Putin India visit: राष्ट्रपति पुतिन के दौरे पर टिकी अमेरिकी निगाह, देखना है क्या ले-देकर लौटते हैं मास्को?
रूसी राष्ट्रपति पुतिन 4 दिसंबर को 23 वीं भारत-रूस वार्षिक समिट की बैठक में हिस्सा लेने आ रहे हैं। पुतिन का यह दौरान रूस और भारत दोनों के लिए अहम है। इस दौरे पर दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते हो सकते हैं। पुतिन के भारत दौरे पर अमेरिका की भी नजर है। आईए विस्तार से पढ़ें पूरा विश्लेषण....
विस्तार
रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर 4 दिसंबर को शाम तक नई दिल्ली आएंगे और 36 घंटे के भीतर 05 दिसंबर को मास्को के लिए रवाना हो जाएंगे। चार साल बाद पुतिन के 36 घंटे से कम समय के भारत दौरे पर अमेरिका की पूरी निगाह है। भारत पुतिन के स्वागत के लिए तैयार है और देखना है कि राष्ट्रपति क्या अपने सामरिक, रणनीतिक और विश्वसनीय साझीदार दोस्त भारत को लेकर-देकर लौटते हैं।
राष्ट्रपति पुतिन 23 वीं भारत-रूस वार्षिक समिट की बैठक में हिस्सा लेने आ रहे हैं। दोनों देश हर साल बारी-बारी से एक दूसरे की जमीन पर यह बैठक करके आपसी रिश्ते को मजबूत आधार देते हैं। इससे पहले वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ चीन में विशेष कमेस्ट्री बनाने के कारण चर्चा में आए थे। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के साथ उनकी कार में एक लंबा समय साझा किया था। 22 फरवरी 22 को यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद से राष्ट्रपति भारत के साथ खास लगाव का संदेश देते हुए आगे बढ़ रहे हैं। भारत ने भी अपने पुराने सहयोगी देश के साथ उसके कठिन समय में अच्छा साथ दिया है। दक्षिण एशिया में भारत और रूस का रिश्ता 1970 के दशक से ही एक विशेष समीकरण बनाने के लिए जाना जाता है।
अमेरिका ने बांध रखे हैं हाथ
रूस के साथ रिश्ते पर अमेरिका की कड़ी निगाह है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी रणनीतिकार भारत पर रूस से ईधन तेल आयात बंद करने का दबाव बना रहे हैं। भारत को रूस से सस्ता ईधन तेल मिलता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी की तरह है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने इसके एवज में भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा कर रखी है। इस तरह से भारत को 50 प्रतिशत टैरिफ का बोझ झेलना पड़ रहा है। अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना है कि भारत के रूस से तेल आयात के कारण रूसी अर्थव्यवस्था को बड़ा बल मिल रहा है। अमेरिकी दबाव को कुछ हद तक मानते हुए भारत ने रूस से तेल के आयात को कम करने का प्रयास शुरू किया है। इससे ऐसा लग रहा है कि भारत और रूस के बीच में रिश्तों की गर्मजोशी बरकरार रहेगी। दोनों देश विश्वसनीयता को नया आधार देने का प्रयास करेंगे, लेकिन कोई बड़ा और संवेदनशील समझौता अथवा सहमति बन पाने के आसार कम हैं। रक्षा क्षेत्र में कोई नई और अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित समझौते की गुंजाइश भी कम है।
भारत के साथ हाथ में हाथ रखना पुतिन की भी विवशता
