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मिसाल: 14 दिन का सफर, जानलेवा ठंड और खतरनाक पहाड़; गोरखपुर की दिव्या ने साइकिल से फतह किया एवरेस्ट बेस कैंप

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 18 May 2026 07:02 AM IST
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सार

गोरखपुर की शिक्षिका दिव्या सिंह साइकिल से एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। बछेंद्री पाल से प्रेरित होकर उन्होंने यह 14 दिनों का खतरनाक अभियान पूरा किया। बर्फीली हवाओं, कम ऑक्सीजन और मुश्किल रास्तों का सामना करते हुए उन्होंने कई बार साइकिल कंधे पर भी उठाई। डेढ़ साल की कड़ी ट्रेनिंग और मजबूत इरादों से हासिल की गई उनकी यह कामयाबी युवाओं और महिलाओं के लिए एक बड़ी मिसाल है। 

Gorakhpurs Divya Conquers Everest Base Camp on Bicycle 14-Day Journey Threatening Cold Treacherous Mountains
दिव्या सिंह बनीं मिसाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

उत्तर प्रदेश की एक युवा बेटी ने अपनी साइकिल और मेहनत के दम पर पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर दिया है। गोरखपुर जिले की रहने वाली दिव्या सिंह ने दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ एवरेस्ट के बेस कैंप तक साइकिल से अपनी यात्रा पूरी कर ली है। साइकिल चलाकर एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचने वाली वह पूरे भारत की पहली महिला बन गई हैं। इस यात्रा के दौरान भयंकर ठंड ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की और खतरनाक पहाड़ी रास्तों ने उन्हें डराया। लेकिन दिव्या का जुनून और हौसला इतना बड़ा था कि मंजिल खुद उनके कदमों के करीब आ गई। दिव्या सिंह ने यह साबित कर दिया है कि अगर मन में कुछ करने की सच्ची लगन हो, तो आसमान भी छुआ जा सकता है और रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं।


दिव्या ने पहाड़ों के उन रास्तों पर अपनी साइकिल दौड़ाई है, जहां बड़े-बड़े अनुभवी लोग पैदल चलने में भी डरते हैं। उन्होंने दुनिया के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण माने जाने वाले एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचने के लिए लगातार 14 दिनों तक साइकिल चलाई। इस पूरे सफर में उन्हें बहुत खतरनाक बर्फीली हवाओं, जानलेवा मोड़ों और बेहद खराब मौसम का डटकर सामना करना पड़ा। पहाड़ की विशाल ऊंचाइयां हर कदम पर एक नई दीवार बनकर उनके सामने खड़ी थीं। लेकिन सबसे खास और बड़ी बात यह रही कि दिव्या ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने बिना किसी बाहरी मदद के, पूरी तरह से अपने ही दम पर खुद को इस खतरनाक अभियान के लिए तैयार किया था।
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बछेंद्री पाल की कहानी से प्रेरणा लेकर दिव्या ने कैसे देखा यह बड़ा सपना?
दिव्या सिंह उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जिले के सहजनवां क्षेत्र के बनौड़ा नाम के एक छोटे से गांव की रहने वाली हैं। वह एक प्राइवेट स्कूल में कक्षा छह से लेकर आठवीं तक की बच्चियों को पढ़ाने का काम करती हैं। अगर उनकी पढ़ाई की बात करें, तो दिव्या ने राजनीति शास्त्र और होम साइंस जैसे विषयों में डबल पोस्ट ग्रेजुएट किया है और प्राथमिक शिक्षा में एक डिप्लोमा भी हासिल किया है। उनके पिता का नाम संतराज सिंह है जो एक साधारण किसान हैं, और उनकी मां उर्मिला देवी एक शिक्षिका हैं। दिव्या अपने घर में सबसे बड़ी बेटी हैं और बचपन से ही उन्हें साहस भरे और जोखिम वाले काम करने का बहुत शौक रहा है। जब वह सातवीं कक्षा में पढ़ती थीं, तब उन्होंने पहाड़ों पर चढ़ने वाली मशहूर भारतीय महिला बछेंद्री पाल की कहानी पढ़ी थी। बस उसी दिन से दिव्या के मन में भी एवरेस्ट के बेस कैंप तक पहुंचने का एक बड़ा सपना जाग गया था। वर्षों तक उन्होंने इस सपने को अपने दिल में जगाए रखा और अब इसे हकीकत में बदल दिया है।

