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ज्यादा स्क्रीन टाइम शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए खतरनाक: विशेषज्ञ
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श्रीनगर। गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) श्रीनगर के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने सार्वजनिक स्वास्थ्य एडवाइजरी जारी करते हुए अत्यधिक स्क्रीन टाइम के प्रति लोगों को आगाह किया है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि स्मार्टफोन, टैबलेट और कंप्यूटर का लंबे समय तक इस्तेमाल न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। यह समस्या हर आयु वर्ग में देखी जा रही है लेकिन बच्चे और युवा इसकी चपेट में सबसे ज्यादा हैं।
जीएमसी के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. सलीम खान ने बताया है कि स्क्रीन पर लगातार नजरें गड़ाए रखने से डिजिटल आई स्ट्रेन की समस्या बढ़ रही है। सामान्य तौर पर इंसान जितनी बार पलकें झपकाता है, स्क्रीन देखते समय वह दर 50 से 60 प्रतिशत तक कम हो जाती है, जिससे आंखों में सूखापन, जलन, धुंधलापन और सिरदर्द जैसी शिकायतें आम हो रही हैं। इसके साथ ही टेक नेक नामक स्थिति पर भी चिंता जताई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि फोन देखते समय गर्दन को 45 से 60 डिग्री तक झुकाने से रीढ़ की हड्डी पर करीब 20 से 25 किलो का अतिरिक्त भार पड़ता है, जिससे कम उम्र में ही गर्दन और कंधों में स्थायी दर्द की समस्या पैदा हो रही है।
स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट को लेकर भी उन्होंने अलर्ट जारी किया है। यह रोशनी शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को रोक देती है, जिससे नींद का चक्र बिगड़ जाता है और व्यक्ति अनिद्रा, थकान व चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाता है। बच्चों के मामले में यह और भी गंभीर है क्योंकि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग उनके मस्तिष्क के विकास, भाषा सीखने की क्षमता और एकाग्रता को प्रभावित कर रहा है। शारीरिक गतिविधि कम होने के कारण मोटापा, टाइप-2 मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा भी बढ़ गया है।
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इस गंभीर खतरे को देखते हुए जीएमसी श्रीनगर प्रबंधन बड़े पैमाने पर एक जागरूकता अभियान भी चला रहा है। लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए अस्पताल प्रशासन टीवी, रेडियो और सोशल मीडिया जैसे विभिन्न माध्यमों का सहारा ले रहा है, ताकि समाज के हर वर्ग को डिजिटल उपकरणों के संतुलित उपयोग के प्रति जागरूक किया जा सके। विज्ञापनों और चर्चाओं के जरिए लोगों को यह संदेश दिया जा रहा है कि वे स्क्रीन का इस्तेमाल करें, लेकिन स्क्रीन को खुद पर हावी न होने दें। डॉक्टरों ने इस समस्या से बचने के लिए ''''20-20-20'''' का नियम अपनाने की सलाह दी है, यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फुट दूर देखें। साथ ही, सोने से कम से कम दो घंटे पहले स्क्रीन से दूरी बनाने और शारीरिक व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। एडवाइजरी का स्पष्ट संदेश है कि मानव शरीर गति करने के लिए बना है, न कि लगातार स्क्रॉल करने के लिए।
जीएमसी के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. सलीम खान ने बताया है कि स्क्रीन पर लगातार नजरें गड़ाए रखने से डिजिटल आई स्ट्रेन की समस्या बढ़ रही है। सामान्य तौर पर इंसान जितनी बार पलकें झपकाता है, स्क्रीन देखते समय वह दर 50 से 60 प्रतिशत तक कम हो जाती है, जिससे आंखों में सूखापन, जलन, धुंधलापन और सिरदर्द जैसी शिकायतें आम हो रही हैं। इसके साथ ही टेक नेक नामक स्थिति पर भी चिंता जताई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि फोन देखते समय गर्दन को 45 से 60 डिग्री तक झुकाने से रीढ़ की हड्डी पर करीब 20 से 25 किलो का अतिरिक्त भार पड़ता है, जिससे कम उम्र में ही गर्दन और कंधों में स्थायी दर्द की समस्या पैदा हो रही है।
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स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट को लेकर भी उन्होंने अलर्ट जारी किया है। यह रोशनी शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को रोक देती है, जिससे नींद का चक्र बिगड़ जाता है और व्यक्ति अनिद्रा, थकान व चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाता है। बच्चों के मामले में यह और भी गंभीर है क्योंकि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग उनके मस्तिष्क के विकास, भाषा सीखने की क्षमता और एकाग्रता को प्रभावित कर रहा है। शारीरिक गतिविधि कम होने के कारण मोटापा, टाइप-2 मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा भी बढ़ गया है।
इस गंभीर खतरे को देखते हुए जीएमसी श्रीनगर प्रबंधन बड़े पैमाने पर एक जागरूकता अभियान भी चला रहा है। लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए अस्पताल प्रशासन टीवी, रेडियो और सोशल मीडिया जैसे विभिन्न माध्यमों का सहारा ले रहा है, ताकि समाज के हर वर्ग को डिजिटल उपकरणों के संतुलित उपयोग के प्रति जागरूक किया जा सके। विज्ञापनों और चर्चाओं के जरिए लोगों को यह संदेश दिया जा रहा है कि वे स्क्रीन का इस्तेमाल करें, लेकिन स्क्रीन को खुद पर हावी न होने दें। डॉक्टरों ने इस समस्या से बचने के लिए ''''20-20-20'''' का नियम अपनाने की सलाह दी है, यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फुट दूर देखें। साथ ही, सोने से कम से कम दो घंटे पहले स्क्रीन से दूरी बनाने और शारीरिक व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। एडवाइजरी का स्पष्ट संदेश है कि मानव शरीर गति करने के लिए बना है, न कि लगातार स्क्रॉल करने के लिए।