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SC: एल्गार केस से हटे न्यायमूर्ति सुंदरेश; बॉम्बे हाईकोर्ट के सीजे के लिए जस्टिस चंद्रशेखर के नाम की सिफारिश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Tue, 26 Aug 2025 08:15 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस श्री चंद्रशेखर को बॉम्बे हाईकोर्ट का नया मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की है। फिलहाल वे बॉम्बे हाईकोर्ट में जज के रूप में कार्यरत हैं और उनकी पैतृक अदालत झारखंड हाईकोर्ट है। कॉलेजियम ने छह अतिरिक्त जजों को बॉम्बे हाईकोर्ट में और तीन को केरल हाईकोर्ट में स्थायी जज नियुक्त करने की मंजूरी दी है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम. एम. सुंदरेश ने मंगलवार को एल्गार परिषद-माओवादी लिंक केस के आरोपी अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। अदालत की वेबसाइट पर दर्ज स्थिति के अनुसार यह मामला अब उनके समक्ष सूचीबद्ध नहीं होगा। यह सुनवाई जस्टिस सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की बेंच के समक्ष होनी थी। वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने आठ अगस्त को सीजेआई बी. आर. गवई के समक्ष मामले का उल्लेख किया था और कहा था कि उनके मुवक्किल गाडलिंग छह साल से अधिक समय से जेल में हैं तथा उनकी जमानत अर्जी सुप्रीम कोर्ट में 11 बार स्थगित हो चुकी है।
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बॉम्बे हाईकोर्ट के सीजे के लिए जस्टिस चंद्रशेखर के नाम की सिफारिश
सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश के लिए जस्टिस श्री चंद्रशेखर के नाम की सिफारिश की है। यह निर्णय 25 अगस्त को हुई कॉलेजियम की बैठक में लिया गया। जस्टिस चंद्रशेखर फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट में ही जज के तौर पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी पैतृक अदालत झारखंड हाईकोर्ट है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की इस बैठक की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश ने की, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ भी शामिल थे। बैठक में कई अहम फैसले लिए गए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर जस्टिस श्री चंद्रशेखर की नियुक्ति की सिफारिश रही। इसके अलावा कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के छह अतिरिक्त जजों को स्थायी जज बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी। इन जजों के नाम हैं जस्टिस संजय आनंदराव देशमुख, जस्टिस वृशाली विजय जोशी, जस्टिस अभय जयरामजी मंत्री, जस्टिस श्याम छगनलाल चांदक, जस्टिस नीरज प्रदीप धोटे और जस्टिस सोमशेखर सुंदरसन। इनकी स्थायी नियुक्ति से बॉम्बे हाईकोर्ट की कार्यक्षमता और बढ़ेगी।
कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के साथ-साथ केरल हाईकोर्ट से जुड़ा एक बड़ा फैसला भी किया। यहां तीन अतिरिक्त जजों को स्थायी जज बनाए जाने की मंजूरी दी गई। इनमें जस्टिस जॉनसन जॉन, जस्टिस गोपीनाथन उन्नीथन गिरीश और जस्टिस चेल्लप्पन नादर प्रथीप कुमार शामिल हैं। इन नियुक्तियों से केरल हाईकोर्ट में लंबित मामलों के निपटारे की गति तेज होने की उम्मीद है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के ये निर्णय न्यायपालिका में पारदर्शिता और कार्यक्षमता बढ़ाने के कदम माने जा रहे हैं। न्यायपालिका में मुख्य न्यायाधीश और स्थायी जजों की नियुक्ति न केवल संस्थान को मजबूती देती है, बल्कि न्याय पाने के इच्छुक आम नागरिकों के लिए भी राहत की उम्मीद बढ़ाती है। जस्टिस श्री चंद्रशेखर की सिफारिश के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट को एक अनुभवी नेतृत्व मिलने जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश के लिए जस्टिस श्री चंद्रशेखर के नाम की सिफारिश की है। यह निर्णय 25 अगस्त को हुई कॉलेजियम की बैठक में लिया गया। जस्टिस चंद्रशेखर फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट में ही जज के तौर पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी पैतृक अदालत झारखंड हाईकोर्ट है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की इस बैठक की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश ने की, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ भी शामिल थे। बैठक में कई अहम फैसले लिए गए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर जस्टिस श्री चंद्रशेखर की नियुक्ति की सिफारिश रही। इसके अलावा कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के छह अतिरिक्त जजों को स्थायी जज बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी। इन जजों के नाम हैं जस्टिस संजय आनंदराव देशमुख, जस्टिस वृशाली विजय जोशी, जस्टिस अभय जयरामजी मंत्री, जस्टिस श्याम छगनलाल चांदक, जस्टिस नीरज प्रदीप धोटे और जस्टिस सोमशेखर सुंदरसन। इनकी स्थायी नियुक्ति से बॉम्बे हाईकोर्ट की कार्यक्षमता और बढ़ेगी।