खतरनाक रास्तों के लिए दिव्या ने डेढ़ साल तक साइकिल की कैसी ट्रेनिंग ली?
इतने बड़े और खतरनाक सपने को सच करने के लिए दिव्या सिंह ने करीब डेढ़ साल तक दिन-रात एक करके बहुत कड़ी मेहनत की। उन्होंने बिना पूरी तैयारी के पहाड़ पर जाने का जोखिम बिल्कुल नहीं लिया। इससे पहले साल 2023 और साल 2024 में वह दो बार पैदल चलकर एवरेस्ट बेस कैंप तक जा चुकी थीं। इस पैदल यात्रा से उनका सारा डर खत्म हो गया और उन्हें पहाड़ों का बहुत अच्छा अनुभव भी मिल गया। साइकिल से इस खतरनाक मिशन पर जाने के लिए दिव्या ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के सबसे ऊबड़-खाबड़ और चुनौतीपूर्ण पहाड़ी इलाकों में विशेष ट्रेनिंग ली। इसे ऑफ-रोड माउंटेन साइकिलिंग कहा जाता है, जिसमें टूटे-फूटे और पथरीले रास्तों पर साइकिल चलानी होती है। इस कठिन समय में रस्ट एडवेंचर्स की ट्रेनर उमा सिंह ने उन्हें बहुत अच्छी ट्रेनिंग दी और हर एक कदम पर उनका हौसला बढ़ाया।

14 दिनों के लगातार सफर में दिव्या ने किन बड़ी मुश्किलों का सामना किया?
एवरेस्ट के बेस कैंप तक पहुंचने का यह सफर कोई एक या दो दिन का खेल नहीं था, बल्कि यह पूरे 14 दिनों का एक बहुत ही कठिन और थका देने वाला अभियान था। इन 14 दिनों तक दिव्या सिंह ने लगातार ऊंचे और खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर अपनी साइकिल चलाई। इस दौरान उन्हें एकदम सीधी और खड़ी चढ़ाइयों का सामना करना पड़ा और मौसम भी पल-पल बदल रहा था। दिव्या को हर दिन लगभग 10 से लेकर 12 घंटे तक लगातार साइकिल चलानी पड़ती थी, जो शरीर को पूरी तरह तोड़ देने वाला काम है। जैसे-जैसे पहाड़ की ऊंचाई बढ़ती जा रही थी, रास्ते और भी ज्यादा खतरनाक होते जा रहे थे। रास्ते का हर एक नया मोड़ उनके धैर्य, शरीर की ताकत और उनके दिमाग की मजबूती का कड़ा इम्तिहान ले रहा था। लेकिन दिव्या ने किसी भी जगह पर हार नहीं मानी और अपने पक्के इरादे के दम पर हर बड़ी से बड़ी चुनौती को आसानी से पार कर लिया।

खराब रास्तों पर जब साइकिल चलाना हुआ नामुमकिन, तब दिव्या ने क्या किया?
पहाड़ों की यह यात्रा इतनी आसान नहीं थी कि हमेशा साइकिल के ऊपर बैठकर ही पूरा रास्ता पार किया जा सके। इस कठिन अभियान के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब दिव्या सिंह को बहुत ही गंभीर और जानलेवा चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जैसे-जैसे वह एवरेस्ट की ऊंचाई की तरफ ऊपर बढ़ रही थीं, वहां ठंड इतनी ज्यादा थी कि शरीर का खून भी जम जाए। ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन की बहुत कमी हो जाती है, जिससे हाई एल्टीट्यूड सिकनेस नाम की गंभीर बीमारी होने का खतरा लगातार बना रहता है। कई बार तो हालात इतने खराब हो गए कि दिव्या को सांस लेने में भी बहुत ज्यादा तकलीफ होने लगी। ऊंचे पहाड़ों पर कई खतरनाक रास्ते ऐसे भी आए जहां साइकिल को चलाना पूरी तरह से नामुमकिन था। ऐसे सबसे मुश्किल समय में भी दिव्या रुकी नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी साइकिल को अपने कंधों पर उठा लिया और पैदल ही आगे बढ़ती रहीं। ठंडी और तेज हवाएं शरीर को थका रही थीं, लेकिन दिव्या का दृढ़ संकल्प इन सब कठिनाइयों पर भारी पड़ा।

