{"_id":"69088862331c0dcc6b09219d","slug":"sc-transfers-cpi-m-s-plea-against-removal-of-flag-poles-to-another-bench-sc-updates-2025-11-03","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"SC Updates: DMK ने तमिलनाडु में SIR कराने पर को दी 'सुप्रीम' चुनौती, स्टालिन ने एक दिन पहले की थी बैठक","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
SC Updates: DMK ने तमिलनाडु में SIR कराने पर को दी 'सुप्रीम' चुनौती, स्टालिन ने एक दिन पहले की थी बैठक
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Mon, 03 Nov 2025 11:19 PM IST
विज्ञापन
सार
तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रमुक ने राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। यह याचिका पार्टी के वरिष्ठ नेता आर.एस. भारती ने सांसद व अधिवक्ता एन.आर. इलंगो के माध्यम से दायर की। सुप्रीम कोर्ट कई और अहम फैसले जानने के लिए पूरी खबर पढ़ें।
तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रमुक ने राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। यह याचिका पार्टी के वरिष्ठ नेता आर.एस. भारती ने सांसद व अधिवक्ता एन.आर. इलंगो के माध्यम से दायर की। सुप्रीम कोर्ट कई और अहम फैसले जानने के लिए पूरी खबर पढ़ें।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल)
- फोटो : एएनआई
विज्ञापन
विस्तार
तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रमुक ने सोमवार को राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। यह याचिका द्रमुक के संगठन सचिव और वरिष्ठ नेता आर.एस. भारती ने पार्टी सांसद व वरिष्ठ अधिवक्ता एन.आर. इलंगो के माध्यम से दायर की। द्रमुक ने यह कदम मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की अध्यक्षता में हुई बहुदलीय बैठक के एक दिन बाद उठाया, जिसमें इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय जाने का निर्णय लिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने माकपा की याचिका दूसरे पीठ के पास भेजी, मद्रास HC के फैसले को चुनौती
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) की उस याचिका को दूसरी पीठ के पास भेज दिया, जिसमें उसने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें तमिलनाडु में सार्वजनिक स्थानों से राजनीतिक दलों के स्थायी झंडे के डंडे (फ्लैग पोल) हटाने का निर्देश दिया गया था। यह मामला जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ के सामने आया था। मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि इसी तरह की एक याचिका पहले जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनी गई थी। इसलिए यह मामला उसी पीठ को भेजा जाए। अदालत ने कहा, 'इस मामले को जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जाए और यदि आवश्यकता हो तो मुख्य न्यायाधीश से उचित आदेश लिए जाएं।'
मद्रास हाईकोर्ट ने पहले अपने एक आदेश में सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक और धार्मिक संगठनों को निर्देश दिया था कि वे 12 हफ्तों के भीतर सार्वजनिक स्थलों से अपने स्थायी झंडे के डंडे हटा लें। हाईकोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक स्थान जनता की संपत्ति हैं और उनका राजनीतिक या निजी उपयोग नहीं किया जा सकता। सीपीआई (एम) ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि पार्टी मजदूर वर्ग की अग्रणी संगठन है और झंडे जैसे प्रतीक उसके जनता से जुड़े रहने का माध्यम हैं। इसके साथ ही पार्टी का तर्क था कि हाईकोर्ट का यह आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संगठन के अधिकार का उल्लंघन करता है और यह 'न्यायपालिका की तरफ से किया गया अनुचित कानून निर्माण' है। अब सुप्रीम कोर्ट की नई पीठ इस मामले की आगे की सुनवाई करेगी और यह तय करेगी कि हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा या उसमें बदलाव किया जाएगा।
Trending Videos
सुप्रीम कोर्ट ने माकपा की याचिका दूसरे पीठ के पास भेजी, मद्रास HC के फैसले को चुनौती
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) की उस याचिका को दूसरी पीठ के पास भेज दिया, जिसमें उसने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें तमिलनाडु में सार्वजनिक स्थानों से राजनीतिक दलों के स्थायी झंडे के डंडे (फ्लैग पोल) हटाने का निर्देश दिया गया था। यह मामला जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ के सामने आया था। मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि इसी तरह की एक याचिका पहले जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनी गई थी। इसलिए यह मामला उसी पीठ को भेजा जाए। अदालत ने कहा, 'इस मामले को जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जाए और यदि आवश्यकता हो तो मुख्य न्यायाधीश से उचित आदेश लिए जाएं।'
विज्ञापन
विज्ञापन
