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₹1 करोड़ का ईनाम, चार राज्यों में दहशत: गिरफ्तारी से टूटी लाल आतंक की कमर, मिसिर बेसरा की क्या कहानी?

Wed, 29 Jul 2026 09:30 AM IST
राकेश कुमार पीटीआई, रांची।
पीटीआई, रांची। Published by: राकेश कुमार Updated Wed, 29 Jul 2026 09:30 AM IST
सार

झारखंड के धनबाद-गिरिडीह सीमा से 1 करोड़ रुपये का इनामी माओवादी मिसिर बेसरा अपने दो साथियों और दो ग्रामीणों के साथ गिरफ्तार हुआ है। उसी दिन 16 अन्य नक्सलियों ने सरेंडर किया। इस दोहरी कार्रवाई से पूर्वी भारत में माओवादी संगठन की कमर पूरी तरह टूट गई है।
 

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top maoist misir besra carrying 1 crore reward arrested in jharkhand
मिसिर बेसरा, माओवादी - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

झारखंड में लाल आतंक के खिलाफ सुरक्षा बलों को बहुत बड़ी कामयाबी मिली है। एक करोड़ रुपये का इनामी और कुख्यात माओवादी कमांडर मिसिर बेसरा गिरफ्तार हो गया है। उसे मंगलवार शाम झारखंड के धनबाद-गिरिडीह सीमावर्ती इलाके से दबोचा गया। मिसिर बेसरा के साथ दो सक्रिय माओवादी सदस्य भी पकड़े गए हैं। उनके नाम मोछू और सौरभ उर्फ गौरव हैं। इसके अलावा दो स्थानीय ग्रामीणों को भी पकड़ा गया है। पुलिस उनसे पूछताछ कर रही है।
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क्या है इस बड़ी कार्रवाई का पूरा सच? पांच मुख्य बातें
  • एक करोड़ का इनामी गिरफ्तार: केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा एक करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष माओवादी नेता मिसिर बेसरा को दबोचा गया।
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  • चार राज्यों में था नेटवर्क: मिसिर बेसरा का प्रभाव झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में फैला हुआ था।
  • कई संगीन मामले दर्ज: उस पर हत्या, पुलिस बल पर हमले, रंगदारी और आईईडी धमाकों के दर्जनों मामले दर्ज हैं।
  • दो सहयोगी भी पकड़ाए: कुख्यात माओवादी मोछू और सौरभ के साथ दो स्थानीय ग्रामीण भी पुलिस की गिरफ्त में आए।
  • एक ही दिन में दो बड़े झटके: बेसरा की गिरफ्तारी से ठीक पहले 16 नक्सलियों ने पुलिस के सामने सरेंडर किया।

कैसे घिरी नक्सली संगठन की सबसे मजबूत कड़ी, कहां हुई बड़ी चूक?
मिसिर बेसरा गिरिडीह जिले के हरलाडीह का रहने वाला है। वह लंबे समय से सुरक्षा बलों की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल था। संगठन में उसकी भूमिका काफी अहम थी। कोल्हान, सारंडा और पारसनाथ के इलाकों में उसका गहरा प्रभाव था। वह माओवादी संगठन की नीतियां बनाने और अलग-अलग राज्यों में नेटवर्क चलाने का काम करता था। हाल के महीनों में उसके कई करीबी साथियों ने सरेंडर कर दिया था। कई सहयोगी पुलिस अभियानों में पकड़े गए थे। इससे बेसरा का नेटवर्क कमजोर हो गया था। इसी का फायदा उठाकर सुरक्षा बलों ने उसे घेरकर गिरफ्तार कर लिया।
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क्या अब पूरी तरह टूट जाएगी माओवादियों की रीढ़?
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मिसिर बेसरा का पकड़ा जाना माओवादियों के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका है। वह संगठन के कई गहरे राज जानता है। पुलिस उससे लगातार पूछताछ कर रही है। उम्मीद है कि पूछताछ में शीर्ष नेतृत्व, हथियारों की सप्लाई, लेवी वसूली और सुरक्षित ठिकानों को लेकर कई बड़े खुलासे होंगे। पकड़ाए गए ग्रामीणों की भूमिका की भी जांच चल रही है।

एक ही दिन में दूसरा बड़ा झटका
मंगलवार को ही 16 नक्सलियों ने झारखंड पुलिस के सामने सरेंडर किया। इनमें छह नक्सलियों पर 39 लाख रुपये का इनाम था। 128 मामलों में आरोपी और 15 लाख का इनामी संतोष महतो उर्फ बासुदेव दा भी सरेंडर करने वालों में शामिल है।

क्या है मिसिर बेसरा की कहानी? 
कहानी 1980 के दशक से शुरू होती है। झारखंड के गिरिडीह जिले का रहने वाला एक साधारण लड़का मिसिर बेसरा पढ़ाई करने धनबाद आया। कॉलेज में उसका मन किताबों से ज्यादा नक्सली विचारधारा और क्रांति की बातों में लगने लगा। उस समय जल, जंगल और जमीन के नाम पर आंदोलन चल रहे थे, जिनसे वह प्रभावित हो गया। उसने पढ़ाई छोड़ दी और सीधे नक्सलियों के साथ जंगलों में चला गया। मिसिर बेसरा दिमाग का बहुत तेज था और योजनाएं बहुत अच्छी बनाता था। इसी वजह से वह जल्द ही नक्सलियों के बीच बड़ा नेता बन गया। धीरे-धीरे वह माओवादी संगठन की सेंट्रल कमेटी और पोलित ब्यूरो का मुख्य सदस्य बन गया।

एक करोड़ का इनाम और चार राज्यों में दहशत
मिसिर बेसरा ने गिरिडीह के पारसनाथ, सारंडा और कोल्हान के घने जंगलों को अपना अड्डा बना लिया। झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में नक्सली जो भी बड़ी वारदात करते थे, वह बेसरा के इशारे पर ही होती थी। वह पुलिस पर हमले करने, आईईडी धमाके कराने और रंगदारी (लेवी) वसूलने का मास्टरमाइंड था। उसका खौफ इतना बढ़ गया था कि सरकारों ने उस पर एक करोड़ रुपये का भारी इनाम घोषित कर दिया। वह वषों तक पुलिस की मोस्ट वांटेड सूची में सबसे ऊपर रहा।


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कैसे ढहा उसका किला और कैसे हुई गिरफ्तारी?
समय के साथ सुरक्षा बलों ने जंगलों में नक्सलियों के खिलाफ अभियान तेज कर दिए। पिछले कुछ महीनों में मिसिर बेसरा के एक-एक करके लगभग सभी करीबी साथी या तो पुलिस मुठभेड़ में मारे गए या फिर पकड़ लिए गए। इससे उसका नेटवर्क पूरी तरह टूट गया।

जुलाई 2026 में गुप्त सूचना मिलने पर सीआरपीएफ, कोबरा और झारखंड पुलिस ने धनबाद-गिरिडीह सीमा के इलाके को चारों तरफ से घेर लिया। जो मिसिर बेसरा कभी चार राज्यों के लिए दहशत का नाम था, वह अपने दो नक्सली साथियों और दो ग्रामीणों के साथ घिर गया। बिना एक भी गोली चले, पुलिस ने 1 करोड़ के इनामी माओवादी कमांडर को गिरफ्तार कर लिया। इसके साथ ही दशकों से चला आ रहा लाल आतंक का एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया।
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