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High Court: बलिदानी अग्निवीरों के परिवारों को नियमित सैनिकों जैसी पेंशन नहीं, केंद्र ने अदालत को बताया कारण

Mon, 11 May 2026 03:41 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 11 May 2026 03:41 PM IST
सार

केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में स्पष्ट किया है कि अग्निवीरों और नियमित सैनिकों के बीच पेंशन लाभ को लेकर कोई बराबरी नहीं हो सकती। एक हताहत अग्निवीर की मां की याचिका के जवाब में सरकार ने कहा कि् अग्निपथ योजना चार साल की है, जबकि नियमित सैनिकों की सेवा लंबी होती है। आइए, विस्तार से जानते हैं कि सरकार ने अदालत को क्या कारण बताए...

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No parity between Agniveers regular soldiers on pensionary benefits government informed Bombay High Court
बॉम्बे हाईकोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में स्पष्ट कर दिया है कि पेंशन से जुड़े लाभ के मामले में अग्निवीरों और नियमित सैनिकों के बीच कोई बराबरी नहीं है। सरकार का कहना है कि दोनों की सेवा शर्तें और कार्यकाल बिल्कुल अलग हैं। इसलिए युद्ध या किसी अभियान में जान गंवाने वाले अग्निवीरों के परिवारों को नियमित सैनिकों के परिवारों की तरह लंबी अवधि वाली पेंशन नहीं दी जा सकती है। यह जवाब सरकार ने एक शहीद अग्निवीर की मां की याचिका पर दिया है और साफ किया है कि दोनों श्रेणियों में कोई समानता नहीं है।
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यह पूरा मामला बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर एक याचिका से जुड़ा है। यह याचिका पिछले साल जम्मू-कश्मीर में सीमा पार से हुई गोलाबारी में जान गंवाने वाले अग्निवीर मुरली नाइक की मां ज्योतिबाई नाइक ने दायर की थी। उन्होंने अपनी याचिका में मांग की थी कि उनके बेटे को भी नियमित सैनिकों की तरह ही सभी लाभ और परिवार को पूरी पारिवारिक पेंशन मिलनी चाहिए। याचिका में केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया गया था। इसी याचिका के जवाब में केंद्र सरकार ने पिछले हफ्ते अपना हलफनामा दायर कर सारी स्थिति साफ की है और याचिका खारिज करने की मांग की है।
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क्या अग्निवीर और नियमित सैनिक समान हैं?
सरकार ने अपने हलफनामे में हाईकोर्ट को बताया है कि अग्निवीर और नियमित सैनिक एक समान स्थिति में नहीं आते हैं। सरकार ने स्पष्ट किया कि अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीरों की भर्ती केवल चार साल के तय समय के लिए की जाती है। वहीं, दूसरी तरफ सशस्त्र बलों में नियमित सैनिकों की सेवा लंबी अवधि की होती है। पेंशन और अन्य वित्तीय लाभ इसी लंबी सेवा से जुड़े होते हैं। इसलिए अलग-अलग स्थितियों वाले इन दो वर्गों के बीच किसी भी तरह की बराबरी नहीं की जा सकती है। सरकार के मुताबिक यह वर्गीकरण पूरी तरह से तर्कसंगत है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत वैध है।
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क्या है अग्निपथ योजना का मुख्य उद्देश्य?
सरकार ने कोर्ट को बताया कि सैन्य अधिनियम सेना के लिए एक ऐतिहासिक और कानूनी आधार देता है, जबकि अग्निपथ योजना आज के समय की राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इसका मकसद सेना को युवा, फुर्तीला और तकनीकी रूप से उन्नत बनाना है। हलफनामे में कहा गया है कि सीमा की अजीब स्थिति और पड़ोसी देशों की तरफ से घुसपैठ की जो लगातार कोशिशें होती हैं, उससे निपटने के लिए भारत को एक ऐसी ही अनूठी ताकत की जरूरत है जो आक्रामकता और छद्म युद्ध का सामना कर सके। सरकार ने यह भी याद दिलाया कि दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस योजना की संवैधानिक वैधता को सही ठहरा चुके हैं।

शहीद अग्निवीर के परिवार को क्या लाभ मिले?
याचिकाकर्ता की इस धारणा को सरकार ने गलत बताया कि अग्निवीर नियमित सैनिकों की तरह पेंशन पाने के हकदार हैं। सरकार ने साफ किया कि अग्निपथ योजना में जान गंवाने वाले अग्निवीर के परिजनों के लिए पारिवारिक पेंशन का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि, सरकार ने बताया कि शहीद अग्निवीर मुरली नाइक को 'बैटल कैजुअल्टी' (युद्ध में हताहत) घोषित किया गया था और उनका अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया था। योजना के तहत उनके परिवार को बीमा और मुआवजे के रूप में लगभग 2.3 करोड़ रुपये की पूरी राशि दे दी गई है। कमांडिंग ऑफिसर की तरफ से परिवार को शोक संदेश भी भेजा गया था। सरकार ने स्पष्ट किया कि सेना में 'शहीद' शब्द का इस्तेमाल नहीं होता है।


बता दें कि याचिकाकर्ता ने अपने वकीलों संदेश मोरे, हेमंत घाडीगांवकर और हितेंद्र गांधी के जरिए यह अर्जी दाखिल की थी। याचिका में दलील दी गई थी कि अग्निवीर भी नियमित सैनिकों की तरह ही अपनी ड्यूटी करते हैं और उन्हें भी उन्हीं खतरों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद थोड़े समय के लिए भर्ती किए गए इन जवानों के परिवारों को लंबी अवधि की पेंशन और अन्य कल्याणकारी लाभों से वंचित रखा जाना गलत है। सरकार ने इसके जवाब में कहा है कि जब किसी ने योजना की शर्तें मानकर नौकरी शुरू की है, तो वह बाद में नियमित सैनिक वाले लाभों की मांग नहीं कर सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी नीतियों में कोर्ट का दखल भी सीमित होता है।

गौरतलब है कि अग्निवीर मुरली नाइक पिछले साल 9 मई को जम्मू-कश्मीर के पुंछ में शहीद हो गए थे। उस समय भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' नाम का एक सैन्य अभियान चलाया था। यह अभियान पिछले साल अप्रैल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में था, जिसमें ज्यादातर पर्यटकों समेत 26 लोग मारे गए थे। इसी अभियान के दौरान पाकिस्तानी सेना की भारी गोलाबारी और मोर्टार हमले में नाइक की जान चली गई थी। सरकार ने कहा है कि याचिकाकर्ता के किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 18 जून को होगी।

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