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चंद सिक्कों की गवाही...संस्कारों की मजबूत नींव से जुड़े थे योगगुरु योगानंद; 5 जनवरी को मनाई जाएगी 133वीं जयंती

विनीत सक्सेना, गोरखपुर Published by: शिवम गर्ग Updated Tue, 30 Dec 2025 07:42 AM IST
सार

योगगुरु परमहंस योगानंद की 133वीं जयंती पर उनके बचपन से जुड़ी दुर्लभ यादें सामने आई हैं। मुफ्तीपुर स्थित घर में संभाले गए चंद सिक्के उनके संस्कार, स्वाभिमान और आध्यात्मिक यात्रा की मजबूत नींव की कहानी कहते हैं।

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Coins of Values: How Childhood Ethics Shaped Yog Guru Paramahansa Yogananda
योगगुरु योगानंद - फोटो : Amar Ujala Graphics

जिंदगी की रील बहुत तेज घूमती है और पलटकर देखें तो उस पल की गवाही देने के लिए बचते हैं कुछ साक्ष्य या भूली बिसरी तस्वीरें। और, कई बार तो आने वाली पीढ़ियों के हिस्से में कहे-अनकहे किस्से ही रह जाते हैं। योगगुरु परमहंस योगानंद को याद करना कुछ इसी तरह का अनुभव कराता है।  



इस साल 5 जनवरी को योगगुरु की 133वीं जयंती मनाई जानी है, और मुफ्तीपुर (गोरखपुर) के जिस घर में उन्होंने अपना बचपन बिताया, वहां सहेजकर रखे गए चंद सिक्के बताते है कि योगानंद यानी मुकुंदलाल के संस्कार कितनी मजबूत नींव से जुड़े थे। योगानंद का जन्म मुफ्तीपुर स्थित घर में 5 जनवरी 1893 को हुआ था। 

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इसी पेट्रोमैक्स से योगगुरु परमहंस योगानंद पढ़ाई करते थे - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बेहद स्वाभिमानी भगवती लाल घोष और ज्ञानप्रभा के बेटे मुकुंदलाल उस समय आठ वर्ष के थे जब परिवार ने लाहौर जाकर बसने का फैसला किया। यह घर हुस्नआरा बीबी का था और भगवती लाल की माली हालत को देखते हुए उन्होंने आठ वर्षों से परिवार से कोई किराया नहीं लिया था।

लाहौर जाने से पहले माता-पिता ने मुकुंदलाल को कागज की एक पुड़िया थमाई जिसमें चांदी और अन्य धातुओं के कुछ सिक्के थे। मुकुंद ने वो पुड़िया हुस्नआरा दादी को थमाई और रोते हुए वहां से भाग गए। इस घर में रहने वाले हुस्नआरा बीबी के वंशजों ने आज भी उन सिक्कों को संभालकर रखा है।
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योगगुरु परमहंस योगानंद के पास आधुनिक लैंप भी था. बर्तन जिसमें खाते पानी पीते थे. - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हादी परिवार के वारिस नवाब शेखू बताते हैं कि उनके वालिद शेख अब्दुल रहीम उर्फ अच्छन बाबू मानते थे कि मुकुंदलाल घोष के योगी परमहंस योगानंद बनने के पीछे इनके पिता भगवती लाल घोष और माता ज्ञानप्रभा के संस्कार थे।

उनके स्वाभिमानी-आत्मसम्मानी चरित्र का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आठ साल का माफ किया हुआ किराया भी वे लाहौर जाते वक्त दादी को देकर ही माने। बताते हैं कि घोष परिवार के जाने के बाद इसी मकान का एक हिस्सा बाद में गिरवी भी रखना पड़ा था।
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योगगुरु परमहंस योगानंद के पास उस समय भी आधूनिक लैंप हुआ करती थी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बचपन के घर में नीम का पेड़ ही बचा
योगानंद ने जिस मकान में जन्म लिया, चलना सीखा, खेले-कूदे और पढ़ाई के साथ अध्यात्म से भी जुड़ने लगे, वहां अब सिर्फ उनकी यादें ही शेष हैं। उनकी स्मृति के निशां के तौर पर उनके ध्यान के कमरे के साथ ही सब कुछ खत्म होने लगा है। अब मिटने लगे हैं। उन्हें महसूस करने के लिए सिर्फ नीम का पेड़ ही गवाह के तौर पर खड़ा दिखाई देता है।

गोरखनाथ मंदिर से अगाध लगाव और बरगद की छांव की गाथा
योगानंद की तमाम रहस्यमयी बातें मुफ्तीपुर के हिंदू-मुस्लिम परिवारों में बुजुर्गों की जुबां पर हैं। शेखू बताते हैं कि योगानंद अपने पिता के साथ गोरखनाथ मंदिर जाते तो बरगद के नीचे घंटों बैठे रहते। एक बार तो अकेले ही मंदिर चले गए।
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योगगुरु परमहंस योगानंद सुबह इसी में भरे पानी से अपना मुंह धोते थे - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
घंटों तलाश के बाद वे मंदिर में बरगद के नीचे ध्यान लगाए मिले। यहां बीच-बीच में कुछ ऐसा घटता रहा कि उनके वालिद शेख अब्दुल रहीम की लंबी मुहिम के बाद मुफ्तीपुर में उनकी जन्मस्थली की महत्ता समझी जा सकी।

मुफ्तीपुर वालों की जुबां पर कई रहस्य
प्रामाणिक तो नहीं है मगर मुफ्तीपुर वाले बताते हैं कि एक बार बहन के हाथ की ओर इशारा करके कहा- वहां फोड़ा है..। अगले दिन वहां फोड़ा उभरने लगा। कहीं जाते वक्त भाई से कहा-यहीं खड़े रहना..हिलना मत। उनके लौटने तक भाई वहां स्टैचू की तरह जमे रहे, चाहकर भी नहीं हिल सके।
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