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अद्भुत पल: 36 वर्ष बाद रघुनाथ मंदिर में गूंजा जय श्री राम
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श्रीनगर के हब्बा कदल में रघुनाथ मंदिर में हवन करते श्रद्धालु।
- फोटो : shrinagar news
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श्रीनगर। पुराने शहर के हब्बाकदल इलाके में झेलम नदी के तट पर बने रघुनाथ मंदिर के कपाट एक बार फिर से करीब तीन दशकों से अधिक समय के बाद श्रद्धालुओं के लिए वीरवार को खुल गए। 36 वर्षों बाद मंदिर में जय श्री राम के जयघोष सुनाई दिए।
आतंकवाद के शुरू होने के बाद कश्मीरी पंडितों के पलायन के चलते वीरान पड़े इस मंदिर में वीरवार को एक उत्साह का माहौल देखने को मिला। हब्बाकदल की संकरी गलियों में मंदिर परिसर से निकलने वाली मंत्रोच्चारण की गूंज सुनाई दे रही थी। एक ओर मस्जिद से अजान और दूसरी ओर मंत्रों की गूंज धार्मिक सद्भाव की मिसाल पेश कर रही थी। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मंदिर में 36 वर्षों के बाद बड़े स्तर पर रामनवमी का पर्व मनाया गया। इसमें बाहर से आए कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग शामिल हुए जिनके साथ स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम भी खड़े नजर आए।
मंदिर को लाइटों और फूल मालाओं से सजाया गया था और मदिर परिसर में बने हवन कुंड के आसपास बैठे कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग मंत्रोच्चारण कर रहे थे। इस बीच दूसरी ओर महिलाएं भजन गा रही थीं। कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के लोग भी अपने पुराने साथियों को मिलने के लिए मंदिर में पहुंच रहे थे। वहां मौजूद लोगों के अनुसार आज पुरानी यादें फिर से ताजा हो गईं।
रघुनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष भारत रैना ने कहा, आज 36 साल के बाद इस मंदिर के खुलने पर रामनवमी का त्यौहार मनाया गया। श्रीनगर में तीन दशक पहले भी इसी मंदिर में सबसे बड़ा रामनवमी का आयोजन हुआ करता था। आतंकवाद के कारण यह मंदिर खंडहर बन गया था और धीरे-धीरे यह अपने पुराने अवतार में लौट रहा है। आज फिर से पुरानी यादें ताजा हुई हैं और वही भावना लौट आई है। बाहर बैठे लोगों को संदेश है कि अब शांति लौट आई है, वो भी पहल करें लौटने की। कितनी देर वह घर से दूर रहेंगे आखिर जड़ें यहीं जुड़ी हुई हैं सबकी। रैना ने कहा कि मंदिर खुलने और कश्मीरी पंडितों के पहलू को हम जोड़कर देखते हैं। क्योंकि मंदिर हमारी आस्था के प्रतीक हैं और घर वापसी होगी तो वह आस्था के साथ ही होगी।
एक अन्य कश्मीरी पंडित सुनील तिक्कू ने कहा कि आज सुबह पूजा शुरू हुई तो मुझे रोना आ गया था क्योंकि 36 साल बाद ऐसी भावना और ऐसा कुछ होना मेरे लिए एक सपने सामान था। इसमें मेरे प्रभु राम का योगदान है क्योंकि वो चाहते थे कि ऐसा कुछ हो। यह इस मंदिर का मुख्य पर्व था जोकि आज दोबारा से आयोजित किया गया। मंदिर परिसर का हाल बदहाल था लेकिन सरकार के सहयोग से मंदिर समिति ने इसे दोबारा से खोलने के लिए कदम उठाए। सुनील ने कहा कि बचपन में हम रामनवमी से पहले घर घर जाकर चावल और लकड़ी इकट्ठा किया करते