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क्या है भारत के एलपीजी संकट का स्वदेशी हल?: 2020 से अटकी योजना बन सकती है संजीवनी, जानें कैसे और कितने समय में
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Mon, 16 Mar 2026 06:54 PM IST
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सार
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भारत में एलपीजी की कमी से निपटने का स्वदेशी तरीका।
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अमर उजाला
विस्तार
इस्राइल-अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध का फिलहाल कोई अंत नहीं आ रहा है। जहां अमेरिकी राष्ट्रपति साफ कर चुके हैं कि इस संघर्ष को खत्म करने के लिए अमेरिका की अपनी शर्तें होंगी तो वहीं ईरान भी पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले रोकने के लिए अपनी शर्तें सामने रख चुका है। ऐसे में माना जा रहा है कि बिना किसी ठोस मध्यस्थता के दोनों देशों के बीच जंग नहीं रुकेगी। हालांकि, इस युद्ध के लंबे खिंचने का असर अब दुनियाभर की ऊर्जा जरूरतों पर पड़ने लगा है। भारत में भी भले ही मौजूदा समय में तेल की कमी की शिकायतें न आ रही हों, लेकिन एलपीजी सिलेंडर गैस को लेकर मची मारामारी और जमाखोरी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
इस बीच वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला (एनसीएल) ने कहा है कि वह एलपीजी संकट को देखते हुए अब डाई-मिथाइल ईथर (डीएमई) को कुकिंग गैस के विकल्प के तौर पर बढ़ावा देगा। सीएसआईआर-एनसीएल के मुताबिक, डीएमई के उत्पादन के लिए एक स्वदेशी तकनीक विकसित की गई है और कुछ ही महीनों में संस्थान औद्योगिक स्तर पर इसका उत्पादन शुरू कर सकता है।
सीएसआईआर-एनसीएल के इस एलान के बाद एलपीजी संकट का सामना कर रहे लोगों में एक आशा की किरण जगी है। हालांकि, भारत में यह तकनीक काफी पहले से मौजूद होने के बाद इसका उत्पादन आज तक औद्योगिक स्तर पर बढ़ाया नहीं जा सका।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह डाई-मिथाइल ईथर क्या है, जिसके भारत में एलपीजी के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होने की चर्चाएं चल रही हैं? यह कैसे एलपीजी की जगह ले सकता है? भारत में इस तकनीक को लेकर क्या काम हुआ है और क्यों इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में देरी हुई है? भारत में इसका उत्पादन बढ़ाने की क्या योजनाएं हैं? आइये जानते हैं...
सीएसआईआर-एनसीएल के इस एलान के बाद एलपीजी संकट का सामना कर रहे लोगों में एक आशा की किरण जगी है। हालांकि, भारत में यह तकनीक काफी पहले से मौजूद होने के बाद इसका उत्पादन आज तक औद्योगिक स्तर पर बढ़ाया नहीं जा सका।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह डाई-मिथाइल ईथर क्या है, जिसके भारत में एलपीजी के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होने की चर्चाएं चल रही हैं? यह कैसे एलपीजी की जगह ले सकता है? भारत में इस तकनीक को लेकर क्या काम हुआ है और क्यों इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में देरी हुई है? भारत में इसका उत्पादन बढ़ाने की क्या योजनाएं हैं? आइये जानते हैं...
पहले जानें- क्या है डाई-मिथाइल ईथर, जो बन सकता है एलपीजी का विकल्प?
डाई-मिथाइल ईथर एक सिंथेटिक, बिना रंग का और स्वच्छ गैस है, जिसे भारत में लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के एक स्वदेशी और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इसे लेकर शुक्रवार को सीएसआईआर के एनसीएस की तरफ से उत्पादन बढ़ाने का एलान भी किया गया है।डीएमई को मुख्य रूप से मेथनॉल से तैयार किया जाता है। इस मेथनॉल को प्राकृतिक गैस, कोयला, कृषि अपशिष्ट (बायोमास), या कैप्चर किए गए कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) से प्राप्त किया जा सकता है। दबाव डालने पर यह गैस आसानी से तरल अवस्था (लिक्विफाइड) में बदल जाती है, जिससे इसे स्टोर करना आसान होता है।
कैसे एलपीजी की जगह ले सकती है यह गैस?
डाई-मिथाइल ईथर के गुण काफी हद तक एलपीजी से मिलते-जुलते हैं। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने घरेलू और व्यावसायिक उपयोग के लिए एलपीजी में 20% तक डाई-मिथाइल ईथर मिलाने को मंजूरी दी है। हालांकि, इसके उत्पादन को अब तक औद्योगिक स्तर पर बढ़ाया नहीं जा सका है।ये भी पढ़ें: एलपीजी संकट से निपटने का मास्टरप्लान: सरकार क्यों कर रही है पीएनजी पर फोकस? 10 सवालों में समझें पूरी कहानी
डीएमई का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर कुल एलपीजी में आठ फीसदी को डीएमई की ब्लेंडिंग की जाए तो घरों में मौजूद गैस सिलेंडर, रेगुलेटर, गैसकेट, पाइप (होज) या बर्नर में किसी भी बदलाव की जरूरत नहीं होती है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा और एलपीजी की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए आठ फीसदी एलपीजी की जगह स्वदेशी डीएमई का इस्तेमाल करने से देश को सालाना लगभग 9,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। इतना ही नहीं, अगर 10.5 करोड़ उज्ज्वला एलपीजी कनेक्शन्स में आठ फीसदी एलपीजी को मिलाया जाएगा तो भारत को हर दिन करीब 1300 टन डीएमई के उत्पादन की जरूरत होगी।
और किन क्षेत्रों में फायदेमंद है डीएमई?
