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Kathua: दुर्लभ एशियाई परिंदे का रंजीत सागर झील में डेरा, होउबारा को देख वन विभाग और पक्षी प्रेमी उत्साहित
साहिल खजूरिया, कठुआ
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 17 Apr 2026 06:56 AM IST
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सार
नवंबर 2025 में बिलावर के सेरी मुनी इलाके में मृत पाया गया दुर्लभ एशियाई परिंदा मैक्वीन बस्टर्ड (होउबारा) फिर चर्चा में है। इस प्रजाति का जीवित परिंदा अब रंजीत सागर झील के किनारे देखा गया है। राज्य में पहली बार दर्ज किए गए इस पक्षी की मौजूदगी ने वन्य जीव विभाग और पक्षी प्रेमियों को उत्साह से भर दिया है।
मैक्वीन बस्टर्ड
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जम्मू-कश्मीर के वन्यजीव मानचित्र पर एक सुखद अध्याय जुड़ा है। नवंबर 2025 में बिलावर के सेरी मुनी इलाके में मृत पाया गया दुर्लभ एशियाई परिंदा मैक्वीन बस्टर्ड (होउबारा) फिर चर्चा में है। इस प्रजाति का जीवित परिंदा अब रंजीत सागर झील के किनारे देखा गया है। राज्य में पहली बार दर्ज किए गए इस पक्षी की मौजूदगी ने वन्य जीव विभाग और पक्षी प्रेमियों को उत्साह से भर दिया है।
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यह पक्षी मध्य एशिया खासतौर पर कजाकिस्तान व मंगोलिया और मध्य पूर्व के रेगिस्तानी इलाकों में रहता है। वहां सर्दियों में यह भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों राजस्थान के जैसलमेर व गुजरात के कच्छ जैसे क्षेत्रों में प्रवास करता है। अब इस पक्षी का बिलावर जैसे पहाड़ी क्षेत्र में दिखना बेहद महत्वपूर्ण है। इसे पहली बार जम्मू-कश्मीर में जीवित देखा गया है। यह न केवल प्रवासी मार्गों के बदलाव की ओर संकेत करता है बल्कि क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को भी दर्शाता है। ये माैजूदगी न केवल जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि प्रवासी पक्षियों के रहस्यमयी मार्गों को समझने में भी अहम सुराग दे गई है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि मैक्वीन बस्टर्ड का बिलावर और रंजीत सागर झील जैसे पहाड़ी व जलाशयी इलाकों में दिखना असामान्य है। इससे संकेत मिलता है कि प्रवासी मार्ग बदल रहे हैं या फिर ये क्षेत्र इन पक्षियों का सदियों से चलता प्रवास मार्ग रहा है जो अब तक दुनिया की नजरों से दूर था।
रंजीत सागर झील किनारे मैक्वीन बस्टर्ड को अपने कैमरे में कैद करने वाले पक्षी प्रेमी सचिन कुमार भगत का मानना है कि यह घटना रिवर्स माइग्रेशन यानी परिंदे की वापसी की यात्रा के दौरान दर्ज की गई है। यह एक जमीनी पक्षी है जो उड़ने के बजाय चलना या दौड़ना अधिक पसंद करता है।
रेड लिस्ट में असुरक्षित श्रेणी में दर्ज है मैक्वीन बस्टर्ड
यह मध्यम आकार के पक्षी मैक्वीन बस्टर्ड को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट असुरक्षित श्रेणी में रखा गया है। पिछले कुछ दशकों में इसकी संख्या में 20 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण शिकार और प्राकृतिक आवास में बदलाव है। भारत में इससे मिलती-जुलती प्रजाति ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पहले से ही संकटग्रस्त श्रेणी में है।और ऐसा भी सामने आया है कि इनकी संख्या करीब 150 ही रह गई है। इसके संरक्षण के लिए भारत में भी विशेष निगरानी की आवश्यकता है।
कजाकिस्तान से भर रहे उड़ान.... भारत तक 2200 किमी की कर रहे यात्रा
मैक्वीन बस्टर्ड कई दरियाओं को पार करता हुआ भारत में सर्दी में प्रवास करता है। कजाकिस्तान जैसे रेगिस्तानी देशों से उड़ान भरकर ये पक्षी राजस्थान और पूर्वी भारत के हिस्सों में सर्दी गुजारते हैं। लगभग 2200 किलोमीटर का सफर तय कर यह परिंदे भारत की जमीन को सुरक्षित प्रवास के रूप में देख रहे हैं। गत नवंबर में बिलावर के सेरी मुनी इलाके में मृत मिले मैक्वीन बस्टर्ड पर लगे टैग से खुलासा हुआ था कि उसे कजाकिस्तान में जुलाई 2025 में बालखाश झील के पूर्वी क्षेत्र (पूर्वी कजाकिस्तान) के प्राकृतिक वातावरण में मुक्त किया गया।
पक्षी प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए नई प्रयोगशाला बन रही रंजीत सागर झील
पक्षी प्रेमी सचिन कुमार भगत ने बताया कि ये खोज न केवल पक्षी प्रेमियों के लिए रोमांचक है बल्कि शोधकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है। ये माैजूदगी प्रवास मार्गों के अध्ययन और संरक्षण प्रयासों को नई दिशा दे सकती है। बिलावर और रंजीत सागर झील अब पक्षी प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए एक नई प्रयोगशाला बन गए हैं जहां प्रवासी पक्षियों के रहस्यमयी सफर को समझने का अवसर मिलेगा। यह प्रदेश में उनके 500वें दर्ज किए जाने वाले पक्षी प्रजाति का अहम आंकड़ा भी बना।

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