थे, आज वही यादें ताज़ा हुईं और लोगों ने अपना पूरा योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के समर्थन के बिना संभव नहीं है। अगर कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के लोग आगे आकर सरकार पर दबाव डालें कि कश्मीरी पंडितों की वापसी हो जाए तो जरूर एक सुरक्षा की भावना जागेगी। मैं आज भी खुलकर कहता हूं मुझे भगाने वाले भी मेरे अपने पड़ोसी थे क्योंकि उस समय वह भी असुरक्षित महसूस कर रहे थे और मुझे कह रहे थे निकलो और अपने आपको बचाओ। फिजा बदली है और आज वही दोस्त हमें कहते हैं वापस लौट आओ। अगर यही बात वो खुलकर सामने आकर बोलेंगे तो सरकार को एक साल का समय भी नहीं लगेगा हमें वापस बसाने में। पिछले तीन दिन से कश्मीरी मुस्लिम दोस्त मेरे साथ यहां खड़े हैं और एक अच्छी भावना महसूस हो रही है। चाहते हैं कि वही दौर लौट आए।
60 वर्षीय स्थानीय गुलाम हसन ने कहा कि आज वैसा ही माहौल देखने को मिला जैसा कि पहले देखते आ रहे थे। हमने अपने पुराने लोगों से मुलाकात की। मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा यह सभी खुदा के घर हैं और हमारा फर्ज़ बनता है इनकी रक्षा करना और हमने यहां इस मंदिर की देखरेख की। जो हालात यहां बने थे उसके कारण यहां से हमारे कश्मीरी पंडित लोग निकल गए लेकिन अब सरकारों की ज़िम्मेदारी बनती है कि जो उनका हक है वो उन्हें मिले। कश्मीरी पंडितों ने यहां हमारे बच्चों को पढ़ाया है। उन्होंने (कश्मीरी पंडित) हमारे साथ कुछ गलत नहीं किया। जिन्होंने गलत किया उनको उसकी सजा मिले। कश्मीरी मुसलमान अब उनका स्वागत करने के लिए तैयार हैं। हम चाहते हैं कि वह वापस लौट आएं।
इस अवसर पर श्रीनगर के जिला उपायुक्त अक्षय लाबरू भी पहुंचे और मंदिर में नतमस्तक हुए। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस महीने में हमारे बहुत सारे त्यौहार चाहे वो ईद हो, नवरोज़ हो, नवरात्री हो या रामनवमी हो, बहुत ही सकारात्मक माहौल में लोगों ने एक साथ मिलकर सौहार्दपूर्वक माहौल में सभी पर्वों को एक साथ मनाया। आज बहुत सालों बाद इस मंदिर में रामनवमी का पर्व उत्साहपूर्वक मनाया गया जोकि एक अच्छा संकेत है।
कश्मीर की कश्मीरियत फिर से पुनर्जीवित हो रही है: अशोक कौल
श्रीनगर। भाजपा के महासचिव (संगठन) अशोक कौल भी इस अवसर पर मंदिर पहुंचे और नतमस्तक हुए। उन्होंने भी पूजा अर्चना में भाग लिया। कौल ने कहा कि बहुत अच्छी बात है कि कश्मीर की कश्मीरियत फिर से पुनर्जीवित हो रही है। आसपास के स्थानीय लोगों को धन्यवाद देता हूं क्योंकि उनका भी इसमें पल में योगदान रहा।
उन्होंने कहा कि कश्मीर में मंदिरों का पुनरुद्धार एक सकारात्मक कदम है जो कश्मीरी पंडितों की वापसी का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
अल्लाह करे फिर से वो दौर आए : असद अंजुम
श्रीनगर। मंदिर परिसर में कलाकारों का एक ग्रुप कश्मीरी सूफी भक्ति गीत भी गाता दिखाई दिया जोकि धर्म निरपेक्षता का प्रतीक बना क्योंकि यह सभी कलाकार मुस्लिम धर्म के थे। एक स्थानीय कलाकार असद अंजुम ने कहा, कोई भी धर्म हो वो शांति और सच्चाई का पैगाम देता है। ऐसे आयोजनों से हमारी एकजुटता और मजबूत होती है। हम चाहते हैं कि ऐसे आयोजन होते रहें। चाहे वो राम के नाम पर हों या रहीम के नाम पर, मुझ जैसे कलाकार को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम शांतिपसंद लोग हैं। मैं चाहता हूं कि हम फिर से एक ही थाली में खाएं जैसे पहले करते थे।