डीएमई पारंपरिक ईंधनों की तुलना में बहुत साफ जलता है। इसके जलने पर कालिख आनी सूट नहीं बनती और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), सल्फर ऑक्साइड (SOx) और पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन बहुत कम होता है, जो कि इसे कम प्रदूषण वाली गैस भी बनाता है।घरेलू ईंधन के अलावा, इसे ऑटोमोटिव ईंधन (गाड़ियों में), एयरोसोल प्रोपेलेंट के तौर पर और अलग-अलग रसायनों के उत्पादन में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
भारत में कब से चल रहीं डीएमई का उत्पादन बढ़ाने की तैयारी
सीएसआईआर-एनसीएल में में डाई-मिथाइल ईथर को लेकर तैयारियां लंबे समय से चल रही हैं। भारत में डीएमई के उत्पादन की स्वदेशी तकनीक को 2020 से ही तैयार कर लिया गया था। अक्तूबर 2020 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने पुणे स्थित नेशनल केमिकल लेबोरेटरी में 'अदिति ऊर्जा संच' यूनिट और 20-24 किलो प्रतिदिन क्षमता वाले देश के पहले डीएमई पायलट प्लांट का उद्घाटन किया था। इस तकनीक को आगे बढ़ाते हुए डीएमई का उत्पादन औद्योगिक स्तर पर करना भी तय हुआ था।अभी क्या है डीएमई के उत्पादन की मौजूदा स्थिति
हालांकि, बीते करीब छह वर्षों में सीएसआईआर-एनसीएल की पेटेंट हो चुकी स्वदेशी तकनीक से डीएमई उत्पादन 250 किलो प्रतिदिन के पायलट प्लांट तक ही बढ़ा पाया है। यानी मौजूदा जरूरत के मुकाबले बेहद कम।ये भी पढ़ें: पश्चिम एशिया संकट: 'रिफाइनरियां पूरी क्षमता पर, भारतीयों को सुरक्षित निकाला जा रहा', आशंकाओं के बीच सरकार दावा
आगे के लिए क्या है डीएमई के उत्पादन की योजना?
डीएमई के उत्पादन को प्रयोगशाला से निकालकर बड़े व्यावसायिक और औद्योगिक स्तर पर ले जाने के लिए भारत में कई अहम योजनाएं शुरू की गई हैं। देश में एलपीजी संकट पैदा होने के बाद खुद सीएसआईआर की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि वह अब एक प्रोसेसिंग इंजीनियरिंग पार्टनर के साथ मिलकर अगले छह से नौ महीनों के अंदर ढाई टन प्रतिदिन क्षमता वाला एक औद्योगिक प्रदर्शन प्लांट स्थापित करने की योजना बना रहा है। इस प्लांट की सफलता के बाद 100 से 500 टन प्रतिदिन क्षमता वाले बड़े कमर्शियल प्लांट स्थापित करने का रास्ता साफ हो जाएगा। इसके लिए सरकारी एजेंसी प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों और बायोएनर्जी कंपनियों के साथ साझेदारी की संभावनाएं भी तलाश रही है।
और किन योजनाओं पर चल रहा काम?
गोदावरी बायोरेफाइनरीज लिमिटेड (जीबीएल) ने आईसीटी मुंबई के साथ मिलकर एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है, जहां कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और हाइड्रोजन को मिलाकर सीधे डीएमई बनाया जा रहा है। वर्तमान में 10 लीटर प्रतिदिन उत्पादन वाले इस पायलट प्लांट को आने वाले वर्षों में 10 टन प्रतिदिन की क्षमता तक बढ़ाने का लक्ष्य है।इसके अलावा एक और पायलट प्रोजेक्ट के तहत औद्योगिक बायो-जेनिक कार्बन डाइऑक्साइड से प्रतिदिन 450 मीट्रिक टन डीएमई बनाने की दिशा में काम चल रहा है।
दक्षिण कोरियाई स्वच्छ ऊर्जा कंपनी बायो फ्रेंड्स ने असम के नामरूप में असम पेट्रो-केमिकल्स लिमिटेड (एपीएल) के साथ मिलकर तीन करोड़ डॉलर (लगभग 250 करोड़ रुपये) के निवेश से एक नया डीएमई प्लांट स्थापित कर रही है। योजना के अनुसार इसके पहले चरण में सालाना 40,000 टन डीएमई का उत्पादन होगा। दूसरे चरण में इस क्षमता को बढ़ाकर 80,000 टन सालाना करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि भारत में कार्बन-न्यूट्रल ईंधन की आपूर्ति को तेजी से बढ़ाया जा सके।
इन सभी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य भारत को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना, विदेशी आयात पर निर्भरता कम करना और किसानों (बायोमास आपूर्ति के जरिए) की आय बढ़ाना है।
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