कॉलेजियम ने बॉम्बे हाईकोर्ट के साथ-साथ केरल हाईकोर्ट से जुड़ा एक बड़ा फैसला भी किया। यहां तीन अतिरिक्त जजों को स्थायी जज बनाए जाने की मंजूरी दी गई। इनमें जस्टिस जॉनसन जॉन, जस्टिस गोपीनाथन उन्नीथन गिरीश और जस्टिस चेल्लप्पन नादर प्रथीप कुमार शामिल हैं। इन नियुक्तियों से केरल हाईकोर्ट में लंबित मामलों के निपटारे की गति तेज होने की उम्मीद है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के ये निर्णय न्यायपालिका में पारदर्शिता और कार्यक्षमता बढ़ाने के कदम माने जा रहे हैं। न्यायपालिका में मुख्य न्यायाधीश और स्थायी जजों की नियुक्ति न केवल संस्थान को मजबूती देती है, बल्कि न्याय पाने के इच्छुक आम नागरिकों के लिए भी राहत की उम्मीद बढ़ाती है। जस्टिस श्री चंद्रशेखर की सिफारिश के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट को एक अनुभवी नेतृत्व मिलने जा रहा है।
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नीतीश कटारा हत्याकांड के दोषी विकास यादव की अंतरिम जमानत बढ़ाई
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2002 के नीतीश कटारा हत्याकांड में 25 साल की जेल की सजा काट रहे दोषी विकास यादव की अंतरिम जमानत एक सप्ताह के लिए बढ़ा दी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 22 अगस्त के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की। हाईकोर्ट ने अंतरिम जमानत को बढ़ाने से इनकार कर दिया था। 54 वर्षीय यादव, जो 23 साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं, ने इस आधार पर अंतरिम जमानत भी मांगी कि उनकी शादी 5 सितंबर को तय हुई है और उन्हें 54 लाख रुपये का इंतजाम करना है, जो सजा सुनाए जाने के समय उन पर लगाया गया जुर्माना है।
पीठ ने उच्च न्यायालय के विचार से सहमति जताते हुए कहा कि मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा की जानी चाहिए, जिन्होंने 29 जुलाई को यादव की अंतरिम जमानत बढ़ाने का आदेश पारित किया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए किया गया था कि निचली अदालत द्वारा याचिकाकर्ता को दी गई सजा को सर्वोच्च न्यायालय ने भी न केवल अपील पर निर्णय के समय बल्कि पुनर्विचार याचिका को खारिज किए जाने के समय भी मंजूरी दी थी।
पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय की यह राय प्रथम दृष्टया उचित प्रतीत होती है कि एक बार जब इस न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय की पुष्टि कर दी कि याचिकाकर्ता किसी भी प्रकार की छूट का हकदार नहीं होगा, तो उसके पास याचिकाकर्ता की प्रार्थना को स्वीकार करने का अधिकार नहीं था। यदि ऐसा है, तो यह न्यायालय ही है जो इस पर विचार कर सकता है और राहत प्रदान कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2002 के नीतीश कटारा हत्याकांड में 25 साल की जेल की सजा काट रहे दोषी विकास यादव की अंतरिम जमानत एक सप्ताह के लिए बढ़ा दी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 22 अगस्त के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की। हाईकोर्ट ने अंतरिम जमानत को बढ़ाने से इनकार कर दिया था। 54 वर्षीय यादव, जो 23 साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं, ने इस आधार पर अंतरिम जमानत भी मांगी कि उनकी शादी 5 सितंबर को तय हुई है और उन्हें 54 लाख रुपये का इंतजाम करना है, जो सजा सुनाए जाने के समय उन पर लगाया गया जुर्माना है।
पीठ ने उच्च न्यायालय के विचार से सहमति जताते हुए कहा कि मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा की जानी चाहिए, जिन्होंने 29 जुलाई को यादव की अंतरिम जमानत बढ़ाने का आदेश पारित किया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए किया गया था कि निचली अदालत द्वारा याचिकाकर्ता को दी गई सजा को सर्वोच्च न्यायालय ने भी न केवल अपील पर निर्णय के समय बल्कि पुनर्विचार याचिका को खारिज किए जाने के समय भी मंजूरी दी थी।
पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय की यह राय प्रथम दृष्टया उचित प्रतीत होती है कि एक बार जब इस न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय की पुष्टि कर दी कि याचिकाकर्ता किसी भी प्रकार की छूट का हकदार नहीं होगा, तो उसके पास याचिकाकर्ता की प्रार्थना को स्वीकार करने का अधिकार नहीं था। यदि ऐसा है, तो यह न्यायालय ही है जो इस पर विचार कर सकता है और राहत प्रदान कर सकता है।
दुष्कर्म और हत्या के मामले में 2 आरोपी बरी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- घटिया जांच का उदाहरण