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आतंकवाद के शुरू होने के बाद कश्मीरी पंडितों के पलायन के चलते वीरान पड़े इस मंदिर में वीरवार को एक उत्साह का माहौल देखने को मिला। हब्बाकदल की संकरी गलियों में मंदिर परिसर से निकलने वाली मंत्रोच्चारण की गूंज सुनाई दे रही थी। एक ओर मस्जिद से अजान और दूसरी ओर मंत्रों की गूंज धार्मिक सद्भाव की मिसाल पेश कर रही थी। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मंदिर में 36 वर्षों के बाद बड़े स्तर पर रामनवमी का पर्व मनाया गया। इसमें बाहर से आए कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग शामिल हुए जिनके साथ स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम भी खड़े नजर आए।
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मंदिर को लाइटों और फूल मालाओं से सजाया गया था और मदिर परिसर में बने हवन कुंड के आसपास बैठे कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग मंत्रोच्चारण कर रहे थे। इस बीच दूसरी ओर महिलाएं भजन गा रही थीं। कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के लोग भी अपने पुराने साथियों को मिलने के लिए मंदिर में पहुंच रहे थे। वहां मौजूद लोगों के अनुसार आज पुरानी यादें फिर से ताजा हो गईं।
रघुनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष भारत रैना ने कहा, आज 36 साल के बाद इस मंदिर के खुलने पर रामनवमी का त्यौहार मनाया गया। श्रीनगर में तीन दशक पहले भी इसी मंदिर में सबसे बड़ा रामनवमी का आयोजन हुआ करता था। आतंकवाद के कारण यह मंदिर खंडहर बन गया था और धीरे-धीरे यह अपने पुराने अवतार में लौट रहा है। आज फिर से पुरानी यादें ताजा हुई हैं और वही भावना लौट आई है। बाहर बैठे लोगों को संदेश है कि अब शांति लौट आई है, वो भी पहल करें लौटने की। कितनी देर वह घर से दूर रहेंगे आखिर जड़ें यहीं जुड़ी हुई हैं सबकी। रैना ने कहा कि मंदिर खुलने और कश्मीरी पंडितों के पहलू को हम जोड़कर देखते हैं। क्योंकि मंदिर हमारी आस्था के प्रतीक हैं और घर वापसी होगी तो वह आस्था के साथ ही होगी।
एक अन्य कश्मीरी पंडित सुनील तिक्कू ने कहा कि आज सुबह पूजा शुरू हुई तो मुझे रोना आ गया था क्योंकि 36 साल बाद ऐसी भावना और ऐसा कुछ होना मेरे लिए एक सपने सामान था। इसमें मेरे प्रभु राम का योगदान है क्योंकि वो चाहते थे कि ऐसा कुछ हो। यह इस मंदिर का मुख्य पर्व था जोकि आज दोबारा से आयोजित किया गया। मंदिर परिसर का हाल बदहाल था लेकिन सरकार के सहयोग से मंदिर समिति ने इसे दोबारा से खोलने के लिए कदम उठाए। सुनील ने कहा कि बचपन में हम रामनवमी से पहले घर घर जाकर चावल और लकड़ी इकट्ठा किया करते थे, आज वही यादें ताज़ा हुईं और लोगों ने अपना पूरा योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के समर्थन के बिना संभव नहीं है। अगर कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के लोग आगे आकर