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बंधुआ मजदूरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त: केंद्र सरकार से पूछा सवाल- अब तक क्या-क्या किया?
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 21 Apr 2026 06:10 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरराज्यीय बंधुआ मजदूरी और बाल तस्करी को लेकर केंद्रीय श्रम सचिव से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने खास तौर पर उन बच्चों के पुनर्वास और आर्थिक सहायता में हो रही देरी पर सवाल उठाए हैं, जिन्हें रेस्क्यू तो कर लिया गया, लेकिन मदद नहीं मिली। अदालत ने केंद्र को राज्यों के साथ मिलकर एक सरल सिस्टम बनाने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
देश में पैर पसारते अंतरराज्यीय बंधुआ मजदूरी और बच्चों की तस्करी के नेटवर्क पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय के सचिव को व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दायर करने का आदेश दिया है। अदालत ने साफ लहजे में पूछा है कि इस अभिशाप को खत्म करने के लिए सरकार ने अब तक जमीन पर क्या कदम उठाए हैं?
सिर्फ रिपोर्ट नहीं, समाधान चाहिए- सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि मंत्रालय न केवल अपनी कार्रवाई का विवरण दें, बल्कि यह भी बताए कि इस समस्या को जड़ से मिटाने के लिए उसे अदालत से और किस तरह के दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है। यह सुनवाई उन याचिकाओं पर हो रही है, जिनमें बंधुआ मजदूरों के मौलिक अधिकारों के हनन और तस्करी का मुद्दा उठाया गया है।
आंकड़ों ने खोली व्यवस्था की पोल
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि अलग-अलग राज्यों से लगभग 11,000 बच्चों को रेस्क्यू कराया गया था। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि उनमें से केवल 971 बच्चों को ही तत्काल आर्थिक सहायता मिल पाई। बाकी बच्चे आज भी सरकारी मदद के इंतजार में हैं।
यह भी पढ़ें: LPG: 'क्रूड की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद देश में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति सामान', सरकार ने बताया
अंतरराज्यीय तालमेल का अभाव
शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि सबसे बड़ी समस्या रेस्क्यू किए गए बच्चों को तुरंत मदद पहुंचाने में आती है। अक्सर बच्चे एक राज्य के होते हैं और उन्हें दूसरे पड़ोसी राज्य में बंधुआ बनाकर रखा जाता है। ऐसे में राज्यों के बीच तालमेल न होने का खामियाजा इन मासूमों को भुगतना पड़ता है। शीर्ष अदालत ने मंत्रालय को निर्देश दिया कि वे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सचिवों के साथ बैठक कर एक सरल और प्रभावी प्रक्रिया तैयार करें।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2022 का है। बिहार के गया जिले के कुछ मजदूरों ने अपनी आपबीती सुनाई है। उन्हें एक बिना रजिस्ट्रेशन वाले ठेकेदार ने उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के एक ईंट भट्ठे पर बंधुआ बना लिया था। उनसे न्यूनतम मजदूरी के बिना काम कराया जा रहा था और उनके आने-जाने पर भी पाबंदी थी। 2019 में मुक्त होने के बाद उन्होंने न्याय की गुहार लगाई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 19 मई की तारीख तय की है।
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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि मंत्रालय न केवल अपनी कार्रवाई का विवरण दें, बल्कि यह भी बताए कि इस समस्या को जड़ से मिटाने के लिए उसे अदालत से और किस तरह के दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है। यह सुनवाई उन याचिकाओं पर हो रही है, जिनमें बंधुआ मजदूरों के मौलिक अधिकारों के हनन और तस्करी का मुद्दा उठाया गया है।
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आंकड़ों ने खोली व्यवस्था की पोल
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि अलग-अलग राज्यों से लगभग 11,000 बच्चों को रेस्क्यू कराया गया था। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि उनमें से केवल 971 बच्चों को ही तत्काल आर्थिक सहायता मिल पाई। बाकी बच्चे आज भी सरकारी मदद के इंतजार में हैं।
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शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि सबसे बड़ी समस्या रेस्क्यू किए गए बच्चों को तुरंत मदद पहुंचाने में आती है। अक्सर बच्चे एक राज्य के होते हैं और उन्हें दूसरे पड़ोसी राज्य में बंधुआ बनाकर रखा जाता है। ऐसे में राज्यों के बीच तालमेल न होने का खामियाजा इन मासूमों को भुगतना पड़ता है। शीर्ष अदालत ने मंत्रालय को निर्देश दिया कि वे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सचिवों के साथ बैठक कर एक सरल और प्रभावी प्रक्रिया तैयार करें।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2022 का है। बिहार के गया जिले के कुछ मजदूरों ने अपनी आपबीती सुनाई है। उन्हें एक बिना रजिस्ट्रेशन वाले ठेकेदार ने उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के एक ईंट भट्ठे पर बंधुआ बना लिया था। उनसे न्यूनतम मजदूरी के बिना काम कराया जा रहा था और उनके आने-जाने पर भी पाबंदी थी। 2019 में मुक्त होने के बाद उन्होंने न्याय की गुहार लगाई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 19 मई की तारीख तय की है।
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