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक दोषी समेत दो लोगों को बरी कर दिया। कोर्ट ने इसे घटिया जांच का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। कोर्ट ने कहा कि दोनों आरोपियों से रक्त के नमूने लेने से जुड़ा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। साथ ही इसे साक्ष्य के रूप में प्रदर्शित नहीं किया गया। इससे डीएनए रिपोर्ट कचरे का टुकड़ा बन कर रह गई। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष दोनों अपीलकर्ताओं के अपराध को साबित करने में बहुत बुरी तरह विफल रहा। उसके पास ऐसे ठोस सबूत नहीं थे जिन्हें मामले को सभी संदेहों से परे साबित करने वाला कहा जा सकता है।
फैसले में कहा गया कि हमारा मानना है कि वर्तमान मामला फीकी और घटिया जांच का एक और उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके चलते एक मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या से जुड़े मामले की जांच फेल हो गई। शीर्ष अदालत का फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अक्टूबर 2018 के फैसले के खिलाफ अपील पर आया। उच्च न्यायालय ने आरोपी पुतई को निचली अदालत द्वारा दी गई मौत की सजा की पुष्टि की थी तथा उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया था। निचली अदालत ने इस मामले में आरोपी दिलीप को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक दोषी समेत दो लोगों को बरी कर दिया। कोर्ट ने इसे घटिया जांच का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। कोर्ट ने कहा कि दोनों आरोपियों से रक्त के नमूने लेने से जुड़ा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। साथ ही इसे साक्ष्य के रूप में प्रदर्शित नहीं किया गया। इससे डीएनए रिपोर्ट कचरे का टुकड़ा बन कर रह गई। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष दोनों अपीलकर्ताओं के अपराध को साबित करने में बहुत बुरी तरह विफल रहा। उसके पास ऐसे ठोस सबूत नहीं थे जिन्हें मामले को सभी संदेहों से परे साबित करने वाला कहा जा सकता है।
फैसले में कहा गया कि हमारा मानना है कि वर्तमान मामला फीकी और घटिया जांच का एक और उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके चलते एक मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या से जुड़े मामले की जांच फेल हो गई। शीर्ष अदालत का फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अक्टूबर 2018 के फैसले के खिलाफ अपील पर आया। उच्च न्यायालय ने आरोपी पुतई को निचली अदालत द्वारा दी गई मौत की सजा की पुष्टि की थी तथा उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया था। निचली अदालत ने इस मामले में आरोपी दिलीप को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
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मौत की सजा पाने वाले दुष्कर्म और हत्या के दोषी के मामले की दोबारा जांच पर सुप्रीम कोर्ट सहमत
उच्चतम न्यायालय ने नाबालिग से बलात्कार और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक दोषी के मामले की फिर से जांच करने पर सहमति जताई है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि यदि सजा के समय 2022 में शीर्ष अदालत द्वारा तैयार किए गए दंड को कम करने वाले कारकों पर दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया तो सजा के बिंदु पर मामले को फिर से खोला जा सकता है।
नागपुर के रहने वाले वसंत संपत दुपारे को अप्रैल 2008 में चार साल की नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म और हत्या के लिए सजा दी गई थी। शीर्ष अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा पर 2017 के दृष्टिकोण को फिलहाल दरकिनार कर दिया और मामले को उचित निर्देशों के लिए मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के समक्ष भेज दिया।
उच्चतम न्यायालय ने नाबालिग से बलात्कार और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक दोषी के मामले की फिर से जांच करने पर सहमति जताई है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि यदि सजा के समय 2022 में शीर्ष अदालत द्वारा तैयार किए गए दंड को कम करने वाले कारकों पर दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया तो सजा के बिंदु पर मामले को फिर से खोला जा सकता है।
नागपुर के रहने वाले वसंत संपत दुपारे को अप्रैल 2008 में चार साल की नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म और हत्या के लिए सजा दी गई थी। शीर्ष अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा पर 2017 के दृष्टिकोण को फिलहाल दरकिनार कर दिया और मामले को उचित निर्देशों के लिए मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के समक्ष भेज दिया।