सरकार पर दबाव डालें कि कश्मीरी पंडितों की वापसी हो जाए तो जरूर एक सुरक्षा की भावना जागेगी। मैं आज भी खुलकर कहता हूं मुझे भगाने वाले भी मेरे अपने पड़ोसी थे क्योंकि उस समय वह भी असुरक्षित महसूस कर रहे थे और मुझे कह रहे थे निकलो और अपने आपको बचाओ। फिजा बदली है और आज वही दोस्त हमें कहते हैं वापस लौट आओ। अगर यही बात वो खुलकर सामने आकर बोलेंगे तो सरकार को एक साल का समय भी नहीं लगेगा हमें वापस बसाने में। पिछले तीन दिन से कश्मीरी मुस्लिम दोस्त मेरे साथ यहां खड़े हैं और एक अच्छी भावना महसूस हो रही है। चाहते हैं कि वही दौर लौट आए।
60 वर्षीय स्थानीय गुलाम हसन ने कहा कि आज वैसा ही माहौल देखने को मिला जैसा कि पहले देखते आ रहे थे। हमने अपने पुराने लोगों से मुलाकात की। मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा यह सभी खुदा के घर हैं और हमारा फर्ज़ बनता है इनकी रक्षा करना और हमने यहां इस मंदिर की देखरेख की। जो हालात यहां बने थे उसके कारण यहां से हमारे कश्मीरी पंडित लोग निकल गए लेकिन अब सरकारों की ज़िम्मेदारी बनती है कि जो उनका हक है वो उन्हें मिले। कश्मीरी पंडितों ने यहां हमारे बच्चों को पढ़ाया है। उन्होंने (कश्मीरी पंडित) हमारे साथ कुछ गलत नहीं किया। जिन्होंने गलत किया उनको उसकी सजा मिले। कश्मीरी मुसलमान अब उनका स्वागत करने के लिए तैयार हैं। हम चाहते हैं कि वह वापस लौट आएं।
इस अवसर पर श्रीनगर के जिला उपायुक्त अक्षय लाबरू भी पहुंचे और मंदिर में नतमस्तक हुए। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस महीने में हमारे बहुत सारे त्यौहार चाहे वो ईद हो, नवरोज़ हो, नवरात्री हो या रामनवमी हो, बहुत ही सकारात्मक माहौल में लोगों ने एक साथ मिलकर सौहार्दपूर्वक माहौल में सभी पर्वों को एक साथ मनाया। आज बहुत सालों बाद इस मंदिर में रामनवमी का पर्व उत्साहपूर्वक मनाया गया जोकि एक अच्छा संकेत है।
कश्मीर की कश्मीरियत फिर से पुनर्जीवित हो रही है: अशोक कौल
श्रीनगर। भाजपा के महासचिव (संगठन) अशोक कौल भी इस अवसर पर मंदिर पहुंचे और नतमस्तक हुए। उन्होंने भी पूजा अर्चना में भाग लिया। कौल ने कहा कि बहुत अच्छी बात है कि कश्मीर की कश्मीरियत फिर से पुनर्जीवित हो रही है। आसपास के स्थानीय लोगों को धन्यवाद देता हूं क्योंकि उनका भी इसमें पल में योगदान रहा।
उन्होंने कहा कि कश्मीर में मंदिरों का पुनरुद्धार एक सकारात्मक कदम है जो कश्मीरी पंडितों की वापसी का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
अल्लाह करे फिर से वो दौर आए : असद अंजुम
श्रीनगर। मंदिर परिसर में कलाकारों का एक ग्रुप कश्मीरी सूफी भक्ति गीत भी गाता दिखाई दिया जोकि धर्म निरपेक्षता का प्रतीक बना क्योंकि यह सभी कलाकार मुस्लिम धर्म के थे। एक स्थानीय कलाकार असद अंजुम ने कहा, कोई भी धर्म हो वो शांति और सच्चाई का पैगाम देता है। ऐसे आयोजनों से हमारी एकजुटता और मजबूत होती है। हम चाहते हैं कि ऐसे आयोजन होते रहें। चाहे वो राम के नाम पर हों या रहीम के नाम पर, मुझ जैसे कलाकार को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम शांतिपसंद लोग हैं। मैं चाहता हूं कि हम फिर से एक ही थाली में खाएं जैसे पहले करते थे।