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Srinagar News: तुलमुल्ला में खीर भवानी मेले की तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे डॉ. कर्ण सिंह
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गांदरबल। जम्मू-कश्मीर धर्मार्थ ट्रस्ट के अध्यक्ष और पूर्व सदर-ए-रियासत डॉ. करण सिंह ने मंगलवार को मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के पवित्र तुलमुल्ला में स्थित प्रसिद्ध खीर भवानी मंदिर का दौरा किया। उन्होंने आगामी 22 जून को आयोजित होने वाले वार्षिक खीर भवानी मेले के लिए की जा रही तैयारियों और व्यवस्थाओं की गहन समीक्षा की। अपने इस दौरे के दौरान डॉ. सिंह ने श्रद्धालुओं के लिए की जा रही आवास, स्वच्छता, पेयजल, सुरक्षा, चिकित्सा सहायता और अन्य आवश्यक सेवाओं की सुविधाओं का बारीकी से निरीक्षण किया।
उन्होंने वहां मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत की और वार्षिक तीर्थयात्रा को सुचारू और सफल बनाने के लिए उनकी तैयारियों का आकलन किया। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने जिला प्रशासन और विभिन्न विभागों द्वारा की गई व्यवस्थाओं पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने भरोसा जताया कि देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं को सभी जरूरी सुविधाएं मिलेंगी और वे बिना किसी असुविधा के इस मेले में शामिल हो सकेंगे। इस दौरान उन्होंने जम्मू-कश्मीर और पूरी दुनिया में शांति, समृद्धि और सद्भाव के लिए माता के चरणों में प्रार्थना भी की।
इस अवसर पर डॉ. करण सिंह ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता सफल होगी, बशर्ते इस प्रक्रिया को पटरी से उतारने का कोई प्रयास न किया जाएं। उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि यदि इस शांति समझौते को इजरायल द्वारा बाधित नहीं किया जाता है तो दोनों देशों के बीच एक सफल समझौता संभव है। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि मौजूदा वैश्विक संघर्षों और युद्ध ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। इससे आर्थिक स्थितियां लगातार बिगड़ रही हैं। ऐसे समय में दुनिया के लिए शांति ही एकमात्र रास्ता है।
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कश्मीर के सामाजिक ताने-बाने पर बात करते हुए डॉ. करण सिंह ने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडित हमारे समाज का एक अटूट हिस्सा हैं, लेकिन समय के साथ एक बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने वास्तविकता को साझा करते हुए कहा कि अधिकांश कश्मीरी पंडित अब कश्मीर से बाहर पूरी तरह बस चुके हैं और उनकी नई पीढ़ी के बच्चे अब स्थायी रूप से घाटी में लौटने के इच्छुक नहीं दिखते हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वे कभी भी वापस आने का फैसला करते हैं, तो घाटी में उनका हमेशा दिल से स्वागत किया जाएगा।
इसके साथ ही उन्होंने आगामी अमरनाथ यात्रा की तैयारियों पर भी अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और सरकार द्वारा किए गए सुरक्षा व अन्य उपायों को सराहा। उन्होंने भावुक होते हुए दशकों पुराने अपने संस्मरणों को याद किया और बताया कि साल 1953 में जब उन्होंने खुद अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी, तब पूरी यात्रा के दौरान केवल पांच हजार के करीब तीर्थयात्री हुआ करते थे, जबकि आज यह संख्या बढ़कर कई लाख तक पहुंच चुकी है।
उन्होंने वहां मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत की और वार्षिक तीर्थयात्रा को सुचारू और सफल बनाने के लिए उनकी तैयारियों का आकलन किया। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने जिला प्रशासन और विभिन्न विभागों द्वारा की गई व्यवस्थाओं पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने भरोसा जताया कि देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं को सभी जरूरी सुविधाएं मिलेंगी और वे बिना किसी असुविधा के इस मेले में शामिल हो सकेंगे। इस दौरान उन्होंने जम्मू-कश्मीर और पूरी दुनिया में शांति, समृद्धि और सद्भाव के लिए माता के चरणों में प्रार्थना भी की।
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इस अवसर पर डॉ. करण सिंह ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता सफल होगी, बशर्ते इस प्रक्रिया को पटरी से उतारने का कोई प्रयास न किया जाएं। उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि यदि इस शांति समझौते को इजरायल द्वारा बाधित नहीं किया जाता है तो दोनों देशों के बीच एक सफल समझौता संभव है। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि मौजूदा वैश्विक संघर्षों और युद्ध ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। इससे आर्थिक स्थितियां लगातार बिगड़ रही हैं। ऐसे समय में दुनिया के लिए शांति ही एकमात्र रास्ता है।
कश्मीर के सामाजिक ताने-बाने पर बात करते हुए डॉ. करण सिंह ने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडित हमारे समाज का एक अटूट हिस्सा हैं, लेकिन समय के साथ एक बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने वास्तविकता को साझा करते हुए कहा कि अधिकांश कश्मीरी पंडित अब कश्मीर से बाहर पूरी तरह बस चुके हैं और उनकी नई पीढ़ी के बच्चे अब स्थायी रूप से घाटी में लौटने के इच्छुक नहीं दिखते हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वे कभी भी वापस आने का फैसला करते हैं, तो घाटी में उनका हमेशा दिल से स्वागत किया जाएगा।
इसके साथ ही उन्होंने आगामी अमरनाथ यात्रा की तैयारियों पर भी अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और सरकार द्वारा किए गए सुरक्षा व अन्य उपायों को सराहा। उन्होंने भावुक होते हुए दशकों पुराने अपने संस्मरणों को याद किया और बताया कि साल 1953 में जब उन्होंने खुद अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी, तब पूरी यात्रा के दौरान केवल पांच हजार के करीब तीर्थयात्री हुआ करते थे, जबकि आज यह संख्या बढ़कर कई लाख तक पहुंच चुकी है।