{"_id":"631dc4424c148e76544c5d8d","slug":"shankaracharya-saraswati-is-no-more-took-his-last-breath-at-the-age-of-99","type":"story","status":"publish","title_hn":"Swaroopanand Saraswati Death: शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती नहीं रहे, नरसिंहपुर में ली अंतिम सांस","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Swaroopanand Saraswati Death: शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती नहीं रहे, नरसिंहपुर में ली अंतिम सांस
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अरविंद कुमार
Updated Sun, 11 Sep 2022 05:32 PM IST
विज्ञापन
सार
देश की चार प्रमुख पीठों में शामिल ज्योतिष और द्वारकाशारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का आज यानी रविवार को निधन हो गया। उन्होंने मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में स्थित गोटेगांव के समीप झोतेश्वर धाम में अंतिम सांस ली।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती
- फोटो : Social Media
विज्ञापन
विस्तार
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया है। मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर के झोतेश्वर मंदिर में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे 98 साल पूरे कर चुके थे और उन्होंने 99वें साल में प्रवेश किया था वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। हाल ही में 3 सितंबर को उन्होंने अपना 99वां जन्मदिन मनाया था। वह द्वारका की शारदा पीठ और ज्योर्तिमठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य थे।
Trending Videos
विज्ञापन
विज्ञापन
शंकराचार्य ने राम मंदिर निर्माण के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। आजादी के आंदोलन में भी भाग लिया। स्वरूपानंद सरस्वती को हिंदुओं का सबसे बड़ा धर्मगुरु माना जाता था। अंतिम समय में शंकराचार्य के अनुयायी और शिष्य उनके समीप थे। उनके बृह्मलीन होने की सूचना के बाद आसपास के क्षेत्रों से भक्तों की भीड़ आश्रम की ओर पहुंचने लगी।
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म...
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म मध्यप्रदेश राज्य के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा था। महज नौ साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ धर्म की यात्रा शुरू कर दी थी।
इस दौरान वो उत्तरप्रदेश के काशी भी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली। आपको जानकर हैरानी होगी कि साल 1942 के इस दौर में वो महज 19 साल की उम्र में क्रांतिकारी साधु के रुप में प्रसिद्ध हुए थे। क्योंकि उस समय देश में अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई चल रही थी।
स्वामी स्वरूपानंद ने ली दंड दीक्षा
स्वामी स्वरूपानंद ने साल 1950 में वे दंडी संन्यासी बनाये गए और 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली। साल 1950 में ज्योतिषपीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे।

कमेंट
कमेंट X