तो अधिकारी विकलांगता/जिम्मेदारी के प्रतिशत का आकलन करेंगे। विकलांगता (सेवा शर्तों के चलते जिम्मेदार/बढ़ी हुई) के मामले में, एकमुश्त अनुग्रह राशि दी जाएगी। 20 से 49 फीसदी विकलांगता प्रतिशत पर 50 फीसदी कम्प्यूटिंग विकलांगता मुआवजा, 20 से 49 फीसदी पर 75 फीसदी, और 76 से 100 फीसदी पर 100 फीसदी का मुआवजा दिया जाएगा।