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Kathua News: युवाओं में गद्दियाली लोक नृत्य का बढ़ रहा क्रेज
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Wed, 29 Apr 2026 02:19 AM IST
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गद्दियाली लोक नृत्य का प्रशिक्षण लेते हए युवासंवाद
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- बनी में कला संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से कार्यशाला का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। जिले के पहाड़ों में गद्दी लोक संस्कृति की अपनी एक अलग पहचान है। अब युवा इसे सीखने के लिए आगे आ रहे हैं। गद्दियाली रिच कल्चरल अकादमी बनी ने भद्रेशा कल्चर फर्म के तत्वावधान में गद्दियाली लोक नृत्य कार्यशाला का आयोजन किया। यह कार्यक्रम गद्दी जनजाति के सहयोग से, गोरख नाथ हरिल्लू के मार्गदर्शन और एनजेडसीसी पटियाला, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित हुआ। इसमें 40 युवा भाग ले रहे हैं।
कार्यशाला को सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय में आयोजित किया गया। मंगलवार को मुख्य अतिथि के रूप में विधायक डॉ. रामेश्वर सिंह ने इसकी शुरुआत करवाई। डॉ. सिंह ने बताया कि खास तौर से हिमाचल और जम्मू कश्मीर की गद्दी जनजाति की सांस्कृतिक पहचान का गद्दियाली लोक नृत्य अहम हिस्सा है। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि धार्मिक आस्था, सामुदायिक एकता और जीवनशैली का प्रतिबिंब है।
गोरख नाथ हरिल्लू ने बताया कि गद्दी जनजाति मुख्य रूप से चंबा, कांगड़ा और धौलाधार पर्वत सहित जम्मू-कश्मीर के धार से सटे क्षेत्रों में रहती है। इसमें बनी भी मुख्य है। पारंपरिक रूप से यह समुदाय भेड़-बकरी पालन करता है और मौसम के अनुसार ऊंचे-नीचे इलाकों में स्थान परिवर्तन करता है। इसी जीवनशैली और देवताओं के प्रति श्रद्धा से गद्दियाली लोक नृत्य की उत्पत्ति हुई। गद्दियाली नृत्य सामूहिक रूप से पुरुषों और महिलाओं की ओर से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें तालबद्ध गतियां, सामूहिक गायन और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन शामिल होती है।
नृत्य के दौरान गद्दी जनजाति के लोग देवताओं से पशुओं की भलाई और समुदाय की समृद्धि के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। यह नृत्य अक्सर त्योहारों, मेलों और धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। गद्दियाली लोक नृत्य गद्दी समाज की धार्मिक आस्था और सामुदायिक जीवन का प्रतीक है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और आज भी सांस्कृतिक कार्यशालाओं और सरकारी सहयोग से संरक्षित की जा रही है। आज गद्दियाली नृत्य केवल स्थानीय पर्वों तक सीमित नहीं है बल्कि सांस्कृतिक महोत्सव और राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में भी प्रस्तुत किया जाता है। इससे न केवल गद्दी जनजाति की पहचान मजबूत होती है। यह हिमालयी संस्कृति की अनमोल धरोहर है।
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कठुआ। जिले के पहाड़ों में गद्दी लोक संस्कृति की अपनी एक अलग पहचान है। अब युवा इसे सीखने के लिए आगे आ रहे हैं। गद्दियाली रिच कल्चरल अकादमी बनी ने भद्रेशा कल्चर फर्म के तत्वावधान में गद्दियाली लोक नृत्य कार्यशाला का आयोजन किया। यह कार्यक्रम गद्दी जनजाति के सहयोग से, गोरख नाथ हरिल्लू के मार्गदर्शन और एनजेडसीसी पटियाला, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित हुआ। इसमें 40 युवा भाग ले रहे हैं।
कार्यशाला को सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय में आयोजित किया गया। मंगलवार को मुख्य अतिथि के रूप में विधायक डॉ. रामेश्वर सिंह ने इसकी शुरुआत करवाई। डॉ. सिंह ने बताया कि खास तौर से हिमाचल और जम्मू कश्मीर की गद्दी जनजाति की सांस्कृतिक पहचान का गद्दियाली लोक नृत्य अहम हिस्सा है। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि धार्मिक आस्था, सामुदायिक एकता और जीवनशैली का प्रतिबिंब है।
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गोरख नाथ हरिल्लू ने बताया कि गद्दी जनजाति मुख्य रूप से चंबा, कांगड़ा और धौलाधार पर्वत सहित जम्मू-कश्मीर के धार से सटे क्षेत्रों में रहती है। इसमें बनी भी मुख्य है। पारंपरिक रूप से यह समुदाय भेड़-बकरी पालन करता है और मौसम के अनुसार ऊंचे-नीचे इलाकों में स्थान परिवर्तन करता है। इसी जीवनशैली और देवताओं के प्रति श्रद्धा से गद्दियाली लोक नृत्य की उत्पत्ति हुई। गद्दियाली नृत्य सामूहिक रूप से पुरुषों और महिलाओं की ओर से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें तालबद्ध गतियां, सामूहिक गायन और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन शामिल होती है।
नृत्य के दौरान गद्दी जनजाति के लोग देवताओं से पशुओं की भलाई और समुदाय की समृद्धि के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। यह नृत्य अक्सर त्योहारों, मेलों और धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। गद्दियाली लोक नृत्य गद्दी समाज की धार्मिक आस्था और सामुदायिक जीवन का प्रतीक है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और आज भी सांस्कृतिक कार्यशालाओं और सरकारी सहयोग से संरक्षित की जा रही है। आज गद्दियाली नृत्य केवल स्थानीय पर्वों तक सीमित नहीं है बल्कि सांस्कृतिक महोत्सव और राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में भी प्रस्तुत किया जाता है। इससे न केवल गद्दी जनजाति की पहचान मजबूत होती है। यह हिमालयी संस्कृति की अनमोल धरोहर है।

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