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पंजाब में क्यों हारे मोदी के 'नेल्सन मंडेला': पीएम बनाने वाले 'ताऊ' और पांच बार के सीएम 'बादल' जब अपनी विधायकी तक नहीं बचा सके

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 11 Mar 2022 11:00 PM IST
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सार
पंजाब की राजनीति के जानकार किसान नेता रामिंद्र सिंह कहते हैं, जनता ने बादल परिवार को पूरा मौका दिया था। पांच बार सीएम बनना छोटी बात नहीं है। इन्होंने कुछ किया ही नहीं। अगर कुछ काम किया होता तो आज ग्रामीण पंजाब इनके समर्थन में उतरता। रोजगार, नशामुक्ति और विकास के लिए अकाली दल ने कुछ नहीं किया। एक तो बेरोजगारी और उसके बाद नशा, अकाली दल की सरकार में इस बाबत किसी ने झांकने की कोशिश तक नहीं की...
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Parkash Singh Badal lost his seat and he was the oldest candidate of the country in the Punjab Assembly elections, his party Akali Dal got only three seats out of 117
प्रकाश सिंह बादल के पैर छूते हुए पीएम मोदी - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

पंजाब चुनाव में 'आम आदमी पार्टी' की सुनामी में तकरीबन सभी बड़े किले ढह गए। प्रकाश सिंह बादल, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने एक रैली में भारत का 'नेल्सन मंडेला' कह कर संबोधित किया था, वे खुद और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों को हार का सामना करना पड़ा है। उन्होंने पांच बार मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली है। उनके खास दोस्त रहे स्व. चौ. देवीलाल 'ताऊ', जो देश के उप प्रधानमंत्री से लेकर हरियाणा के दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं, वे भी जीवन के आखिरी दौर में कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से गुजरे थे। जिस तरह आज शिरोमणि अकाली दल के बुजुर्ग नेता प्रकाश सिंह बादल, विधायकी का चुनाव हार गए हैं, उसी तरह 'ताऊ' भी डिप्टी पीएम होते हुए विधायक तक नहीं बन सके थे। दोनों राज्यों में 'ताऊ' और 'बादल' इन नेताओं के कुनबे को लेकर यह बात कही जाती रही है कि वे बादल और देवीलाल की विरासत को संभाल नहीं सकें। जानकारों का कहना है कि दोनों परिवारों के प्रति लोगों को यह बात अखरने लगी थी कि राजनीति में अब दूसरे का चांस नहीं है।

मालवा क्षेत्र शिरोमणि अकाली दल का गढ़

पंजाब के विधानसभा चुनाव में प्रकाश सिंह बादल के अलावा उनके परिवार के कई सदस्य भाग्य आजमा रहे थे। जब ईवीएम का मुंह खुला तो न केवल प्रकाश सिंह बादल, बल्कि उनके बेटे और पूर्व डिप्टी सीएम सुखबीर बादल, भतीजे मनप्रीत बादल, दामाद आदेश प्रताप सिंह कैरों व सुखबीर बादल के साले साहिब बिक्रम मजीठिया भी चुनाव हार गए। मुक्तसर जिले की लांबी विधानसभा सीट से प्रकाश सिंह बादल साल 1997 से लगातार जीत दर्ज करा रहे थे। पंजाब के मालवा क्षेत्र को शिरोमणि अकाली दल का गढ़ कहा जाता था। आप की आंधी में वह गढ़ भी ढह गया। बता दें कि 1920 के दौरान पंजाब एक अविभाजित राज्य होता था। उस वक्त सिखों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए मास्टर तारा सिंह ने शिरोमणि अकाली दल की स्थापना की थी। अकाली दल के बारे में कहा जाता था कि यह पार्टी सिख पंथ और धार्मिक सिद्धांतों का अनुसरण करेगी। 1966 में मौजूदा पंजाब के अस्तित्व में आने के बाद अकाली दल को खास पहचान मिली थी।