मद्रास हाईकोर्ट ने पहले अपने एक आदेश में सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक और धार्मिक संगठनों को निर्देश दिया था कि वे 12 हफ्तों के भीतर सार्वजनिक स्थलों से अपने स्थायी झंडे के डंडे हटा लें। हाईकोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक स्थान जनता की संपत्ति हैं और उनका राजनीतिक या निजी उपयोग नहीं किया जा सकता। सीपीआई (एम) ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि पार्टी मजदूर वर्ग की अग्रणी संगठन है और झंडे जैसे प्रतीक उसके जनता से जुड़े रहने का माध्यम हैं। इसके साथ ही पार्टी का तर्क था कि हाईकोर्ट का यह आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संगठन के अधिकार का उल्लंघन करता है और यह 'न्यायपालिका की तरफ से किया गया अनुचित कानून निर्माण' है। अब सुप्रीम कोर्ट की नई पीठ इस मामले की आगे की सुनवाई करेगी और यह तय करेगी कि हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा या उसमें बदलाव किया जाएगा।
तेलंगाना हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति की याचिका पर बिफरा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को याचिकाकर्ता को तेलंगाना उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और इस मामले को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और व्यवस्था का मजाक करार दिया। मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने नाराजगी जताते हुए कहा, 'मैं एक काम करूंगा, मैं यहां एक कॉलेजियम बैठक के लिए तीन वरिष्ठतम (उच्च न्यायालय) न्यायाधीशों की एक पीठ का गठन करूंगा... आपने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अभ्यावेदन और आवेदन करने के बारे में कहां सुना है? यह व्यवस्था का मजाक है!'
न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की भी पीठ, जीवी सरवन कुमार नाम के व्यक्ति द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्हें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि ऐसी याचिका कैसे दायर की जा सकती है। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील को भी फटकार लगाते हुए कहा कि ऐसी याचिका अदालत के समक्ष कभी नहीं लाई जानी चाहिए थी। वकील ने खेद व्यक्त किया और याचिका वापस लेने की मांग की। इसके बाद याचिका वापस ली गई मानकर खारिज कर दी गई। उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के अलावा, याचिका में प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, लोकसभा में विपक्ष के नेता, सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल और अन्य को पक्षकार बनाया गया था। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियां कॉलेजियम प्रणाली की तरफ से संचालित होती हैं, जिसमें न्यायिक और पेशेवर साख के आधार पर न्यायाधीशों की सिफारिश की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को याचिकाकर्ता को तेलंगाना उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और इस मामले को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और व्यवस्था का मजाक करार दिया। मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने नाराजगी जताते हुए कहा, 'मैं एक काम करूंगा, मैं यहां एक कॉलेजियम बैठक के लिए तीन वरिष्ठतम (उच्च न्यायालय) न्यायाधीशों की एक पीठ का गठन करूंगा... आपने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अभ्यावेदन और आवेदन करने के बारे में कहां सुना है? यह व्यवस्था का मजाक है!'
न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की भी पीठ, जीवी सरवन कुमार नाम के व्यक्ति द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्हें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि ऐसी याचिका कैसे दायर की जा सकती है। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील को भी फटकार लगाते हुए कहा कि ऐसी याचिका अदालत के समक्ष कभी नहीं लाई जानी चाहिए थी। वकील ने खेद व्यक्त किया और याचिका वापस लेने की मांग की। इसके बाद याचिका वापस ली गई मानकर खारिज कर दी गई। उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के अलावा, याचिका में प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, लोकसभा में विपक्ष के नेता, सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल और अन्य को पक्षकार बनाया गया था। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियां कॉलेजियम प्रणाली की तरफ से संचालित होती हैं, जिसमें न्यायिक और पेशेवर साख के आधार पर न्यायाधीशों की सिफारिश की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई: राजनीतिक दलों की वेबसाइट पर नियम व संविधान प्रकाशित करने की याचिका पर विचार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह चुनाव आयोग को निर्देश देने पर विचार करेगा कि सभी राजनीतिक दल अपने संविधान, नियम और विनियम अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक करें। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, उज्जल भुइयां और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई है। अदालत ने कहा कि यदि कोई बड़ी बाधा नहीं हुई तो इस पर आवश्यक निर्देश जारी किए जाएंगे।
