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Supreme Court: पुजारियों-मंदिर कर्मचारियों के वेतन संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई, न्यायिक आयोग गठित करने की मांग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Mon, 18 May 2026 08:05 AM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन की समीक्षा वाली याचिका पर सुनवाई करेगा। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने पुजारियों को 'कर्मचारी' मानकर न्यूनतम वेतन देने की मांग की है। इसमें काशी विश्वनाथ और मदुरै मंदिर समेत आंध्र-तेलंगाना के उदाहरण दिए गए हैं, जहां पुजारियों को न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिल रही।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उस याचिका पर सुनवाई करने वाला है, जिसमें सरकार-नियंत्रित मंदिरों में पुजारियों, सेवादारों और मंदिर कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन और अन्य लाभों की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर इस जनहित पीआईएल पर सुनवाई कर सकती है।
याचिकाकर्ता चाहते हैं कि पुजारियों-मंदिर कर्मचारियों को वेतन संहिता, 2019 की धारा 2(के) के तहत कर्मचारी माना जाए। याचिका में तर्क दिया गया है कि जब राज्य किसी मंदिर का प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है, तो वहां मालिक और कर्मचारी का रिश्ता बन जाता है। ऐसे में पुजारियों को सम्मानजनक वेतन न देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि मामले की शुरुआत 4 अप्रैल को हुई। उस दिन वह वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में एक कार्यक्रम में शामिल होने गए थे। वहां पूजा करने के बाद उन्हें पता चला कि सरकारी नियंत्रण वाले इस मंदिर के पुजारियों और कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है।
याचिका में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का भी जिक्र किया गया है। वहां हाल ही में पुजारियों और कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। याचिका के अनुसार, इन लोगों को अकुशल या अर्ध-कुशल मजदूरों के लिए तय न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल रहा है। इसे एक तरह का शोषण बताया गया है। राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में काम करने के बजाय न्यूनतम मजदूरी अधिनियम और नीति निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 43) का उल्लंघन कर रहा है। याचिका में 7 फरवरी 2025 की एक घटना का भी जिक्र है। उस दिन मदुरै के दंडायुथपाणि स्वामी मंदिर में एक सर्कुलर जारी कर पुजारियों को आरती की थाली में दक्षिणा लेने से मना कर दिया गया था। हालांकि विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया, लेकिन इससे पुजारियों के सामने भुखमरी का खतरा पैदा हो गया था।
याचिकाकर्ता चाहते हैं कि पुजारियों-मंदिर कर्मचारियों को वेतन संहिता, 2019 की धारा 2(के) के तहत कर्मचारी माना जाए। याचिका में तर्क दिया गया है कि जब राज्य किसी मंदिर का प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है, तो वहां मालिक और कर्मचारी का रिश्ता बन जाता है। ऐसे में पुजारियों को सम्मानजनक वेतन न देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि मामले की शुरुआत 4 अप्रैल को हुई। उस दिन वह वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में एक कार्यक्रम में शामिल होने गए थे। वहां पूजा करने के बाद उन्हें पता चला कि सरकारी नियंत्रण वाले इस मंदिर के पुजारियों और कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है।
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याचिका में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का भी जिक्र किया गया है। वहां हाल ही में पुजारियों और कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। याचिका के अनुसार, इन लोगों को अकुशल या अर्ध-कुशल मजदूरों के लिए तय न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल रहा है। इसे एक तरह का शोषण बताया गया है। राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में काम करने के बजाय न्यूनतम मजदूरी अधिनियम और नीति निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 43) का उल्लंघन कर रहा है। याचिका में 7 फरवरी 2025 की एक घटना का भी जिक्र है। उस दिन मदुरै के दंडायुथपाणि स्वामी मंदिर में एक सर्कुलर जारी कर पुजारियों को आरती की थाली में दक्षिणा लेने से मना कर दिया गया था। हालांकि विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया, लेकिन इससे पुजारियों के सामने भुखमरी का खतरा पैदा हो गया था।