दिव्या सिंह की यह कामयाबी देश की अन्य महिलाओं के लिए कैसे बनी मिसाल?
दिव्या सिंह ने जो यह कमाल कर दिखाया है, वह पूरे भारत की महिलाओं के लिए साहसिक खेलों की दुनिया में एक बहुत बड़ी मिसाल बन गया है। एवरेस्ट बेस कैंप तक साइकिल से पहुंचना अपने आप में एक बहुत ही दुर्लभ और लगभग नामुमकिन माना जाने वाला काम है। दिव्या ने इसे पूरा करके यह साबित कर दिया है कि अगर इंसान के इरादे पूरी तरह से मजबूत हों, तो कोई भी रुकावट उसका रास्ता नहीं रोक सकती। दुनिया के ऐसे खतरनाक और साहसिक खेलों में आमतौर पर सिर्फ पुरुषों का ही दबदबा माना जाता है। लेकिन दिव्या की इस कामयाबी ने यह कड़ा संदेश दिया है कि महिलाएं भी अब किसी से पीछे नहीं हैं। आज उनकी यह सच्ची कहानी हजारों युवाओं, खिलाड़ियों और देश के लोगों को यह प्रेरणा दे रही है कि अगर आपके पास साधन कम भी हों और हालात मुश्किल भी हों, तब भी आप अपने सपनों को सच कर सकते हैं।

देश के युवाओं को दिव्या की इस ऐतिहासिक यात्रा से क्या बड़ी सीख लेनी चाहिए?
दिव्या सिंह का यह शानदार सफर सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि देश के हर एक युवा के लिए एक बहुत बड़ी और सच्ची सीख है। अपनी कामयाबी से दिव्या ने युवाओं को यह बताया है कि आप जिंदगी में जो कुछ भी पाना चाहते हैं, वह सब आपके अपने भीतर ही मौजूद है। अगर आप अपने मन के अंदर झांककर देखेंगे और खुद पर पूरा भरोसा करेंगे, तो आप दुनिया की कोई भी मंजिल पा सकते हैं। दिव्या ने अपनी मेहनत से यह भी सिखाया है कि जब आपके इरादे चट्टान की तरह मजबूत होते हैं, तो दुनिया की कोई भी बाधा या रुकावट आपको बड़ी नहीं लगती है। जिंदगी में आने वाली विपरीत और खराब परिस्थितियां हमें डराने या पीछे हटाने के लिए नहीं आती हैं, बल्कि वे हमें और भी ज्यादा मजबूत और ताकतवर इंसान बनाने के लिए आती हैं।

क्या पक्के इरादे से असंभव लगने वाले किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है?
जी हां, दिव्या सिंह की यह पूरी यात्रा इस बात का सबसे बड़ा और जीता-जागता सबूत है कि पक्के इरादे से दुनिया का हर असंभव काम संभव किया जा सकता है। एक छोटे से गांव से निकलकर, एक आम शिक्षिका से लेकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के बेस कैंप तक का सफर यह बताता है कि इंसान की असली ताकत उसके मन में होती है। बिना किसी बड़ी मदद के, खुद के दम पर इतनी खतरनाक और जानलेवा परिस्थितियों का सामना करना कोई मामूली बात नहीं है। दिव्या सिंह ने यह साबित कर दिया है कि अगर सपनों में जान हो और उन्हें पूरा करने की जिद हो, तो बड़े से बड़े पहाड़ भी आपके सामने झुक जाते हैं। उनकी यह बहादुरी भरी कहानी आने वाले कई वर्षों तक भारत के लोगों को हिम्मत और हौसला देती रहेगी।
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