पीठ ने केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से निर्देश लेने को कहा। उपाध्याय ने अदालत से आग्रह किया कि राजनीतिक दल न केवल अपने संविधान और नियम प्रकाशित करें बल्कि उनका पालन भी करें, जैसा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A में प्रावधान है। इससे पहले 12 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों के पंजीकरण और नियमन को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने संबंधी याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई थी।
पीठ ने केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से निर्देश लेने को कहा। उपाध्याय ने अदालत से आग्रह किया कि राजनीतिक दल न केवल अपने संविधान और नियम प्रकाशित करें बल्कि उनका पालन भी करें, जैसा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A में प्रावधान है। इससे पहले 12 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों के पंजीकरण और नियमन को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने संबंधी याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई थी।
सुप्रीम कोर्ट नाराज, ट्रिब्यूनल कानून पर सुनवाई के बीच केंद्र ने बड़ी पीठ की मांग की
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई जब उसने ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स (रैशनलाइजेशन एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) एक्ट, 2021 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की। मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि यह अनुरोध सुनवाई के अंतिम चरण में करना “अनुचित और अप्रत्याशित” है।
मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा कि केंद्र ऐसा प्रतीत कर रहा है जैसे वह मौजूदा पीठ से बचना चाहता हो। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली सुनवाई में अटॉर्नी जनरल ने व्यक्तिगत कारणों से स्थगन मांगा था, न कि बड़ी पीठ के गठन की मांग। पीठ ने स्पष्ट कहा कि यदि केंद्र का आवेदन खारिज किया गया, तो यह टिप्पणी की जाएगी कि सरकार सुनवाई टालना चाहती है। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने आग्रह किया कि सरकार की मंशा को गलत न समझा जाए और कहा कि यह मुद्दा पहले ही सरकार के जवाब में उठाया गया था। अदालत ने केंद्र से कहा कि अब केवल मेरिट पर ही तर्क प्रस्तुत करें।
मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा कि केंद्र ऐसा प्रतीत कर रहा है जैसे वह मौजूदा पीठ से बचना चाहता हो। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली सुनवाई में अटॉर्नी जनरल ने व्यक्तिगत कारणों से स्थगन मांगा था, न कि बड़ी पीठ के गठन की मांग। पीठ ने स्पष्ट कहा कि यदि केंद्र का आवेदन खारिज किया गया, तो यह टिप्पणी की जाएगी कि सरकार सुनवाई टालना चाहती है। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने आग्रह किया कि सरकार की मंशा को गलत न समझा जाए और कहा कि यह मुद्दा पहले ही सरकार के जवाब में उठाया गया था। अदालत ने केंद्र से कहा कि अब केवल मेरिट पर ही तर्क प्रस्तुत करें।
सुप्रीम कोर्ट ने ग्लास ट्रस्ट की याचिका खारिज की, आकाश को EGM आयोजित करने की मंजूरी बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को थिंक एंड लर्न प्राइवेट लिमिटेड (बायजूस) के सबसे बड़े अमेरिकी कर्जदाता ग्लास ट्रस्ट की याचिका को खारिज करते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने आकाश एजुकेशनल सर्विसेज लिमिटेड (एईएसएल) को अपने राइट्स इश्यू पर असाधारण आम बैठक आयोजित करने की अनुमति दे दी। यह फैसला एनसीएलटी के 28 अक्टूबर के आदेश को समर्थन देता है।
एईएसएल के हेड-लीगल संजय गर्ग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय उनकी संस्था की विरासत और न्यायिक प्रक्रिया की साख को मजबूत करता है। उन्होंने कहा, “हम तीन दशक से शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता की परंपरा निभा रहे हैं और अब भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के अपने मिशन पर प्रतिबद्ध हैं।” एनसीएलटी ने पहले ही कहा था कि ग्लास ट्रस्ट की आपत्ति का कोई ठोस आधार नहीं है और IBC कानून किसी कंपनी के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता।
एईएसएल के हेड-लीगल संजय गर्ग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय उनकी संस्था की विरासत और न्यायिक प्रक्रिया की साख को मजबूत करता है। उन्होंने कहा, “हम तीन दशक से शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता की परंपरा निभा रहे हैं और अब भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के अपने मिशन पर प्रतिबद्ध हैं।” एनसीएलटी ने पहले ही कहा था कि ग्लास ट्रस्ट की आपत्ति का कोई ठोस आधार नहीं है और IBC कानून किसी कंपनी के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता।