बादल, देश के सबसे बुजुर्ग उम्मीदवार

पंजाब विधानसभा चुनाव में बादल, देश के सबसे बुजुर्ग उम्मीदवार रहे हैं। उनकी आयु 94 साल है। इनकी पार्टी अकाली दल को 117 में से महज तीन सीटें मिली हैं। पंजाब की राजनीति के जानकार किसान नेता रामिंद्र सिंह कहते हैं, जनता ने बादल परिवार को पूरा मौका दिया था। पांच बार सीएम बनना छोटी बात नहीं है। इन्होंने कुछ किया ही नहीं। अगर कुछ काम किया होता तो आज ग्रामीण पंजाब इनके समर्थन में उतरता। रोजगार, नशामुक्ति और विकास के लिए अकाली दल ने कुछ नहीं किया। एक तो बेरोजगारी और उसके बाद नशा, अकाली दल की सरकार में इस बाबत किसी ने झांकने की कोशिश तक नहीं की। दूसरे दलों के नेता आरोप लगाते रहे हैं कि बादल परिवार के सदस्यों ने पंजाब को नशे की तरफ धकेल दिया है। गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी मामला अकाली दल के खिलाफ गया था। ड्रग माफिया, शराब माफिया, ट्रांसपोर्ट माफिया, केबल माफिया, अवैध रेत खनन और सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार, इसके लिए शिरोमणि अकाली दल ने कोई काम नहीं किया। पार्टी कार्यकर्ताओं को लगने लगा था कि अब यह पार्टी एक परिवार की जागीर बन कर रह गई है।

देवीलाल व बादल की दोस्ती चर्चा में

हरियाणा और पंजाब में देवीलाल व बादल की दोस्ती खूब चर्चा में रहती थी। इनेलो और भाजपा गठबंधन में प्रकाश सिंह बादल अहम रोल अदा करते थे। दोनों परिवार जाट समुदाय से रहे हैं। हालांकि पंजाब में जट्ट सिख बोला जाता है। देवीलाल ने 1987 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में 90 में से 85 सीटें जीतकर तहलका मचा दिया था। चौधरी देवीलाल को 1989 के आम चुनाव के बाद बहुमत से संसदीय दल का नेता मान लिया गया था। उन्होंने यह कहते हुए वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनवा दिया कि मैं सबसे बुजुर्ग हूं। मुझे सब ताऊ कहते हैं। मुझे ताऊ बने रहना ही पंसद है। मैं यह पद वीपी सिंह को सौंपता हूं। वे 1989-1991 तक उपप्रधानमंत्री रहे। उससे पहले वे हरियाणा के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके थे। मशहूर पत्रकार रहे एमजे अकबर ने देवीलाल के निधन पर एक स्मृति लेख में लिखा था, दरअसल देवीलाल ने महसूस कर लिया था कि शहरी भारत उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, लिहाजा उन्होंने ख़ुद को सबसे बड़े पद की दौड़ से अलग कर लिया था। उपप्रधानमंत्री रहते हुए देवीलाल को लोकसभा के अलावा घिराय हलके से 1991 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। 2001 में उनके निधन के बाद ओमप्रकाश चौटाला ने पार्टी की कमान संभाली। उसके बाद वे मुख्यमंत्री भी बन गए थे।  

देवीलाल के कुनबे पर परिवारवाद और जातिवाद के आरोप

देवीलाल और बादल, इन दोनों परिवारों से एक समय के बाद लोग बहुत नाराज हुए। हरियाणा में वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र कुमार बताते हैं, दोनों परिवारों में एक बात सामान्य थी। वह ये थी कि इन्होंने पार्टी में किसी दूसरे नेता को आगे नहीं आने दिया। हरियाणा में भी देवीलाल के कुनबे पर परिवारवाद के आरोप लगे। बहुत से नेताओं ने इसी वजह से पार्टी को अलविदा कह दिया। जातिवाद के आरोप लगने लगे। नौकरी से लेकर अन्य बातों में एक ही जाति को प्रमुखता मिलने लगी। अपराध और भ्रष्टाचार से जनता तंग आ गई। 2004 में कांग्रेस पार्टी ने देवीलाल परिवार की सत्ता को उखाड़ फेंका। तब से लेकर अब तक देवीलाल परिवार सत्ता में आने का प्रयास करता है, लेकिन जनता उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं है। अब तो परिवार में ही दो पार्टी जजपा और इनेलो बन गई हैं। हालांकि जजपा मौजूदा खट्टर सरकार में शामिल है। दुष्यंत चौटाला डिप्टी सीएम हैं। देवीलाल और प्रकाश सिंह बादल, दोनों किसान नेता रहे, लेकिन जब ये सत्ता में आए तो हलधर का खास भला नहीं हो सका। 1989 में देवीलाल ने हरियाणा, पंजाब और राजस्थान तीन जगह से चुनाव लड़ा था। राजस्थान व हरियाणा से वे जीत गए। बाद में उन्होंने रोहतक सीट को छोड़ दिया। 1991 में जब दोबारा आम चुनाव हुए तो रोहतक सीट से भूपेंद्र हुड्डा ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद वे कभी इस सीट पर लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाए। आज भी प्रदेश में यही माना जाता है कि जजपा और इनेलो, परिवारवाद में फंसी हैं।

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