2021 और इससे पहले का समय याद कीजिए। 06 दिसंबर 2021 को भारत के प्रयास के बाद भी पुतिन केवल 4-6 घंटे के ही दौरे पर आए थे। भारत और रूस का रिश्ता रूस-चीन-भारत, बिक्स समिति और शंघाई सहयोग संगठन तक सीमित था। अमेरिका के साथ रिश्तों में आए सुधार को रूस बहुत बारीकी से देख रहा था। लेकिन कहते हैं कि दोस्ती की परीक्षा कठिन समय में होती है। फरवरी 2022 में भारत ने रूस के साथ यह केमिस्ट्री दिखाई। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन प्रशासन की आपत्तियों को दरकिनार कर भारत ने मास्को के साथ रिश्ते को नया आयाम दे दिया। माना जा रहा है कि जब तक रूस-यूक्रेन की समस्या का रूस की मंशा के अनुरुप तर्कसंगत समाधान नहीं हो जाता और मिडल ईस्ट समेत अन्य क्षेत्रीय स्तर पर परिस्थितियां स्थायित्व की ओर नहीं बढ़ती, तब तक रूस को भारत के साथ की जरूरत है। चीन के साथ गठजोड़ बनाए रखना है। ईरान के साथ केमिस्ट्री को कमजोर नहीं देना है। इसी तरह से भारत के चार पड़ोसी देश(नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका) में अमेरिका रुचि बढ़ा रहा है। चीन की पैठ बढ़ रही है। अफगानिस्तान को लेकर महत्वाकांक्षा आकार ले रही है। ऐसे समय में भारत भी रूस जैसे देश के साथ अपने आधार को कमजोर नहीं करना चाहता।
अमेरिका के साथ रिश्तों के भारत में मजबूत पैरोकार
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल भारत की बेहतरी को ध्यान में रखकर अमेरिका के साथ द्विपक्षीय, व्यापारिक और कारोबारी रिश्ते को मजबूत आधार देने के पक्षधर हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर अमेरिका की अहमियत को समझ रहे हैं। इसलिए भारत अमेरिका के साथ रिश्तों के तमाम दबाव के बाद भी कड़ा फैसला निर्णय नहीं ले पा रहा है। इसके पीछे जापान, यूरोप, खाड़ी देश समेत अन्य के साथ अमेरिका की स्थिति है। भारत में एक बड़ा तबका है, जो कहता है कि तकनीक कहां से लाओगे? इसलिए भारत अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखकर अमेरिका के साथ सब कुछ ठीक करना चाहता है।
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क्या है रूस के साथ समझौते और सौदे की संभावना?
रूस और भारत के बीच में एस-400 ट्रायम्फ प्रतिरक्षी मिसाइल प्रणाली को लेने, पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को मिलकर विकसित करने, सुखोई 30 एमकेआई को अधिक मारक बनाने तथा उसके उन्नतीकरण को लेकर सहमति बन सकती है। यह सभी भारत के चल रहे रक्षा सहयोग में आते हैं। भारतीय वायुसेना अपनी स्क्वाड्रान संख्या को प्रभावी बनाए रखने के जटिल दबाव से जूझ रही है। इसे ध्यान में रखकर तकनीक के हस्तांतरण समेत अन्य सहमति बन सकती है। हालांकि किसी बड़े और नए रक्षा सौदे की संभावना कम है। इसी तरह से अंतरिक्ष, विज्ञान एवं तकनीकी, कोंडलकुलम परमाणु संयंत्र और ईधन आपूर्ति को लेकर सहमति जारी रखने के उपायों पर चर्चा और सहमति हो सकती है।
रूस से कच्चे तेल के आयात, द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने, यूपीआई के जरिए आदान-प्रदान पर सहयोग और सहमति के आसार हैं। भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार बहुत सीमित है। इसे बढ़ाने, फ्री ट्रेड एग्रीमेंट जैसे उपायों पर चर्चा, एक दूसरे के देश में कामगारों की आवाजाही, शिक्षा समेत अन्य क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति हो सकती है। रूस भारत को परमाणु उर्जा से चालित एयरक्राफ्ट कैरियर, पनडुब्बी, फ्रिगेट आदि को लेकर अपने शो-केस खोल सकता है। सू-57 फाइटर जेट के ऑफर समेत अन्य प्रस्ताव को आगे बढ़ा सकता है। हालांकि अभी किसी संवेदनशील समझौते अथवा सहमति के आसार कम हैं।
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